रविवार, 31 अगस्त 2025

आएंगे

 रोज ऐसे अगर आएंगे

हम बेपनाह संवर जाएंगे

मुझे दिखती है जिंदगी

बंदगी में उमर बिताएंगे


आने का है कई तरीका

सलीका भी बुदबुदाएँगे

अदाओं की देख आदत

उम्मीदगी का असर पाएंगे


आती है भोर किरणें 

उसमें ही नजर आएंगे

किरणों पर जीवन आश्रित

आनंदिगी से भर जाएंगे


सुबह राह तकती आंखें

वह आकर गुनगुनाएंगे

रच जाती नित कविता

पढ़ इसको मुस्कराएंगे।


धीरेन्द्र सिंह

31.08.2025

19 26





शनिवार, 30 अगस्त 2025

चल बैरागी

 संकुचित मर्यादाएं

दबंग संस्कार

व्यथित मनोकामनाएं

भूसकल त्यौहार


हर किसी का बाड़ा

लुकछुप व्यवहार

किसका किसपर उधार

कहां कब अख्तियार


सब जिएं ऐसे ही

जीवन लौ को दे बयार

सत्य उभरता ही कहाँ

सत्यवादी यह संसार


अकुलाहट विश्राम चाहे

सुखकर गोद की दरकार

चल बैरागी ठौर वही

जहां चिंगारियों का चटकार।


धीरेन्द्र सिंह

31.08.2025

06.31

शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

कर्म का फल

 कर्म अब धर्म, अर्थ, भाषा आधारित

कर्म का फल प्रश्नांकित है, विचारित


सत्कर्म है संबंधित समाज, देश नियम

कर्म व्यक्तिजनित हतप्रभ अधिनियम

पाप-पुण्य समायाधीन जग में संचारित

कर्म का फल प्रश्नांकित है, विचारित


जैसा कर्म वैसा फल प्रबुद्ध समाज का

भ्रष्टाचार जहां वहां परिणाम गजब का

मानवता सृजित निरंतर विकास पगधारित

कर्म का फल प्रश्नांकित है, विचारित


कलयुग का नाम ले कर्मधर्म कहें कंपन

मानवयुग उलझन में हो कहां समंजन

सब चले राह चले बांह छाहँ ना निर्धारित

कर्म का फल प्रश्नांकित है, विचारित।


धीरेन्द्र सिंह

29.08.2025

13.39







गुरुवार, 28 अगस्त 2025

अधर आंगन

 अधर के आंगन में अनखिले कई शब्द

असर की चाहत में सिलसिले कई स्तब्ध


नयन की गगरी से भाव तरल कभी गरल

अगन की चिंगारियां हवा संग रही बहल

अधर आंगन में चाहत जैसे छुईमुई निबद्ध

असर की चाहत में सिलसिले कई स्तब्ध


चल पड़े भाव राह उलझा जो संग बहेलिया

खिल पड़े घाव आह सुलझा दी तंग डोरियां

कुछ भ्रम भी उभरते हैं जैसे अलगनी प्रारब्ध

असर की चाहत में सिलसिले कई स्तब्ध


अधर गुप्त कंपन समंजन में पाए भंजन

आंगन हवा बहे प्रयास किमनरूप प्रबंधन

आत्मिक ऊर्जा लहक लपक छुई आबद्ध

असर की चाहत में सिलसिले कई स्तब्ध।


धीरेन्द्र सिंह

28.08.2025

18.3


बुधवार, 27 अगस्त 2025

पधारे मेरे घर

 प्रगति सकल चिंतन हो एक सामाजिक गणवेश

