अकेले अस्तित्व का ही निनाद है
सत्य यह कि निजत्व का विवाद है
प्रश्रय पुंजत्व का मुग्ध पुष्पधारी पक्ष
प्रेम में दुरूहता उभरता जब यक्षप्रश्न
यथोचित उत्तर ही प्रमुख संवाद है
सत्य यह कि निजत्व का विवाद है
अकेले अस्तित्व का ही निनाद है
सत्य यह कि निजत्व का विवाद है
प्रश्रय पुंजत्व का मुग्ध पुष्पधारी पक्ष
प्रेम में दुरूहता उभरता जब यक्षप्रश्न
यथोचित उत्तर ही प्रमुख संवाद है
सत्य यह कि निजत्व का विवाद है
विवाह लगता सामाजिक पोषण है
आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है
विवाह में दहेज प्रथम सिद्ध पायदान
द्वितीय दुल्हन को बनाएं भव्य पायदान
दूल्हा के लिए परिवार भाव कुपोषण है
आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है
यहां अपवाद का सम्मान से प्रशंसक हैं
जो निरपवाद है उसके निरोध अंशक हैं
तलाक अब न्यायालय में प्रति क्षण है
आधुनिकता में यथार्थ लगे धोषण है
सास के पारंपरिक समय लुप्त सिद्धांत
आधुनिक युवती सुन हो जाती आक्रांत
कालातीत लम्हों का निरंतर प्रक्षेपण है
आधुनिकया में यथार्थ लगे शोषण।है
अर्थ ही जोड़ता है अर्थ ही तोड़ता है
वैवाहिक जीवन को अर्थ ही मोडता है
प्रणय में अर्थ ही प्रथान सर्वप्रिय कण है
आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है।
धीरेन्द्र सिंह
27.12.2025
21.46
अधर अमृत आगमन है अनुभूति लिए
आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए
प्रबल पार्श्वसंगीत परिवेश मादक कर रहा
प्रयोजन परहित का है साधक यह कह रहा
नयन के गमन में सघन आलोकित धर दिए
आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए
अधर आतुर आत्ममुग्ध लिए अभिव्यक्तियाँ
अगर डगर बोल उठे डोल रहीं आसक्तियां
कदम वहम छोड़कर स्वप्न सार्थक कर लिए
आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए
दृष्टि विशिष्ट चाहिए निरखने को अधर अमृत
शोखी पहल कर बैठे चर्चा हो गलत कृत
आप नासमझ नहीं जग को भी कह दिए
आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए।
धीरेन्द्र सिंह
26.12.2025
21.53
आप किससे कह दिए किसकी कहानी है
सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है
एक स्वप्न का जलता दिया दिखता सिरहाने
नित चित्र शब्दों का है सिजता रंग मनमाने
गहरी निगाहों में मिलती उसकी कद्रदानी है
सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है
ना समझें देह के अवयव की है यह गाथा
हृदय में उतर पाता वही यौवन देख भी पाता
एक ऊर्जा उन्मुक्त करती रहती मनमानी है
सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है
उम्र की गिनतियों से यौवन का क्या लेना-देना
हृदय जब तक जीवंत स्वप्नों का रहता बिछौना
जीवन है समस्या, संघर्ष ही का आग-पानी है
सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है।
धीरेन्द्र सिंह
26.12.2025
13.03
आप कहें शब्द या प्रारब्ध हैं
मत कहें कि आप आबद्ध हैं
एक धूरी का मैं भी तो समर्थक हूँ
पर विभिन्नता भाव का प्रवर्तक हूँ
हृदय का हृदय से अनजाना सम्बद्ध है
मन कहे कि आप आबद्ध हैं
आप तो स्वीकारती ना ही दुत्कारती
आप हृदय वाले को प्रायः संवारती
मेरे हृदय में आपकी चाहत बुद्ध है
मन कहे कि आप निबद्ध हैं
सहज संयत आपका अद्भुत संयम
मेरी पूंछें भावनाओं में उलझा जंगम
कौन जाने आपसे मेरा क्या संबंध है
मन कहे कि आप निबद्ध हैं।
धीरेन्द्र सिंह
24.12.2025
22.43
सत्य निष्ठा पुस्तकों की बानगी है
लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है
पहुंच जाना पा लेना पसारे डैना
घर से बहक जाने का चाल ले पैना
घर से दर्द उठता है भ्रम चाँदनी है
लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है
पति-पत्नी में पनप रहा है वैमनस्व
परिवार का कंपित हो रहा है घनत्व
अपनेपन प्यार की ना परवानगी है
लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है
हृदय में प्यार लहरे यही तो लक्ष्य है
घर के बाहर प्यार खोजना सत्य है
स्पंदनों में उभरती चाह रागिनी है
लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है।
धीरेन्द्र सिंह
24.12.2025
04.52
मुझे क्यों चुलबुली सी लगती हैं
मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती हैं
आप संग मेरा कोई रिश्ता नहीं है
पर मन मेरा भी सिजता वहीं है
कामनाओं की हदबंदी सी लगती है
मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती है
आप मर्यादित सागर की लहरें हैं
समाज, रिश्तों के लगे पहरे हैं
सहज पर छटपटाती सी लगती हैं
मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती है
एक यात्रा है और एक जीवन है
हो तुरपाई पर लगे न सीवन है
सांसे दूर से बुदबुदाई सी कहती हैं
मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती हैं
आप साफ न बोलतीं, लजजा है
मुझे मालूम संस्कार भी, छज्जा है
अपनी दीवारों में लरजती सी लगती हैं
मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती है।
धीरेन्द्र सिंह
23.12.2025
06.44Z
एक प्रेम रहा उपज कहीं तुम तो नहीं
तुम बिन उपजे प्रीत वह जमीं तो नहीं
एक दौर था तूफानी रचते नई कहानी
मैं भी दीवाना था तुम भी मेरी दीवानी
आज देखा तो पाया पलटते प्यार बही
तुम बिन उपजे प्रीत वह जमीं तो नहीं
सत्य है उनमें तुमसा प्यार रिसाव ना मिला
तुम थी तो जिंदगी थी कुछ शिकवे गिला
समझौता से कभी प्यार होता है क्या कहीं
तुम बिन उपजे प्रीत वह जमीं तो नहीं
यह तथ्य है कि तुमने मेरा तिरस्कार किया
प्रणय की संवेदना का उपचार क्या किया
हर व्यक्ति की कहानी रचना मेरी ही नहीं
तुम बिन उपजे प्रीत वह जमीं तो नहीं।
धीरेन्द्र सिंह
22.12.2025
06.18
किसी से न बातें या झगड़े में सौ बात