ऐसी बोली बोल रहे हैं पधारे मेरे घर श्री गणेश


सज्जा मनोभाव की करने का है यह एक प्रयास

गौरव है प्राप्त होता श्री गणेश करें गृह निवास

दीवारों से पूछिए कैसा हो जाता है अद्भुत परिवेश

ऐसी बोली बोल रहे हैं पधारे मेरे घर श्री गणेश


अपनी अनुभूतियों का अब और ना करूँ बखान

गणेशोत्सव परंपरा के सृजनकर्ता हैं अति महान

श्री गणेश इस अवधि में देते आशीष शक्ति विशेष

ऐसी बोली बोल रहे हैं पधारे मेरे घर श्री गणेश


करबद्ध खड़ा हूँ वचनबद्ध आबद्ध स्वयं से सम्बद्ध

गणपति विराजे हैं तो भाव से हूँ आपूरित निबद्ध

आपका भी मंगल हो दंगल अब जीवन का संदेश

ऐसी बोली बोल रहे हैं पधारे मेरे घर श्री गणेश🙏🏻


धीरेन्द्र सिंह

27.08.2025

16.28

सोमवार, 25 अगस्त 2025

गणेश

 हर गली हर सड़क हर बिल्डिंग लिए एक भेष

आ गए हैं मुंबई की धड़कन, ऊर्जा लिए गणेश


अति विशाल अति भव्य झांकिया समय संभव

अति विशाल महानगरी देखता न कभी पराभव

एक दिवसीय, दस दिवसीय अर्चना अति विशेष

आ गए हैं मुंबई की धड़कन, ऊर्जा लिए गणेश


मुम्बई, नवी मुंबई अब तीसरी आ रही है मुम्बई

विस्तार है स्वीकार है सत्कार है हर कल्पना नई

गणपति बप्पा में है डूबा महाराष्ट्र का पूर्ण परिवेश

आ गए हैं मुंबई की धड़कन, ऊर्जा लिए गणेश


अपने घर में पधारे गणेश जी की प्रथम अर्चना

फिर मुंबई में भ्रमण कर रात्रिभर गणेश कल्पना

वक्रतुंड महाकाय का आशीष करें निर्मूलन क्लेश

आ गए हैं मुंबई की धड़कन, ऊर्जा लिए गणेश।


धीरेन्द्र सिंह

26.08.2025

11.46

दौर के दौड़

 दौर के दौड़ में हैं थक रहे पाँव

गौर से तौर देखे कहाँ तेरा गांव


एक जगत देखूं है ज्ञानी अभिमानी

एक जगत निर्मल निर्मोही जग जानी

जिससे भी पता पूछूं ना जानें ठाँव

गौर से तौर देखे कहाँ तेरा गांव


वह जो पुकार हृदय में रही गूँज

उभरते भाव रहे कामना को पूज

और कितना दौड़ना कहां है छांव

गौर से तौर देखे कहां तेरा गांव


पथ भी अनेक विभिन्न रंग के राही

हर पथ गूंजता करता तेरी वाहवाही

ओ चपल तू छलक ललक दे दांय

गौर से तौर देखे कहां तेरा गांव।


धीरेन्द्र सिंह

25.08.2025

21.00

शनिवार, 23 अगस्त 2025

आध्यात्मिक

अस्वाभिक परिवेश में बुलाया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो


माना कि स्वयं को हो करते अभिव्यक्त

पर यह तो मानो हर आत्मा यहां है भक्त

धर्म के भाव छांव संग गहराया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो


आसक्त है मन तुमसे जहां गहरी वादियां

उन्मुक्त तपन में सघन विचरती किलकरियाँ

अनुगूंज अपने मन का छुपाया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो


यह तन सर्वप्रथम है आराधना का स्थल

तन जीर्ण-शीर्ण ना हो करें प्रयास प्रतिपल

आसक्ति-भक्ति-मुक्ति जतलाया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो


चिकने चेहरे निर्मल मुस्कान लिए प्रेमगान

उल्लसित उन्मुक्त प्यार ही में किए ध्यान

यही आध्यात्मिक यह झुठलाया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो।


धीरेन्द्र सिंह

24.08.2025

08.42

मर्द

 सबकी अपनी सीमाएं सबके अपने दर्द

अपनी श्रेष्ठता निर्मित करना क्या है मर्द


आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक परिवेश

इन तीनों से होता निर्मित मानव का भेष

पार्श्वभूमि समझे बिना निकालते हैं अर्थ७

अपनी श्रेष्ठता निर्मित करना क्या है मर्द


हर व्यक्ति चाणक्य है संचित अनुभव ज्ञान०

एक स्थिति में कोई शांत कोई लिए म्यान

आक्रामकता पौरुषता सौम्यता क्या सर्द

अपनी श्रेष्ठता निर्मित करना क्या है मर्द


व्यक्ति परखना पुस्तक की समीक्षा जैसे

बाहर से जो दिख रहा क्या भीतर वैसे

क्षद्म रूप के चलन में रूप आडंबर तर्क

अपनी श्रेष्ठता निर्मित करना क्या है मर्द।


धीरेन्द्र सिंह

23.08.2025

16.14

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

छनाछन

 भूल जाइए तन मात्र रहे जागृत मन

प्रतिध्वनि तब उभरेगी छन छनाछन


काया की माया में है धूप कहीं छाया

मन से जो जीता वह जग जीत पाया

आत्मचेतना है सुरभित सुंदर अभिगम

प्रतिध्वनि तब उभरेगी छन छनाछन


युक्तियों से रिक्तियों को कौन भरपाया

आसक्तियों की भित्ति पर चित्रित मोहमाया

थम जाएं वहीं जहां अटके मुक्त मन

प्रतिध्वनि तब उभरेगी छन छनाछन


पट्टे में बंधे श्वान से लेकर हैं चलते मन

बँध जाना जीवन में न कहे धरती गगन

खोलकर यह बंधन अपने में हों मगन

प्रतिध्वनि तब उभरेगी छन छनाछन।


धीरेन्द्र सिंह

22.08.2025

07.48




सलवटें

सलवटें नहीं होती
सिर्फ बिछी चादर में
व्यक्तित्व भी होता है भरा
असंख्य सलवटों से
कुछ चीन्हे कुछ अनचीन्हे,

नित हटाई जाती है
सलवटें चादर की
पर नही हटाता कोई
व्यक्तित्व की सलवटें
प्रयास जाते हैं थक,

कैसे बना जाए
विराटमना
निर्मलमना,
घेरे जग का कोहरा घना,
आओ छू लो
मन मेरा, मैं तेरा
बन चितेरा,

ना
प्यार नहीं आशय
प्यार तो है हल्का भाव
भाव है आत्म मिलन,
सलवटें प्यार से 
मिटती नहीं,
आत्मा जब आत्मा से
मिलती है
चादर व्यक्तित्व की
खिंचती है
तो हो जाता है
आत्मबोध,

आओ मिलकर
व्यक्तित्व चादर का
खिंचाव करें
संयुक्त खिलकर
सलवट रहित व्यक्तित्व का
निभाव करें।