घृणा दर्शाता गलत है करना ब्लॉक
न बोलना या झगड़ना दर्शाता है अपनत्व
बिन बोले ब्लॉक करना अपराध का घनत्व
ब्लॉक कर जीवन से हटा दिया दिशा हाँक
घृणा दर्शाता गलत है करना ब्लॉक
अमावस का भाव है छंट जाएगा अंधियारा
चाँदनी जिसमें दिखे कर ब्लॉक ना दुत्कारा
लड़-झगड़ मनमुटाव पर स्नेह की आँख
घृणा दर्शाता गलत है करना ब्लॉक
सम्मान समक्ष व्यर्थ पद-पैसा-पकवान
स्वाभिमान मे अपनत्व-निजत्व-तत्वज्ञान
तोड़ दिया रिश्ता टपका गर्म लाल लाख
घृणा दर्शाता गलत है करना ब्लॉक।
धीरेन्द्र सिंह
2012.2025
17.01
सूर्य मुझसे लिपटता है प्रसन्न मना गुनगुनाऊँ
या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ
अनेक ज्योतिषाचार्य एक दशक से रहे बोल
सूर्य को जल चढ़ाएं उपलब्धि होगी अनमोल
सूर्य को मन प्रणाम करता सूर्योदय जब पाऊँ
या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ
सूर्य है तो सृष्टि है वहीं से ऊर्जा वृष्टि है
सूर्य सा जो तेजस्वी युग की नई दृष्टि है
सनातन में गहन डूब सत्य के समीप जाऊं
या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ
कुंडली में सूर्य कमजोर तो कैसी घबराहट
आत्म सूर्य कर प्रखर भर प्रयास गर्माहट
अंतर्मन की रश्मियों संग सूर्य ओर धाऊँ
या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ
पूजा-पाठ का भला क्यों कोई विरोध करे
पूजा-पाठ पद्धतियों में पर नव प्रयोग करें
सूर्य रश्मि स्पर्श से आशीष सूर्य का पाऊँ
या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ।
धीरेन्द्र सिंह
17-19.12.2025
22.45
शब्द सार्थक
प्रस्फुटित हैं भावनाएं उल्लसित हैं कामनाएं
शब्द सार्थक बन रहे हैं साज हम किसको सुनाएं
शोरगुल के धूल हैं सर्जना की हर राह पसर
कौन किसको पढ़े, सुने व्यक्तिगत जो न बताएं
शब्द भर हथेली हजारों कहें यह भी जगमगाए
शब्द सार्थक बन रहे हैं साज हम किसको सुनाएं
यदि कोई मिला और शब्द उनको लगा सुनाने
कठिन हिंदी बोलते हैं, कहें सहजता को अपनाएं
शब्द भी होते कठिन, सरल क्या, समझा ना पाए
शब्द सार्थक बन रहे हैं साज हम किसको सुनाएं
वस्त्र और व्यक्तित्व को ब्रांडेड से करें परिपूर्ण
शब्द अपरिचित लगे शब्द ब्रांडेड ना अपनाएं
भाषा की विशिष्टता उसके शब्द सामर्थ्य भूले
शब्द सार्थक बन रहे हैं साज हम किसको सुनाएं।
धीरेन्द्र सिंह
17.12.2025
18.36
मन ने उबालकर छान लिया है
यादों को सहेजना जान लिया है
मिल जाती हैं अशुद्धियां समय में
हो जाती यादें धूमिल ज्ञान लिया है
सब भूल पाना संभव कहां होता
कुछ यादों ने समेट जान लिया है
एक राग बसा है मन के तारों में कहीं
कर देता उजाला वही तान लिया है
यादों की जुगलबंदी की है महफ़िल
यही इश्क़ का दरिया है मान लिया है।
धीरेन्द्र सिंह
16.12.2025
09.00
खिंची प्रत्यंचा
प्रति व्यक्ति का यथार्थ
आज भी सत्य है
संघर्ष ही पुरुषार्थ,
मुस्कराहटें कमअक़्ली हैं
कौन जाने यथार्थ या नकली हैं
वर्तमान को व्यक्ति खेता है
मूलतः व्यक्ति अभिनेता है;
घर के संबंधों में
जुड़ाव निर्विवाद है
पर भावना कितनी कहां
इसपर मूक संवाद है,
चेतना की तलहटी पर
वेदना की फसल झूमे
मंडी में धूम मची
यह फसल बेमिसाल है;
विज्ञापन युग कौशल में
उत्पाद ही चमत्कार है
व्यक्ति हो रहा विज्ञापित
बाजार ही आधार है,
समय प्रदर्शन का है
दर्शन तो एक प्रकार है
तरंगित सतह लगे प्रबल
तलहटी को क्या दरकार है;
घर बदल रहा रूप
गृह ऋण का संवाद है
ईएमवाई पर जीवन जीना
अधिकांश का वाद है;
चार्वाक प्रबल बोलें
"ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत"
वर्तमान की क्रिया यही
सत्य यह निर्विवाद है।
धीरेन्द्र सिंह
14.12.2025
00.53
व्यक्ति निरंतर
ऊर्जाओं से घिरा है
कभी लगता समझदार
कभी लगे सिरफिरा है,
जीवन इन्हीं ऊर्जा लहरों में
खेल रहा है
व्यक्ति ऊर्जाओं से घिरा
बेल रहा है,
प्रतिकूल परिस्थितियां
या
अनियंत्रित भावनाएं
आलोड़ित कामनाएं
किसे कैसे अपनाएं,
इन्हीं झंझावातों को
झेल रहा है
व्यक्ति आसक्तियों से घिरा
गुलेल रहा है,
भंवर में संवरने का
संघर्षमय प्रयास
अंजुली भर नदी
रेगिस्तान सी प्यास,
आस में आकाश नव
रेल रहा है
वादियां गूंज उठी
कहकहा है,
खुद को निचोड़कर
निर्मलता का प्रयास
ताशमहल निर्मित कर
सबलता का कयास,
खुद से निकल खुद को
ठेल रहा है
कारवां से प्रगति का ऐसा
मेल रहा है।
धीरेन्द्र सिंह
13.12.2025
10.59
व्यक्ति जितना जीवन में संभल पाएंगे
स्वयं को और अभिव्यक्त कर पाएंगे
व्यक्ति निर्भर है किसी व्यक्ति पर ही
अकेला सोच कर व्यक्ति डर जाएंगे
हाँथ में हाँथ या कंधे पर थमा विश्वास
जुड़कर जीवनी जुगत कई कर जाएंगे
भीड़ में व्यक्ति अपनों को ही ढूंढता है
अपरिचित भीड़ भी तो व्यक्ति, कुम्हलायेंगे
निर्भरता स्वाभाविक है जीवन डगर में
मगर क्या आजन्म निर्भर रह पाएंगे
व्यक्ति आकर्षण है आत्मचेतनाओं का
वर्जनाओं में संभावनाएं तो सजाएंगे
मन है भागता कुछ अनजान की ओर
सामाजित बंधनों को कैसे तोड़ पाएंगे
तृप्त की तृष्णा में तैरती अतृप्तियां हैं
व्यक्ति भी व्यक्ति संग कितना संवर पाएंगे।
धीरेन्द्र सिंह
04.12.2025
06.51
गोवा
नहीं लिखूंगा नई रचना मन कहे नहीं
भावनाएं बोल उठीं करते हैं बतकही
अभिव्यक्तियाँ कभी भी रुकती नहीं
आसक्तियां परिवेश से हैं कटती नहीं
संभावनाएं उपजे हों घटनाएं चाहे कहीं
भावनाएं बोल उठीं करते हैं बतकही
अनुभूतियों का भावनाओं में जगमगाना
भावनाओं में अभिव्यक्तियों का कसमसाना
शब्दों में भाव घोलकर सम्प्रेषण रचें कई
भावनाएं बोल उठीं करते हैं बतकही
आदत है या ललक प्रतिदिन का लिखना
सृष्टि है स्पंदित तो कठिन है चुप रहना
कुछ उमड़-घुमड़ रहा पकड़ न पाएं अनकही
भावनाएं बोल उठीं करते हैं बतकही।
धीरेन्द्र सिंह
02.12.2025
06.13