धीरेन्द्र सिंह
21.08.2025
13.56



मंगलवार, 19 अगस्त 2025

मुम्बई वर्षा

 मुम्बई में 

हो रही चार दिनों से

लगातार बरसात

और मीडिया बोल रहा

मुम्बई जल से परेशान,

मीडिया यह नहीं

बता रहा है कि

कुलाबा से महालक्ष्मी मंदिर

बरसात से अप्रभावित है

क्योंकि रहते हैं 

इन्हीं क्षेत्र में 

अति प्रतिभाशाली,

बॉलीवुड प्रतिभा नहीं

मात्र अभिनय कौशल है,

करोड़ों के फ्लैट

मुंबई की आम बात है,


नहीं करता मीडिया

नवी मुंबई की बात

जहां भीषण वर्षा में भी

जलरहित सड़कें हैं,

एक अपूर्ण जानकारी

कर रहा प्रदान मीडिया,

जिसकी विवशता है

टीआरपी

अति प्रतिभाशाली

और नवी मुंबई भी

सुरक्षित है

पीं पीं।


धीरेन्द्र सिंह

19.08.2025

2क.25 

सोमवार, 18 अगस्त 2025

बरसात

 बहत्तर घंटे से लगातार बरसात

भोर नींद खुली भय के हालात


लग रहा बादल फटा क्रोध जता

बारिश की गर्जना मौन रतजगा

भोर पांच तीस पर दूध का साथ

भोर नींद खुली भय के हालात


विद्यालय, महाविद्यालय बंद आज

जीवन मुम्बई का करे दो-दो हाँथ

मंथर पर जीवन घोर वर्षा का आघात

भोर नींद खुली भय के हालात


लोकल बंद होगी सड़क बन तालाब

दैनिक मजदूर दुखी सब लाजवाब

वर्षों बाद मुम्बई में है वर्षा उत्पात

भोर नींद खुली भय के हालात।


धीरेन्द्र सिंह

19.08.2025

05.57

रविवार, 17 अगस्त 2025

प्रिए

 तुम कहाँ हो लिए व्यथित हृदय

कौन है अब धड़कन बना प्रिए


तृषित अधर नमक चखें समर्थित

बतलाओगी संख्या कितनी व्यथित

अनुराग विस्फोटन को लिए दिए

कौन है अब धड़कन बना प्रिए


वर्ष कई बीत गए हुए हम विलग

न जाने कौन सी जलाई अलख

ईश्वर से प्रार्थना सुखी वह जिएं

कौन है अब धड़कन बना प्रिए


आधार प्यार का मन संचेतना है

प्रमुख मिटाता वह अन्य वेदना है

प्रणय कुछ नहीं कैसे उल्लासपूर्ण जिए

कौन है अब धड़कन बना प्रिए।


धीरेन्द्र सिंह

17.08.2025

22.43


गज़ब

 सुनो में एक हद हूँ

और तुम बेहद

बात इसमें यह भी

मैं बेअदब हूँ

और तुम संग अदब,

है न गज़ब!


हम में विरोधाभास

पर मैं हताश

और तुम आकाश

बात इसमें यह भी

मैं प्रणयवादी हूँ

और तुम व्यवहारवादी

है न गज़ब!


हम में भी यह विकास

तुम दूसरे राज्य

मुझे लगो तुम साम्राज्य

बात इसमें यह भी

मैं लौ दीपक

पर तुम प्रकाश

है न गज़ब!


हम स्पष्ट विरोधाभास

मूल हित संस्कार तोड़ता बेड़ियां

तुम प्रगतिशील भूल पीढियां

बात इसमें यह भी

मैं मात्र आस

और तुम मधुमास

है न गज़ब।


धीरेन्द्र सिंह

17.08.2025

21.06





रिश्ते

कुछ रिश्ते इतने रम जाते हैं

कि न जाने कब मर जाते हैं


झटके दर झटके भी है अदा

रिश्ता है तो नोक-झोंक बदा

कब अपने रिश्ते में भर जाते हैं

कि न जाने कब मर जाते हैं


झटके से जो मरता रिश्ता नहीं

खट से मार डालें सिसकता नहीं

रह-रहकर तेज धार दिखलाते हैं

कि न जाने कब मर जाते हैं


कई मर चुके उसकी गिनती कहां

जो अब मर रहे उनमें विनती कहां

भाव इस विलगाव पर झुंझलाते हैं

कि न जाने कब मर जाते हैं।


धीरेन्द्र सिंह

17.08.2025

19.55

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

गोविंद

 कनखियों से गोपी भाव धमाल है

माखन चोरी में अब कहाँ ताल है

दही-हांडी महाराष्ट्र का एक स्वरूप

धनवर्षा मुंबई में कृष्णोत्सव ढाल है


गोविंदा की निकलती हैं कई टोलियां

एकदूजे के कांधे पर  चढ़ना कमाल है

शारीरिक सौष्ठव संतुलन का उत्सव

"गोविंदा आला रे" संगीत ताल है


अब तो युवतियों की भी गोविंदा टोली

बहुत ऊंचाई तक जाना खयाल है

गोपियाँ भी कान्हा की तरह माखनचोर

मुम्बई में कृष्ण जन्माष्टमी द्रुतताल है।


धीरेन्द्र सिंह

16.08.2025

07.14

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

15 अगस्त

 विश्व कहीं मस्त कहीं अस्तव्यस्त है

भारत भी कहे भविष्य 15 अगस्त है


विविधता में एकता ही प्रखर भवितव्य

विभिन्नता में श्रेष्ठता ही अधर अमृत्व

सभी ओर सक्रियता के लक्ष्य सत्य है

भारत भी कहे भविष्य 15 अगस्त है


कथ्य में सत्य की विशाल लिए संस्कृति

अपनी समस्या हटाते राष्ट्र की नित उन्नति

हर नागरिक कर्म का नैवेद्य का कक्ष है

भारत भी कहे भविष्य 15 अगस्त है


ललाट पर धारित तिरंगे की ओजस्विता

सम्राट का अस्तित्व विचारित तेजस्विता

राष्ट्र ही सर्वस्व भारत विश्वगुरु प्रशस्त है

भारत भी कहे भविष्य 15 अगस्त है।


धीरेन्द्र सिंह

15.08.2025

08.37


बुधवार, 13 अगस्त 2025

क्रंदन

 सौंदर्य की चंचलता पर संस्कारी बंधन

इतना ना जकड़िए मन में होता क्रंदन


रूपवती हैं, निगाहें मान लेती हैं गुणवती

धुनमति हैं अदाएं जान लेती हैं द्रुतगति

सौम्य, शांत, संयत, शीतल सुगंधित चंदन

इतना न जकड़िए मन में होता क्रंदन


अनदेखा कर भूल जाना भला कहां संभव

आपके सौंदर्य से प्रणय सदियों से पराभव

आसक्ति मुक्ति ना चाहे बस सौंदर्य अभिनंदन

इतना न जकड़िए मन में होता क्रंदन


भावनाओं की रिक्तियां चाहे प्यार युक्तियाँ

सौंदर्य परख दृष्टि की नित नव आसक्तियां

विनयपूर्ण सम्मान में गरिमा का हो वंदन

इतना न जकड़िए मन में होता क्रंदन।


धीरेन्द्र सिंह

14.08.2025

09.03



मंगलवार, 12 अगस्त 2025

यूट्यूब पाती

 दूसरों की कविताएं चुन जब तुम थी गाती

कहो क्या था, संदेसा या प्रेम यूट्यूब पाती


मेरे भी गीत में की थी तुम कई परिवर्तन

सुर, लय में बांध ली भाव का था आवर्तन

आज भी हूँ सुनता जिंदगी जो पीट जाती