एक काया अपनी सलवटों में भर स्वप्न
जीवन क्या है समझने का करती यत्न
झंझावातों में बजाती है नवऋतु झांझर
अपने सुख-दुख भेदती रहती है निमग्न
सृष्टि का महत्व अपने घनत्व तक तत्व
शेष सब निजत्व सबके अपने हैं प्रयत्न
कौन मुंशी किसकी आढ़त सत्य सांखल
देह अपनी अर्चना से दृष्टि गढ़ती सयत्न
अनुभूतियों की ताल पर देह का ही नृत्य
आत्मा अमूर्त अदृश्य मोक्ष भाव से संपन्न
अभिलाषाएं ले अपनी कुलांचें झूठे सांचे
कोई कहे तृप्ति लाभ तो कोई कहे विपन्न
काया ने भरमाया या काया से सब करपाया
मोह का तमगा लगा देह उपेक्षित आसन्न
आत्मा के पीछे दौड़ ईश्वर पर निरंतर तौर
काया, आत्मा भरमाती फिर भी सब प्रसन्न।
धीरेन्द्र सिंह
01.12.2025
07.53
उम्र में बांटकर हुआ क्या कभी प्यार
बीच फर्क उम्र का क्यों जतलाती यार
आत्मा से आत्मा का होता है जब अनुराग
तब कहीं तन्मयता से उभरती है प्रेम आग
प्यार एक संवेग है जिसपर कठिन अधिकार
बीच फर्क उम्र का क्यों जतलाती यार
कौन अति सम्पन्न कौन आत्मिक है पल्लवित
प्रणय की एक चिंगारी तत्क्षण करे समन्वित
प्रणय है सीमा परे हृदय पर हृदय अधिकार
बीच फर्क उम्र का क्यों जतलाती यार
प्रणय और परिणय में होता है व्यापक अंतर
प्रणय असीमित परिणय है सामाजिक मंतर
परिणय को प्रणाम प्रणय उन्मुक्तता का द्वार
बीच फर्क उम्र का क्यों जतलाती यार।
धीरेन्द्र सिंह
28.11.2025
21.36
बच्चे लड़ें सहज जीवन पढ़ें
अभिभावक ना आपस में नड़े
बच्चे खेलते हैं लड़ते-झगडते हैं
जीवन को समझते ऐसे बढ़ते हैं
यह स्वाभाविक विकास ना पचड़े
अभिभावक ना आपस में नडें
व्यस्त अभिभावक एक बच्चे तक
अभिभावक व्यस्त एकाकी बच्चे तक
भावनाएं मित्रों बीच लडखडाये, उड़े
अभिभावक ना आपस में लड़ें
एक बच्चे का बढ़ता हुआ है चलन
ख़र्चे बच्चे का रोकते हैं आगे जनन
बाल सुलभ चंचलता बाल संग बढ़े
अभिभावक ना आपस में लड़ें
दूसरों के घर दो बच्चे देख हो मुग्धित
सोचे वह होता दो नोक-झोंक समर्थित
एकल संतान अपनी भावनाओं से जड़े
अभिभावक ना आपस में लड़ें।
धीरेन्द्र सिंह
27.11.2025
05.47
ज्वालामुखी
कब दिखती है रौद्र
पहाड़ के भीतर
अपनी प्रक्रिया में
अनवरत
रहती है खौलती
ललक में,
क्रिया की प्रतिक्रिया
अथवा
प्रक्रिया की स्वक्रिया
शोधार्थी सक्रियता से
इस तूफानी उठान की
कर रहे विभिन्न खोज,
ज्वालामुखी क्रिया
निरंतर हर रोज,
फूटती हैं हृदय
हृदय की भी ज्वालामुखी
लक्षित प्यार पर
छा जाती है
राख की बादल बन,
एक आग संजोया है दिल
उमड़ती-घुमड़ती
चिंगारियों को समेटे,
सर्जना, अर्चना
शोध, प्रतिशोध
पाते अवरोध,
रचते -बसते-फड़कते
घूमते रहते हैं भीतर
व्यक्ति चलते रहता है
भीतर ज्वालामुखी संजोए,
ज्वालामुखी सक्रिय पहाड़
रहते हैं विभिन्न निगरानी में
यही तथ्य है जुड़ा
मानव की जिंदगानी में,
निष्क्रय पहाड़ को
स्थिर औंधे पाते हैं
इसीलिए यह पहाड़
प्रायः रौंदे जाते हैं।
धीरेन्द्र सिंह
26.11.2025
05.13
बार-बार हृदय देखे नयन वह बसा है
गबरू जवान यौवन धर्मेंद्र का नशा है
अपनी ही मस्तियों से बस्ती को हंसाए
सत्तर दशक की फ़िल्म की यही दशा है
स्वभाविक बदन सौष्ठव हृदय ही घड़कनें
धर्मेंद्र पुरुष पूर्ण थे उन्मुक्तता के कहकहे
शायरी कवित्व में उनके लगे फलसफा है
सत्तर दशक की फ़िल्म की यही दशा है
स्वप्न सुंदरी जिसका कई दशक रहा दीवाना
धर्मेंद्र और हेमा का था मुग्धित नया तराना
नृत्य इनका कब गीत-संगीत बीच फंसा है
सत्तर दशक की फ़िल्म की यही दशा है
अलमस्त हमेशा व्यस्त सब कुछ करते थे व्यक्त
गठीले बदन भीतर कवि हृदय हरदम आसक्त
एक बांकपन से जीवन में मथा कई नशा है
सत्तर दशक की फ़िल्म की यही दशा है।
धीरेन्द्र सिंगज
24.11.2025
19.16
विवाह का समय है यह तो
सभी करते हैं भरपूर श्रृंगार
डॉक्टर भी कितने नासमझ
कहें सर्दी कारण हृदय विकार
पुरुष भी सलोन में जाकर सजते
अबके पुरुष छवि को देते संस्कार
नारी पारंपरिक सज्जा आधिकारिणी
कैसी लग रही हूँ पूछें होकर तैयार
सौंदर्य सुनियोजित प्रायः है बोलता
दृष्टि प्रशंसात्मक बिन यौन विकार
चाह कर भी बोल न पाए "क्या बात"
कान उमेठ देगा सामाजिक आचार
हृदय के लचीलेपन की है परीक्षा
वैवाहिक दिन में ऐसी होती झंकार
सजिए खूब चमकिए पर्व इसी का
स्वयं की सुघड़ प्रस्तुति भी अधिकार।
धीरेन्द्र सिंह
23.11.2025
19.22
इनबॉक्स में आपसे चैट करना
कुछ होता निर्मित कुछ का ढहना
क्यों अच्छी लगती आपकी बातें
आप मित्र बन गईं अब क्या कहना
बच्चों जैसी होती उन्मुक्त सी बातें
करतीं आप अनुरोध प्यार ना कहना
अब तक आप पर ही बातें सभी हुईं
खुश हैं आप तो और मुझे क्या करना
मात्र परिचय समूह पोस्ट से हमारी
चेहरा, परिचय अज्ञात लगे यह सपना
आह्लादित, अंजोर हृदय अद्भुत लगता
लंबी-लंबी चैट हमारी कुहूक का गहना
प्यार आप ठुकराती कहती मित्र हैं हम
क्या मित्रता प्यार रहित होती है अंगना
दूरस्थ ऑनलाइन द्वारा शब्द भाव उभरे
जीवन कैसे मोड़ ले रही ओ मेरी सपना।
धीरेन्द्र सिंह
23.11.2025
06.20
किसी यकीन पर झिलमिलाती चाहत की बूंदे
एक दौर अपनी जिंदगी का सप्तरंगी सजाएं
किसी यथार्थ भूमि की परत खुरदरी यूँ बोले
एकल धमक की ललक को यूँ कैसे समझाएं
वह हिमखंड सा छोटा सिरा दुनिया को दिखलाए
वह ऐसी तो नहीं क्या पता कितने समझ पाए
पताका फहराने भर से विजय का क्यों निनाद
बात है कि सब संग जुड़ अपनों सा झिलमिलाएं
तुम एक द्वीप हो एक देश हो मनभावनी दुनिया
किनारे लोग आमादा क्या पता कौन पहुंच पाए
जो दूर है बदस्तूर है बस नूर है सुरूर अलहदा
यकीन क्यों न हो मोहब्बत उन्हें सोच खिलखिलाए।
धीरेन्द्र सिंह
21.11.2025
22.10
सामाजिक कुरीतियों पर कविता ना वार करे
ऐसे लेखन से भला संवेदनशील कैसे प्यार करे
प्यार एक जीवन है नहीं कुछ समय का तार