कहो क्या था, संदेसा या प्रेम यूट्यूब पाती


सबकी तो हैं होती अपनी लक्ष्मण रेखा

जिसने उसको फांदा जीवन विभिन्न देखा

ऐसी रेखाएं तोड़ती बन गयी प्यार उन्मादी

कहो क्या था, संदेसा या प्रेम यूट्यूब पाती


प्रणय को कहा बयार तुम समझ पाई सस्ता

व्यक्तित्व मिलन दुर्लभ समझी बिखरा बस्ता

चुगते गई अविवेकी कागजी नाव भाव बहाती

कहो क्या था, संदेसा या प्रेम यूट्यूब पाती


व्हाट्सएप्प चैट वीडियो कॉलिंग अन्य हैं रास्ते

हर एप्प पर थी दिखती थी तुम दौड़ते हांफते

क्या चाह थी क्या राह थी विभिन्न तथ्य अपनाती

कहो क्या था, संदेसा या प्रेम यूट्यूब पाती।


धीरेन्द्र सिंह

13.08.2025

09.30


जुगलबंदी

 लय में बंधी रहोगी धुन में बंधी रहोगी

संगीत जीवन का दिया तुम्हारा सानिध्य

गीत रचने लगे भाव रंग-रंग के खिलें 

होता है ऐसा ही मन का मन से आतिथ्य



लय में बंधी रहोगी धुन में बंधी रहोगी

संगीत जीवन का दिया तुम्हारा सानिध्य

गीत रचने लगे भाव रंग-रंग के खिलें 

होता है ऐसा ही मन का मन से आतिथ्य


कपोलों में हंसती थी चुराती जो अंखिया

खिल मुझसे लिपट जाता था वह साहित्य

दिल की धड़कनों पर दौड़ता बोलता मन

क्या-क्या न रच गईं तुम प्यार का आदित्य


भावनाओं को शब्दों की चूनर थी चढ़ाती

यूट्यूब में गीतों का था अभिनव दृश्यव्य

यत्र-तत्र प्रकाशित होती थी गुंजन तुम्हारी

कई सुरों का बखूबी बतला थी महत्व


वह अपनी जुगलबंदी थी छाप थी अलग

किस कदर परिवेश में था तुम्हारा आधिपत्य

प्रसिद्धि न संभाल सकी चापलूस पैठ गए

हर डगर समावेश में गा पुकारा किए अनित्य।


धीरेन्द्र सिंह

12.08.2025

17.23




सोमवार, 11 अगस्त 2025

बालकृष्ण

 भोला चित्ताकर्षक मनमोहक रूप

मुग्धित दृष्टि लिए चुम्बकीय अनूप

सृष्टि सहर्ष उत्कर्ष की है ललक लिए

चांदनी लिपट गयी देख अद्भुत धूप


मात-पिता शिशु देखें भाव के झकोरे

आत्मतृप्ति ले आसक्ति आयो सपूत

एक ऊर्जा सकारात्मक जैसे ब्रह्मचेतना

भाग्य खिला जीवन मिला जैसे शहतूत


नयन गति पालना गति सुख सम्मति

माँ अनुग्रहित कोख प्रभाव जो भभूत

पित्र चित्र भाव के पूरित शिशु प्रभाव

उन्नयन बहुरंगी गगन आभामंडल सूत


कान्हा को कहना एक दिव्य अनुभूति

कामनाएं सविनय करें कृष्ण तो अकूत

बालरूप अतिदिव्य रूप पूर्ण कौन देखे

अर्चना संग सर्जना विनीत भाव से आहूत।


धीरेन्द्र सिंह

11.08.2025

20.26

रविवार, 10 अगस्त 2025

जनकल्याण

 सब कुछ बदल देंगे, कथ्य डंटा है

यह राय है समय का, सत्य बंटा है

एक हौसला से ही हो पाता फैसला

कुछ बात है कि लगे हौसला छंटा है


डैने पसारकर उड़ने की समय मांग

छैने में बैठकर सिर्फ बातों की छटा है

संस्कृतियां ले रही हैं बेचैन करवटें

कह रही सभ्यता कि अब क्या घटा है


कहीं व्योम है सिंदूरी कहीं श्यामलता

कहीं उर्वरक धरा कहीं बंजर अड़ा है

प्रगति की दौड़ में द्रुत गतिमान दिशाएं

लगने लगा अपरिचित जो संयुक्त धड़ा है


भाषा के नाम पर अभिव्यक्तियों के बाड़

धर्म के नाम पर मानव सत्कर्म मथा है

अब कर्म ही आधार, सर्व सुखदाई रहें

जनकल्याण विश्व का हो चाह दृढ़ खड़ा है।


धीरेन्द्र सिंह

10.08.2025

18.46



शनिवार, 9 अगस्त 2025

सचेतक हुंकार

 उत्सव है, खुशियां हैं, वस्त्रों की झंकार है

भीड़ सुबह दुकानों पर उड़ रहा प्यार है


यह भी एक चर्चा है त्यौहार बस पर्चा है

रक्षाबंधन से प्रारंभ पर्व संबंधों का दर्जा है

अजीब सुगबुगाहटों संग सजग संसार है

भीड़ सुबह दुकानों पर उड़ रहा प्यार है


विश्वास का यह धागा पारंपरिक बंधन अटूट

एक सुरक्षा अभेद्य शौर्य, कीर्ति, चाह सम्पुट

इसपर भी आक्रमण सब प्रयास बेकार हैं

भीड़ सुबह दुकानों पर उड़ रहा प्यार है


अबकी राखी बंधी पहले से अधिक जंची

धूल-धक्कड़ न बसे दुकानों ने नीति रची

त्यौहारों में भी अब सचेतक हुंकार है

भीड़ सुबह दुकानों पर उड़ रहा प्यार है।


धीरेन्द्र सिंह

09.08.2025

15.09



गुरुवार, 7 अगस्त 2025

संस्कार

 जैसा देखा जीवन वैसा निर्मित आकार

आदर्श, नैतिकता संग बनता है संस्कार


कुछ परंपरा से मिली जीवन की आदत

कुछ परिवेश से भी बढ़ जाती है लागत

कुछ शिक्षा, दीक्षा का ले बढ़ते हैं आधार

आदर्श, नैतिकता संग बनता है संस्कार


अधिकांश होते अपने धर्म की किलकारी

विरले ही करते परिस्थिति तर्क से यारी

कहीं देह निर्वाण कहीं देह लज्जा व्यवहार

आदर्श, नैतिकता संग बनता है संस्कार


वर्तमान में द्रुत परिवर्तन से जीते मुहं मोड़

देखा, जीया है नहीं पढ़-सुन कहें इसे तोड़

अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखा में ही झंकार

आदर्श, नैतिकता संग बनता है संस्कार


धन, संपदा, वैभव, ख्याति के जो अनुयायी

ऐसे यथार्थ समझे बिना जो पाया पगुरायी

बौद्धिक होना गहन साधना तर्क हवन आधार

आदर्श, नैतिकता संग बनता है संस्कार।


धीरेन्द्र सिंह

08.08.2025

12.12


बुधवार, 6 अगस्त 2025

भाग चलें

 खुद में खुद को बांटना चाहता है

व्यक्ति परिवेश से भागना चाहता है

एक घुटन में सलीके से जी रहा है

खुद की ऊष्मा खुद तापना चाहता है


कहीं अकेले किसी पर्वतीय हरियाली

मनचाहे फूलों का एकल बन माली

भाव माला को वरण करना चाहता है

खुद की ऊष्मा खुद तापना चाहता है


सबकी सोचता है उसकी न कोई सोचता

घर की अनिवार्यता घर रहता है खोजता

सबकी निभाता मनचाही कामना बांटता है

खुद की ऊष्मा खुद तापना चाहता है


अब उसे लगता है अपने से है दूर चली गई

दायित्व निर्वहन के नाम दिनचर्या छली गई

यह भीड़ यह व्यस्तता मौन में काटता है

खुद की ऊष्मा खुद तापना चाहता है।


धीरेन्द्र सिंह

07.08.2025

11.01

प्रौढ़ावस्था

 आप चलचल, आप चपल, आप चंचल

आप धवल, आप कंवल, आप कलकल


शिशु कभी दिखता कभी दिखे किशोरावस्था

कभी यौवन उन्मादी सा क्या खूब प्रौढ़ावस्था

भाव चहके मन भी बहके देखें आंखें मलमल

आप धवल, आप कंवल, आप कलकल


अनुभवों के प्रत्येक चरण आपके हैं शरण

अद्भुत जिजीविषा है उमंगों का नहीं क्षरण

जिंदगी कलरव प्रणय कभी रिसी छलछल

आप धवल, आप कंवल, आप कलकल


बढ़ती उम्र ढलती देह भला क्यों सोचे नेह

दृष्टि भाव ही सर्वस्व नयन, अधर भरे स्नेह

आप तरंग, आप विहंग, आप सुगंध पलपल