जिनमें नहीं वीरता उनका सच्चा नहीं प्यार
प्यार-प्यार लेखन भरा समस्याएं इंतजार करें
ऐसे लेखन से भला संवेदनशील कैसे प्यार करे
लेखन में धार हो रचनाकार में जग सरोकार
चेतन में तार हो तरंग पहुंचे लोगों तक सार
शब्द लिख दिया बिन डूबे क्रिया पथधार करें
ऐसे लेखन से भला संवेदनशील कैसे प्यार करें
वामपंथी लेखन की ओर कतई नहीं है ईशारा
लेखन यथार्थ हो तो मिले जीवन को सहारा
कुछ सोचे तथ्य नोचे समीक्षा भी कथ्यवार करे
ऐसे लेखन से भला संवेदनशील कैसे प्यार करे।
धीरेन्द्र सिंह
28.11.2025
05.22
क्या संभव है दिल एक से जुड़ा रहे
जोंक सा चिपक जाए नहीं उड़ा रहे
इस असंभव को सभी प्रेमी स्वीकारते
हृदय जैसे नग है अंगूठी में जड़ा रहे
चित्त चंचल प्रवृत्ति है आकर्षण स्वभाव
कौन है जो रात्रिभर चाँद संग खड़ा रहे
प्यार भी तो एक सावनी फुहार सा है
पुलकन, सिहरन लिए बारिशों में पड़ा रहे
विवाह एक धर्म है कर्म सामाजिक निभाना
परिवार की संरचना में जीवन मूल्य मढ़ा करे
दायित्व परिणय है आजीवन निभाने के लिए
हृदय को कौन बांध पाया यह फड़फड़ा तरे।
धीरेन्द्र सिंह
21.11.2025
05.23
सुन रहा हूँ सत्य के अभिमान को
गुन रहा हूँ कथ्य के नव मचान को
आप केंद्र में एक संभावना बन सुनें
कुछ प्रवक्ता चैनल के भव विद्वान को
चैनलों के कुछ एंकर भूल रहे हिंदी
कुछ प्रवक्ता सक्रिय भाषा अपमान को
आप जनता हैं तो सुनिए यही प्रतिदिन
कौन कहे मीडिया के भाषा नादान को
हिंदी को करता दूषित है हिंदी चैनल
हिंदी शब्द बलि चढ़े अंग्रेजी मान को
कुछ एंकर कुछ प्रवक्ता लील रहे हिंदी
आप कहीं ढूंढिए अब हिंदी भगवान को।
धीरेन्द्र सिंह
19.11.2025
19.22
सर्दियों में सिहर गईं गुठलियां
माटी भी ऊष्मा अपनी खोने लगी
ऋतु परिवर्तन है या आकस्मिक
घाटी भी करिश्मा से रोने लगी
सर्दियों की बनी थीं कई योजनाएं
कामनाएं गुठली को संजोने लगी
वादियों की तेज हवा मैदानी हो गयी
भर्तस्नायें जुगत सोच होने लगीं
सुगबुगाहट युक्ति की प्रथम आहट
सर्दियां थरथराहट आदतन देने लगी
गुठलियां जुगत की जमीन रचीं
उर्वरक अवसाद भाव बोने लगीं
मौसम परास्त कर न सका गुठलियां
पहेलियां गुठली नित रच खेने लगीं
कल्पना के चप्पू से दूर तलक यात्रा
गुठलियां जमीन को स्वयं पिरोने लगीं।
धीरेन्द्र सिंह
19.08
17.11.2025
पोषण है कि शोषण रहे हैं उलझाए
एयरपोर्ट पर नारी रुदन चिंता जगाए
मौन हैं दुखी है या निरुत्तर है मायका
नेतृत्व परिवार नेतृत्व क्यों सकपकाए
अंग अपना दान करती पिता को पुत्री
उसी अंगदान को भंगदान कह चिढाएं
मीडिया के सामने अविरल बही अश्रुधारा
मायका रहा शांत जो सुना वह बुदबुदाए
भैया की कलाई पर अटूट विश्वासी राखी
मस्तक रचि तिलक मुहँ मीठा बहन कराए
कर त्याग मायके का कदम उठाए नारी यदि
अटूट रिश्ता है दरका समाज कैसे संवर पाए।
धीरेन्द्र सिंह
16.11.2025
21.38
हृदय का हृदय से हो आराधना
पूर्ण हो प्रणय की प्रत्येक कामना
आप निजत्व के महत्व के अनुरागी
मैं प्रणय पुष्प का करना चाहूं सामना
तत्व में तथ्य का यदि हो जाये घनत्व
महत्व एक-दूजे का हो क्यों धावना
सामीप्य की अधीरता प्रतिपल उगे
समर्पण की गुह्यता को क्यों साधना
छल, कपट, क्षद्म का सर्वत्र बोलबाला
पहल भी कैसे हो वैतरणी है लांघना
कल्पना की डोर पर नर्तक चाहत मोर
प्रणय का प्रभुत्व ही सर्वश्रेष्ठ जागना
कहां गहन डूब गए रचना पढ़ते-पढ़ते
मढ़ते नहीं तस्वीर यूँ यह है भाव छापना
अभिव्यक्तियाँ सिसक जब मांगे सम्प्रेषण
निहित अर्थ स्वभाव चुहल कर भागना।
धीरेन्द्र सिंह
15.11.2025
23.15
तन मय होकर हो जाते हैं तन्मय
मन मई होकर सज जाते हैं उन्मत्त
यही जिंदगी की चाहत है अनबुझी
इसको पाकर तनमन हो जाते हैं मस्त
तन की सेवा तन की रखवाली प्रथम
मन क्रम, सोच से हो जाता है बृहत्त
इन दोनों से ही हर संवाद है संभव
बिन प्रयास क्या हो जाता है प्रदत्त
चेहरे की आभा में सम्मोहन आकर्षण
नयन गहन सागर मन मोहित आसक्त
प्यार की नैया के हैं खेवैया लोग जमीं के
जी लें खुलकर ना जाने कब हो जाए अस्त।
धीरेन्द्र सिंह
15.11.2025
07.48
ब्रेकअप कहां की संस्कृति है
एक्स है कहना प्रगति रीति है
प्यार होकर टूट भी जाता है कहीं
कौन जाने किस जग की नीति है
आकर्षण को समझ लेते जो प्यार
प्यार की यही सबसे बड़ी कुरीति है
लुट गया लूट लिया दिल किसी का
कभी न भूल पाए आत्मा का गीत है
प्रणय का समय संग होते हैं प्रकार
अभिव्यक्ति बदलती वैसी संगति है
आत्मा का आत्मा में विलय हो जाता
समर्पित होती उसी प्रकार मति है
एक से अधिक प्यार संभव हो गया
प्रौद्योगिकी की भी इसमें सहमति है
एक बार प्यार हुआ छूटता कभी नहीं
चाहत की दुनिया में यही सम्मति है।
धीरेन्द्र सिंह
13.11.2025
22.39
कभी इधर कभी उधर, दृष्टि से गये उतर
सर्वधर्म समभाव डगर, सृष्टि में दिखे किधर
हिन्दू संस्कृति को हिन्दू हैं कितना जानते
हिंदुत्व का प्रवाह प्रखर कई नहीं जानते
कर्म आकृति हिंदुत्व अखंड भारत का सफर
सर्वधर्म समभाव डगर, सृष्टि में दिखे किधर
धर्म की नहीं बात करें, लोग समझते अपराध
धर्म की परिभाषा गलत, लक्ष्य कुछ रहे साध
हिन्दू राष्ट्र भारत है, इसे बोलने में कांपे अधर
सर्वधर्म समभाव डगर, सृष्टि में दिखे किधर
एक वर्ग भटक रहा जबकि बेजोड़ घटक रहा
सर्वधर्म हो पल्लवित स्वाभाविक हिन्दू राष्ट्र कहा
राष्ट्र लय में सब मिल थिरकें धर्म का करते कदर
सर्वधर्म समभाव डगर, सृष्टि में दिखे किधर।
धीरेन्द्र सिंह
12.11.2025
19.34
चुपके से हो रहे थे आतंकी आबाद
हंगामा रच रहा था शांत फरीदाबाद
पुस्तकों की बौद्धिकता पर करते बातें
बुद्धिजीवी सोचें अभिशाप कैसे बांटे
डॉक्टरों की टीम का है यह विवाद
हंगामा रच रहा था शांत फरीदाबाद
उच्च शिक्षित का किनसे गलत नाते
कौन वह प्रबुद्ध जिनसे डॉक्टर नाचे
हतप्रभ होकर इन डॉक्टरों पर संवाद
हंगामा रच रहा था शांत फरीदाबाद
उच्च शिक्षितों में भी गंवारपन आगे
कैसे सम्मान के यूँ निर्दोष रहें धागे
एक विश्वास टूटकर किया गंदा निनाद
हंगामा रच रहा था शांत फरीदाबाद।
धीरेन्द्र सिंह
11.1१.2025
20.46
देह मंदिर सा लगे है
नेह लगे अति समीप
भावना की हवा बहे
हृदय लौ बन दीप
कल्पनाओं की बजे घंटियां
कामनाओं के भजन गीत
अर्चना थाली सा मन बने
वर्जनाएं मिटें मिल दीप
ओस सा मुख निर्मल
कजरारी आंखों की रीत
गाल डिम्पल गहन गूढ़
चेतना चपल मिल मीत
एक आकार से साकार
देह भक्ति मन प्रीत
साकार में ही संसार
देह ध्येय तन दीप।
धीरेन्द्र सिंह
09.11.2025
11.38
भगवती माँ की नित करे अर्चना
सहमति जग की कृति करे अर्चना
सनातन राह पर अटल चले जो
हिन्दू संस्कृति की होए निज सर्जना
मातृ शक्ति स्वरूपा भारत देश हमारा
सिंह आरूढ़ शस्त्र धारिणी की गर्जना
सर्वधर्म को आश्रय यहां विस्मित है जहां
हिन्दू संस्कृति इतर धर्म की ना करे भर्त्सना
माँ भगवती विविध रूप में सब में समाई
जिसने माँ को पा लिया मील दिव्य अंजना
भगवती की कृपा रहे भक्तों पर फलदायी
नत होकर आत्मा करे माँ भगवती की अर्चना।
धीरेन्द्र सिंह
09.11.2025
08.23
मैं कभी नहीं लिखता
कविता
नहीं है संभव किसी के लिए
लिख पाना कविता,
स्वयं कविता चुनती है
रचनाकार और ढल जाती है
रचनाकार के शब्दों में
बनकर कविता,
जीवन के विभिन्न भाव
छूते हैं मन को
और मस्तिष्क लगता है सोचने
वह भाव,
मन की तरंगें उठती हैं
लहराती हैं
और देती हैं मथ
मनोभावों को
और जग उठती है कविता,
रचनाकार उस भाव तंद्रा में
पिरो देता है
उन भावनाओं को
अपने शब्दों में,
संवर जाती है कविता,
रचनाकार नहीं लिखता
अपने आप को
निर्मित कर किसी भाव को,
ऐसे नहीं लिखी जाती
कविता,
भाव के भंवर जब
बन जाते हैं लहर
शब्दों में लिपट
जाती है कविता संवर।
धीरेन्द्र सिंह
08.11.2025
20.04
अर्धरात्रि हो चली है
और मन
किसी महिला से
चैट करने को आमादा है,
प्रयास मेसेंजर को
खंगाल लिया पूरा
कोई भी ऑनलाइन नहीं,
कामनाएं पुष्पित हो
चाहत की सुगंध
कर रही हैं प्रसारित,
कोई भी ऑनलाइन नहीं
यही तथ्य है
और सुविचारित,
अर्धरात्रि को मन
प्यार की बात करे
यह पुरानी सोच है,
कोई मिले अपने सा
जिससे कह दें
भावनाओं में मोच है,
बड़े कारगर होते हैं
नारीत्व के विवेक धावक
कर देते हैं व्यवस्थित
चुटकियों में
सबकुछ,
एक बार फिर टटोला
मेसेंजर को
कोई नारी ऑनलाइन नहीं,
इसे ही कहते हैं भाग्य
प्रारब्ध के संवाहक यही,
हंसी आ रही है आपको
हम यूँ एकल बह जाएं
इससे अच्छा कि
हम सो जाएं।
धीरेन्द्र सिंह
07.11.2025
23.26
धुंध और गहरा हो रहा है
जीवन फिर भी
नहीं थमा है,
यह जीवन दृश्य है
व्यक्ति फिर भी
नहीं रमा है,
संबंधों की सर्दियां
ऐंठ रही है उन्मत्त
गर्माहट संघर्षरत है
तापमान संतुलन में,
एक अलाव जल नहीं रहा
सुलग रहा है
जिसका उठता धुआं
धुंध की कर रहा सहायता,
व्यक्ति इन जटिलताओं में
बना रहा पुष्पवाटिका
चहारदीवारी के बीच
और सोच रहा कि
जो खटखटाएगा
प्रवेश पाएगा,
सब कुछ गोपनीय है
पुष्पवाटिका भी
और सुगंध भी,
संबंधों की सर्दियों
गहराता कोहरा
अलाव से उठता धुआं
सब अस्पष्ट सा, अनचीन्हा सा
फिर भी व्यक्ति
हथेलियों में ऊष्मा छुपाए
भित्ति सा खड़ा है
ठिठुरते
एक पहल की
प्रतीक्षा में।
धीरेन्द्र सिंह
07.11.2025
05.22
सुनता हूँ प्रायः
अपने भीतर की आवाज़ें
जो मात्र मेरी ही नहीं
उन अनेक लोगों की है
आवाज
जो गुजरे हैं मेरे हृदय से,
अनेक छूट गए हैं
जीवन राह में,
अनेक शत्रु बन गए हैं
अनेक तटस्थ भाव में हैं
जो पहले अभिन्न हुआ करते थे,
इनमें से कोई नहीं बोलता
कोई मोबाइल पर नहीं पुकारता
फिर भी
आती है आवाज,
आवाज ?
कोई बोलता नहीं तो
किसकी आवाज ?
कैसी जिह्वा ध्वनि?
यहां उभरा प्रश्न
क्या मात्र जिह्वा ही
माध्यम है ध्वनि का ?
हृदय में अनेक पदचिन्ह
बोलते हैं,
स्मृतियों के झोंके
कर जाते हैं बातें,
अब नहीं सुहाते
जिव्हा के बोल
क्योंकि मिलावट होने लगी है
शब्दों में, अर्थहीन, प्रयोजनहीन
इसलिए सच्ची लगती हैं
आ0ने भीतर की आवाज।
धीरेन्द्र सिंह
05.11.2025
21.40
कभी अनुभव किया है आपने
धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में
धर्म के स्पंदन,
होते हैं ऊर्जावान
नीतिवान
और सृष्टि संचयन में
निमग्न,
कभी देखा है आपने
धर्मों के धर्मपालक को
एक विशिष्ट रंग,
एक विशिष्ट ढंग,
एक अभिनव कार्यप्रणाली,
देते यथोचित उत्तर
यदि पूछे
कोई जिज्ञासू भक्त,
बदल दिए जाते हैं अर्थ
सार्थक अभिव्यक्तियों के,
चुपचाप बढ़ते पदचाप
और जतलाते हैं
वसुधैव कुटुंबकम को
विश्व जीतने का ख्वाब,
धर्म को दृढ़ता से
करना होगा स्थापित
अपनी परिभाषाएं,
अर्थ का अनर्थ न हो
अपने मन से क्यों अर्थ गढ़ो,
रोकता है धर्मनिरपेक्ष विचार,
नींव मजबूत है पर
होनी चाहिए सशक्त दीवार।
धीरेन्द्र सिंह
39.10.2025
19.33
साथ कोई चलता नहीं, चले अपने कदम
यह है मेरा वह चितेरा, हैं सुंदर सपने वहम
जीवन के अंकगणित में है जोड़ना-घटाना
लक्ष्य की चुनौतियों में प्रयास कष्ट घटाना
समझौतों की स्वीकार्यता कभी खुश तो सहम
यह है मेरा वह चितेरा, हैं सुंदर सपने वहम
यदि बंधे नहीं मानव सहज न जी है पाता
एक भीड़ न हो परिचित जीवन लगे अज्ञाता
अपने को छोड़ सबसे जुड़ा लगे सशक्त कदम
यह है मेरा वह चितेरा, हैं सुंदर सपने वहम
जीने की एक आदत को समझते हैं प्रायः प्यार
कितना चले कोई अगर छोड़ दे अपना पतवार
स्वार्थ अति महीन रूप में जाए पनपाते दहन
यह है मेरा वह चितेरा, हैं सुंदर सपने वहम।
धीरेन्द्र सिंह
30.10.2025
19.25
सुनो प्यार करने के लिए जानना जरूरी है
सितारे भरे आकाश हेतु जागना जरूरी है
सुलग गयी हृदय में भाव कुछ नई खिली