आप धवल, आप कंवल, आप कलकल।


धीरेन्द्र सिंह

07.08.2025

07.40

विशिष्ट बनिए

 हिंदी में हैं लिखते तो क्यों परिशिष्ट बनिए

कुछ अपना भी आरम्भ कर विशिष्ट बनिए


कुछ नया गठन से निर्मित हो साहित्य सदन

धरा आपको भी पूछे पहचानता हो यह गगन

कभी समूह, कभी संस्था कभी कुछ रचिए

कुछ अपना भी आरम्भ कर विशिष्ट बनिए


देखिए कुकुरमुत्ता सा उभर जाते हैं मौसम

युद्धभूमि सैनिक तंबुओं सा अस्तित्व परचम

अपना भी तंबू रच नाम अपना शीर्ष रखिए

कुछ अपना भी आरम्भ कर विशिष्ट बनिए


हिंदी भाषा कहीं साहित्य कहीं बस अवसरवाद

अपने नाम ख्याति के लिए है साहित्यिक संवाद

हिंदी के हित के बारे में बस निरंतर बोलते रहिए

कुछ अपना भी आरम्भ कर विशिष्ट बनिए।


धीरेन्द्र सिंह

06.08.2025

13.56

मंगलवार, 5 अगस्त 2025

धराली गांव

 उत्तरकाशी का धराली गाँव

गंगोत्री यात्रा का प्रमुख पड़ाव

बादल फटा मलबा बहा प्रचंड

देखते ही देखते कई घर घाव


प्रकृति के करीब प्रकृति अनुसार

व्यक्ति कामना प्रबल बढ़ते द्वार

बादल फटा नदी भरी मलबा धाव

देखते ही देखते कई घर घाव


पहाड़ रहे टूट सागर को रहे पाट

वृक्ष भी कट रहे प्रगति का ठाट

मनुष्य प्रकृति में करे विस्तार प्रस्ताव

देखते ही देखते कई घर घाव


अग्नि, जल, वायु सर्वशक्तिमान हैं

मनुष्य प्रगति के भी कई दांव हैं

धराली पुनः संकेत दे प्रकृति छांव

देखते ही देखते कई घर घाव।


धीरेन्द्र सिंह

05.08.2025

15.57



सोमवार, 4 अगस्त 2025

प्यास

जीवन की टहनियों से शब्दों को लिए तोड़

वह ताक दिए थे बस जीवन को लिए मोड़

आस चढ़ी प्यास कुछ खास हुए एहसास

जाना-बूझा न सुना रिश्ता सा लिए जोड़


टहनी से चुने शब्द पर चढ़ा भाव का मुलम्मा

लिखें या कहें कोशिश कश्मकश संग होड़

एहसास जिसमें प्यास हो वह कैसे खास हो

एक आतुरता एक बेचैनी सागर सा है आलोड़


उनका ताकना उनकी आदत भी अदा भी है

उनमें बहकना स्वाभाविक देख जी उठे मरोड़

व्यक्तित्व का कृतित्व जब जीवंत अस्तित्व लगे

निजत्व के घनत्व का अपनत्व बढ़े तब दौड़


इसलिए भी किसलिए कभी हँसलिए कथ्यलिए

बहेलिए सा चलदिए पहेलियों का जाल ले बढ़ा

उनका ताकना जबसे लगे है कोमल सा बांधना

असीम प्यास लिए आस सम्मान हेतु हो खड़ा।


धीरेन्द्र सिंह

04.08.2025

14.14




शनिवार, 2 अगस्त 2025

गांव

 गलियां सूनी हैं पहेलियों के पांव

निदिया न आए नयन भरे हैं गांव


राहों की माटी पकड़ रही हैं छोड़

धूल बनकर दौड़ती जिंदा कहां मोड़

खेत-खलिहान लगे कौवा की कांव

निदिया न आए नयन भरे हैं गांव


जेठ की भरी दोपहरी सा है सन्नाटा

चहल-पहल खुशियों को लगा चांटा

गिने-चुने लोग तरसे व्यक्तियों को छांव

निदिया न आए नयन भरे हैं गांव


बंटाई व्यवस्था पर अधिकांश हैं खेत

घर एक दूसरे से छुपाते हैं खबर, भेद

परिवार, खानदान में हैं नित नए दांव

निदिया न आए नयन भरे हैं गांव


शाम ढलते ही होती कुछ वही सरगर्मियां

नशा विभिन्न प्रकार के रचते हैं शर्तिया

ग्रामीण संस्कृति में गायब हो रहे हैं गांव

निदिया न आए नयन भरे हैं गांव।


धीरेन्द्र सिंह

02.08.2025

15.08