उस भाव से भी भागना कहो क्या जरूरी है
तुमसे मुझे प्यार है कहना नहीं है दबंगता
प्यार कसकर छुपा लें यह कैसी मजबूरी है
हृदय के स्पंदन कर रहें आपका अभिनंदन
चीख चिल्लाकर कहना प्यार क्या जरूरी है
हाँ जो बंध गए हैं बंधनों में समाज खातिर
ऐसे लोग नहीं मानव चर्चा क्या जरूरी है
व्यक्ति स्वयं के स्पंदनों संग जी ना सके तो
स्वतंत्र व्यक्ति नहीं वह उसकी बात अधूरी है
चंचल नहीं प्रांजल नहीं आदर्शवादिता नहीं
जीवन की सहज कामनाएं भी जरूरी है
सहज व्यक्ति सा सीमाओं संग उड़ रहे हैं
आप संग उड़ें ना उड़ें नहीं यह मजबूरी है।
धीरेन्द्र सिंह
29.10.2025
20.26
चाहे तो जिंदगी समेट सब विषाद लें
चाहें तो बंदगी आखेट से प्रसाद लें
दर्द, दुख, पीड़ा की चर्चा समाज करे
चाहे तो हदबन्दगी में तुमसे उल्लास लें
व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी, पुरानी बात
प्रौद्योगिकी प्रमाणित जरूरी नहीं साथ लें
प्यार मनकों सा टूट रहा बिखर रहा बिफर
तृष्णा अपनी समझ परे फिर क्यों प्यास लें
चार लोग मिल गए उभर पड़ी वहां चतुराई
रंगराई की अंगड़ाई में तनहाई आजाद लें
तुरपाई की रीति निभाई बौद्धिक लुढ़कन
भौतिक ही यथार्थ का हितार्थ आस्वाद लें
कौन जिए उन्मुक्त घुटन की अनुभूतियाँ
एक तुम जिससे मनीषियों का नाद लें
सहज, शांत, सुरभित मिलने पर तुमसे
और कहीं भटकें तो परिस्थितियां विवाद दें।
धीरेन्द्र सिंह
28.10.2025
22.15
कल्पनाओं में वही सूरज उगता है
मन उचटता है
याद है प्रातः आठ बजे की नित बातें
ट्रेन दौड़ती स्टेशन छूटता है न यादें
मन बौराया वहीं अक्सर भटकता है
मन उचटता है
कैसे पाऊं फिर वही सुरभित सी राहें
कहां मिलेगी हरदम घेरे रसिक वह बाहें
कभी-कभी तड़पन देता आह उछलता है
मन उचटता है
अब भी बोलता मन है अक्सर भोर में
तुम क्या सुन पाओगी हो तुम शोर में
यादों की टहनी पर नया भोर तरसता है
मन उचटता है।
धीरेन्द्र सिंह
26.10.2025
07.11
शब्दों की थिरकन पर सजा भावना की आंच
पीयूष पांडेय लिखते जग मुस्कराते रहता बांच
भारतीय विज्ञापन का यह गुनगुनाता व्यक्तित्व
सरल शब्दों में प्रचलित कर दिए कई कृतित्व
हिंदी को संवारे विज्ञापन की दुनिया में खांच
पीयूष पांडेय लिखते जग मुस्कराते रहता बांच
हिंदी न उभरती न होती आज ऐसी ही महकती
विज्ञापन की हो कैसी भाषा हिंदी न समझती
जो लिख दिए जो रच दिए अमूल्य सब उवाच
पीयूष पांडेय लिखते जग मुस्कराते रहता बांच
दशकों से हिंदी जगत में पीयूष की निरंतर चर्चा
इतने कम शब्दों में सरल हिंदी का लोकप्रिय चर्खा
आदर, सम्मान, प्रतिष्ठा से हिंदी विज्ञापन दिए साज
पीयूष पांडेय लिखते जग मुस्कराते रहता बांच।
धीरेन्द्र सिंह
26.10.2025
05.41
भक्ति में डूबी वह बोलीं
हम कुछ दूरी रखते हैं
मैंने कहा जिसे मन चाहा
हम तो करीबी रखते हैं
धन्यवाद कर प्रणाम इमोजी
बोलीं भाव कदर करते हैं
पढ़कर रहे सोचते हम
भक्ति किसे सब कहते हैं
उन्होंने कहा करीबी गलत
खुद पर कंट्रोल रखिए
भक्ति कंट्रोल संग हो कैसे
अचल हैं क्या जी, कहिए
भक्ति में अब भी लिंगभेद
पुरुष-स्त्री विभक्त रहिए
मन कहां वश में जानें
साधना और गहन करिए।
धीरेन्द्र सिंह
24.10.2025
18.41
सांध्य बेला हो चुकी प्रकाश में बदले बेरस
पूजा-अर्चना घर-घर गूंजे कुहूका धनतेरस
अत्यावश्क हुई खरीद भक्ति भाव अविरल
कथ्यों पर युग बढ़ चला होता भाव विह्वल
आस्था जीवन को मढ़ी हर पीड़ा कर बेबस
पूजा-अर्चना घर-घर गूंजे कुहूका धनतेरस
समरसता की दृष्टि निरंतर होती विकसित
भारत भूमि इसीलिए जग करे आकर्षित
धन-धान्य सुख-वैभव की प्रसारित कर रस
पूजा-अर्चना घर-घर गूंजे कुहूका धनतेरस
दिया लौ द्वार से लेकर घर के कोने-कोने
हर घर में खुशियां छलकाए नयन-नयन दोने
जो भी कामना आशीष देकर ईश्वर प्रेम बरस
पूजा-अर्चना घर-घर गूंजे कुहूका धनतेरस।
धीरेन्द्र सिंह
18.10.2025
20.06
एक सदाचार धारक व्यक्ति
अतिभ्रष्ट देश में जन्म ले
वह क्या कर पाएगा
तिनके सा बह जाएगा,
आश्चर्य
काव्य में उभरा
राजनीतिक नारा,
सभ्यता सूख रही
राजनीति ही धारा ;
हिंदी साहित्य भी
क्या राजनीति वादी है
सदाचार गौण लगे
राजनीति हावी है ;
कौन कहे, कौन सुने
अपनी पहचान धुने
समूह राजनीति भरे
मंच भी अभिमान गुने,
करे परिवर्तन
राजनीति करे मर्दन,
हिंदी उदासी है
नई भाषा प्रत्याशी है ;
देवनागरी लेखन की अंतिम पीढ़ी
अदूरदर्शी चिल्लाते हिंदी संवादी
भारतीय संविधान पढ़ लें तो
ज्ञात हो है हिंदी विवादित।
धीरेन्द्र सिंह
10.10.2025
19.19
गमन
वादियां
यदि प्रतिध्वनि न करें
नादानियाँ
यदि मति चिन्हित न रखें
कौन किसे फिर भाता है
मुड़ अपने घर जाता है
मुनादियाँ
यदि अतिचारी हों
टोलियां
यदि चाटुकारी हों
कौन पालन कर पाता है
मौन चालन कर जाता है
जातियां
यदि पक्षपात करें
नीतियां
यदि उत्पात करें
कौन सहन कर पाता है
मार्ग गमन कर जाता है।
धीरेन्द्र सिंह
10.10.2025
11.50
कोहराम है जीवन आराम कब करें
मुस्कराएं भी ना क्यों यह हद करें
सब ठीक है ईश्वर की कृपा बनी है
कैसे कहे मन की अपनों में ठनी है
विषाद भरा मन अधर क्षद्म मद भरे
मुस्कराएं भी ना क्यों यह हद करें
अभिभावक, दम्पत्ति भी करें अभिनय
सामाजिक दायरै में दिखावे का विनय
संतान देख परिवेश उसी ओर डग भरें
मुस्कराएं भी ना क्यों यह हद करें
अपवाद कभी भी नियम नहीं होता
मुक्ति कहां देता कलयुग का गोता
वैतरणी कब मिलेगी है जग डरे
मुस्कराएं भी ना क्यों यह हद करें।
धीरेन्द्र सिंह
19.12
09.10.2025
#कोहराम#मुस्कराएं#दम्पत्ति#वैतरणी
आपके व्यक्तित्व में ही अस्तित्व
निजत्व के घनत्व को समझिए
अपनत्व का महत्व ही तो सर्वस्व
सब कुछ स्पष्ट और ना उलझिए
प्रपंच का नहीं मंच भाव जैसे संत
शंख तरंग में भाव संग लिपटिए
हृदय के स्पंदनों में धुन आपकी
निवेदन प्रणय का उभरा किसलिए
आप ही से क्यों जुड़ा मन बावरा
दायरा वृहद था आपको जी लिए
आप समझें या न समझें समर्पण
अर्पण कर प्रभुत्व को तृष्णा पी लिए।
धीरेन्द्र सिंह
09.10.2025
06.35
मन की अंगड़ाईयों पर मस्तिष्क का टोल
क्या उमड़-घुमड़ रहा अटका मन का बोल
तरंगों की चांदनी में प्रीत की रची रागिनी
शब्दों में पिरोकर उनको रच मन स्वामिनी
नर्तन करता मन चाहे बजे प्रखर हो ढोल
क्या उमड़-घुमड़ रहा अटका मन का बोल
अभिव्यक्त होकर चूक जातीं हैं अभिव्यक्तियाँ
आसक्त होकर भी टूट जाती हैं आसक्तियां
यह चलन अटूट सा लगता कभी बस पोल
क्या उमड़-घुमड़ रहा अटका मन का बोल
यह भी जाने वह भी माने प्रणय की झंकार
बोल कोई भी ना पाए ध्वनि के मौन तार
कहने-सुनने की उलझन मन का है किल्लोल
क्या उमड़-घुमड़ रहा अटका मन का बोल।
धीरेन्द्र सिंह
07.10.2025
21.26
#मन#चांदनी#उमड़-घुमड़#प्रणय#किल्लोल
अभिनय
अपूर्णता सुधार में सर्जक बन क्षेत्री
अभिनय हैं करते अभिनेता-अभिनेत्री
हम सब स्वभावतः अभिनय दुकान हैं
जितना अच्छा अभिनय उतना महान है
कामनाएं पूर्ति में सजग प्रयास की नेत्री
अभिनय हैं करते अभिनेता-अभिनेत्री
अब कहाँ सामर्थ्य बिन आवरण बहें
असत्य को सत्य सा प्रतिदिन ही कहें
बौद्धिक हैं विकसित हैं मानवता गोत्री
अभिनय हैं करते अभिनेता-अभिनेत्री
क्षद्म रूप विवशता है जग की स्वीकार्य
स्वार्थ ही प्रबल दिखावा कुशल शिरोधार्य
समाज प्रगतिशील हैं व्यक्ति बंद छतरी
अभिनय हैं करते अभिनेता-अभिनेत्री।
धीरेन्द्र सिंह
07.10.2025
04.31
आँधियाँ
प्रतिदिन दुख-सुख की आंधियां हैं
व्यक्ति तैरता समय की कश्तियाँ हैं
रहा बटोर अपने पल को निरंतर ही
कहीं प्रशंसा तो कहीं फब्तियां हैं
अर्चनाएं टिमटिमाती जुगनुओं सी
कामनाओं की भी तो उपलब्धियां हैं
हौसला से फैसला को फलसफा बना
दार्शनिकों सी उभरतीं सूक्तियाँ हैं
जूझ रहा हवाओं से लौ की तरह
पराजय में ऊर्जा की नियुक्तियां हैं
अपना जीवन रंग रहा बहुरंग सा
रंगहीन हाथ लिए कूंचियाँ है
अर्थ कभी सम्बन्ध तो मिली उपलब्धि
जिंदगी बिखरी इनके दरमियाँ हैं
वही नयन आज भी उदास से हैं
सख्ती बढ़ रही अब कहाँ नर्मियाँ हैं।
धीरेन्द्र सिंह
05.10.2025
16.39
अपनी अभिव्यक्तियों की आसक्तियां हैं
कैसे रोकें कि कई नियुक्तियां हैं
हृदय में किसने कहा है रिक्तियां
अनेक लिए आग्रह तख़्तियाँ है
कई विकल्प लुभाने को हैं आतुर
वश में कर लिए उनके दरमियाँ हैं
कहीं तो ठंढी सांसे ढूंढें सरगम
चलन चहक उठा बढ़ी गर्मियां है
कई चिल्ला रहे बढ़ता हुआ शोर है
जो हैं समर्थ उनकी मनमर्जियाँ है
अलाव हथेलिगों में लेकर चल पड़े
पड़नेवाली गजब की जो सर्दियां है।
धीरेन्द्र सिंह
03.10.2025
14.41
हिंदी के सिपाही - गौतम अदाणी
अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी दिनांक 22 सितंबर 2025 को एक निजी चैनल पर लाइव थे। आज रुककर अदाणी को सुनने का मन किया इसलिए चैनल नहीं बदला। अंग्रेजी में चार-पांच वाक्य बोलने के बाद अंग्रेजी में बोले गए वाक्यों को अदाणी ने हिंदी में कहा वह भी काव्यात्मक रूप में। यह सुनते ही स्क्रीन पर मेरी आँख ठहर गयी। अदाणी ने फिर अंग्रेजी में कहा और भाव और विचार को काव्यात्मक हिंदी में प्रस्तुत किये। ऐसा चार बार हुआ। आरम्भ से नहीं देख रहा था अचानक चैनल पर टकरा गया था।
सत्यमेव जयते कहकर अदाणी ने अपना संबोधन पूर्ण किया और मैं तत्काल इस अनुभूति को टाइप करने लगा। हिंदी दिवस 14 सितंबर को अपनी महत्ता जतलाते और विभिन्न आयोजन करते पूर्ण हुआ किन्तु इस अवधि में कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं मिला जिसे टाइप करने की अब जैसी आतुरता जागृत हुई हो। अंग्रेजी में बोलनेवाले किसी भी चेयरमैन को अंग्रेजी और फिर काव्य में उसी भाव को दो या अधिकतम चार पंक्तियों में बोलते अदाणी से पहले किसी को नहीं देखा।
क्यों टाइप कर रहा हूँ इस अनोखी घटना को ? एक श्रेष्ठतम धनाढ्य गौतम अदाणी हैं इसलिए ? यह सब नहीं है इस समय विचार में बस हिंदी है। हिंदी यदि अदाणी जैसे चेयरमैन की जिह्वा पर काव्य रूप में बसने लगे तो हिंदी कार्यान्वयन में इतनी तेजी आएगी कि स्वदेशी वस्तुओं पर स्वदेशी भाषा और विशेषकर हिंदी होगी। एक सुखद संकेत मिला और लगा हिंदी अपना स्थान प्राप्त कर भाषा विषयक अपनी गुणवत्ता को प्रमाणित करने में सफल रहेगी। मैंने चेयरमैन गौतम अदाणी के मुख से अपने संबोधन में कई बार हिंदी कविता का उपतोग करने की कल्पना तक नहीं थी।
धीरेन्द्र सिंह
22.09.2025
15.37
आज प्रारंभ है अर्चनाओं का आलम्ब है
शारदेय नवरात्रि यूं मातृशक्ति का दम्भ है
अपनी-अपनी हैं विभिन्न रचित भूमिकाएं
श्रद्धा लिपट माँ चरणों में आस्था को निभाए
नव रात्रि नव रूप माता का निबंध है
शारदेय नवरात्रि यूं मातृशक्ति का दम्भ है
सनातन धर्म जीवन मार्ग सज्जित बतलाएं
नारी का अपमान हो तो कुपित हो लजाएं
नवरात्रि नव दुर्गा आदि शक्ति ही अनुबंध हैं
शारदेय नवरात्रि यूं मातृशक्ति का दम्भ है
माँ का आक्रामक रूप राक्षस संहार के लिए
मनुष्यता में दानवता भला जिएं किसलिए
नारी ही चेतना नारी शक्ति भक्ति आलम्ब है
शारदेय नवरात्रि यूं मातृशक्ति का दम्भ है।
धीरेन्द्र सिंह
22.09.2025
07.54
सुनो, मेरी मंजिलों की तुम ही कारवां हो
तुम कहीं भी रहो पर तुम ही ऋतु जवां हो
वह भी क्या दिन थे जब रचे मिल ऋचाएं
तुम भी रहे मौन जुगलबंदी हम कैसे बताएं
मैं निरंतर प्रश्न रहा उत्तर अपेक्षित बयां हो
तुम कहीं भी रहो पर तुम ही ऋतु जवां हो
सर्द अवसर को तुम कर देती थी कैसे उष्मित
अपनी क्या कहूँ सब रहे जाते थे हो विस्मित
श्रम तुम्हारा है या समर्पण रचित रवां हो
तुम कहीं भी रहो पर तुम ही ऋतु जवां हो
वर्तमान भी तुम्हारी निर्मित ही डगर चले
कामनाओं के अब न उठते वह वलबले
सब कुछ पृथक तुमसे फिर भी दर्मियां हो
तुम कहीं भी रहो पर तुम ही ऋतु जवां हो।
धीरेन्द्र सिंह
21.09.2025
22.27
संस्कार हैं संस्कृति, हैं मन के दर्पण
उन अपने स्वर्गवासियों का है तर्पण
रक्त में व्यक्त में चपल चेतना दग्ध में
शब्द में प्रारब्ध में संवेदना आसक्त में
दैहिक विलगाव पर आत्म आकर्षण
उन अपने स्वर्गवासियों का है तर्पण
पितृपक्ष नाम जिसमें सभी बिछड़े युक्त
देह चली जाए पर लगे आत्मा संयुक्त
भावना की रचना पर हो आत्मा घर्षण
उन अपने स्वर्गवासियों का है तर्पण
मनुष्यता उन अपनों के प्रति है कृतज्ञ
आत्मा उनकी शांत मुक्ति का है यज्ञ
श्रद्धा भक्ति से उनके प्रति है समर्पण
उन अपने स्वर्गवासियों का है तर्पण।
धीरेन्द्र सिंह
21.09.2025
06.40
सत्यस्वरूपा दर्पण मुझे क्या दिखलाएगा
नयन बसी छवि मेरी वही तो जतलाएगा
सृष्टि में बसे हैं भांति रूप लिए जीव
दृष्टि में मेरे वही प्रीति स्वरूपा सजीव
प्रतिबिंबित अन्य को तू ना कर पाएगा
नयन बसी छवि मेरी वही तो जतलाएगा
मानता हूँ भाव सभी निरखि करें अर्पण
जीवन अनिवार्यता तू भी है एक दर्पण
क्या इस आवश्यकता पर तू इतराएगा
नयन बसी छवि मेरी वही तो जतलाएगा
हो विषाद मन में रेंगता लगे है मन
दर्पण में देखूं तो तितली रंग गहन
अगन इस मृदुल को तू कैसे छकाएगा
नयन बसी छवि मेरी वही तो जतलाएगा।
धीरेन्द्र सिंह
29.09.20२5
09.10
मात्र प्रकृति नहीं
सूर्य आजकल निकलता नहीं
फिर भी लग रहा तपिश है
बदलितां भी ढक सूर्य परेशान
बेअसर लगे बादल मजलिस है
सितंबर का माह हो रही वर्षा
यह क्या प्रयोग वर्ष पचीस है
जल प्रवाह तोड़ रहा अवरोध
दौड़ पड़े वहां खबरनवीस हैं
बूंदें बरसाकर बहुत खुश बदली
किनारों पर कटाव आशीष है
बांध लिए घर तट निरखने
धराशायी हुए कितने अजीज हैं
सलवटों में सिकुड़ा शहर कैसे
सूरज तपिश संग आतिश है
बदलियां बरस रहीं गरज कर
सूर्य बदली संयुक्त माचिस है।
धीरेन्द्र सिंह
20.09.2025
06.38
तथ्य कटोरे में
सत्य असमंजस में
झूठ दिख रहा प्रखर
दृष्टि ढंके अंजन में
समय को कैसे रहे ऐंठ
जिसकी लाठी उसकी भैंस
सीढियां लगी ऊंची-ऊंची
झाड़ू सक्रिय है जाले में
कई प्रयास उपद्रव करते
कहते आ जा पाले मैं
कहां-कहां हठकौशल पैठ
जिसकी लाठी उसकी भैंस
शास्त्र को इतना मुखर किए
शस्त्र से नाता कब छूट गया
विश्व शस्त्र की गूंज ले जगा
शास्त्र जुड़ी आशा लूट गया
फिर उभरे शस्त्र अपनाते तैश
जिसकी लाठी उसकी भैंस।
धीरेन्द्र सिंह
17.09.2025
18.56
सत्य के उजियाला में सब स्पष्ट दिखे
तथ्य बहुत पैना है आखिर कौन कहे
सुविधाभोगी हो जाती अभावग्रस्त पीढ़ी
युग करता प्रयास से संवर्धन बनकर सीढ़ी
शीर्ष आत्मविश्वास से तथ्य निरंतर जो बहे
तथ्य बहुत पैना है आखिर कौन कहे
बोल को बिन तौल धौल का चलन किल्लोल
मोल को गिन खौल बकौल धवल सुडौल
रचनाएं नित नवीन फिर भी संरचनाएं ढहे
तथ्य बहुत पैना है आखिर कौन कहे
रच रहा नींव में है कौन मकड़जाल
और उठते कदम कई क्यों हुए बेताल
विरोध के हैं क्षेत्र सजग और ना सहे
तथ्य बहुत पैना है आखिर कौन कहे।
धीरेन्द्र सिंह
17.09.2025
04.43
दुनिया भी है सहमत हम ही ना कहें
बिना विवाह बिना साथ रहे कहकहे
भावनाओं का अबाधित आदान-प्रदान
समझदार ही मिलें नहीं हैं यहां नादान
नवजीवन नवसुविधाएँ तपिश क्यों सहे
बिन विवाह बिन साथ रहे कहकहे
जीवन ऑनलाइन है मोबाइल धड़कने
जीवंत जो है जिए क्यों भला अनमने
प्रचंड वेगों से अनुकूल चुनकर बहे
बिन विवाह बिन साथ रहे कहकहे
आत्मिक उत्थान का यह युग बिहान
हर समस्या का है ऑनलाइन निदान
जिनदगी जो जीता पूछता न फलसफे
बिन विवाह बिन साथ रहे कहकहे।
धीरेन्द्र सिंह
15.09.2025
05.02
हिंदी-हिंदी-हिंदी तेरी क्या है जिज्ञासा
बोली 14 सितंबर है कहां है राजभाषा
संविधान कहता हिंदी संघ की राजभाषा
यथार्थ है कहता राजभाषा बनी तमाशा
हिंदी दिवस 14 सितंबर उभरी लिए आशा
बोली 14 सितंबर है कहाँ है राजभाषा
प्रौद्योगिकी की भाषा आधिकारिक अंग्रेजी
न्यायालय, कार्यलयों के मूल लेख अंग्रेजी
राजभाषा हिंदी खड़ी लिए कई जिज्ञासा
बोली 14 सितंबर है कहाँ है राजभाषा
विभिन्न हिंदी मंच की प्रतिवर्ष की नौटंकी
हिंदी सर्वत्र होगी यही है जोश प्रण नक्की
महाराष्ट्र, दक्षिण राज्य पीटें भाषा ढोल-ताशा
बोली 14 सितंबर है कहाँ है राजभाषा।
धीरेन्द्र सिंह
13.09.2025
16.16
सुनिए जी सुनिए
इसे भी तो गुनिए
इस समूह में सरकार
होता इमोजी का व्यवहार
रोज उनीदे आते हैं
इमोजी टिप्पणी चिपकाते हैं
पोस्ट को क्यों पढ़ना
बस हाजिरी लगाते हैं
ओ इमोजी के चित्रकार
लिखने से क्यों घबड़ाते हैं
पोस्ट नहीं पढ़ना तो ठीक
रोज इमोजी क्यों चिपकाते हैं
शब्द भाव से अगर अरुचि
पोस्ट अगर नहीं पढ़ पाते हैं
तो क्यों आते पोस्ट पर जी
नकारात्मकता फैलाते हैं
देखादेखी अन्य बने हमराही
लिखना छोड़ इमोजी दिखाते हैं
लिखने-पढ़ने में यदि पैदल
इमोजी से क्या जतलाते है
हिंदी के प्रति है दुर्व्यवहार
लेखन संग हिमोजी भाते है
मात्र इमोजी से हिंदी दब रही
ऐसे हिंदी विरोधी क्यों आते हैं।
धीरेन्द्र सिंह
13.09.2025
07.52
हम ऐसे बंधनों को उकेर कर जिएं
मेरा हृदय बनो तुम जुड़ो बन प्रिए
कामनाएं पढ़ तुमको कुलबुलाती हैं
अपेक्षाएं भाव मृदुल संग बुलाती हैं
जो जँच रहा बिन उसके कैसे जिएं
मेरा हृदय बनो तुम जुड़ो बन प्रिए
आसक्ति की बाती पढ़ तुमको जल उठी
नई रोशनी जली चिंगारियां मचल उठी
एक तपिश भरी कशिश बवंडर लिए हिए
मेरा हृदय बनो तुम जुडो बन प्रिए
कोई न देखता कोई न सोचता अब है
दूरियां भी व्यक्ति मिलता अब कब है
फिर भी मिलन चलन लोग ऐसे जिएं
मेरा हृदय बनो तुम जुड़ो बन प्रिए।
धीरेन्द्र सिंह
11.09.2025
23.08
हिंदी चैनल पत्रकारिता की शराफत
प्रत्यक्ष लगता, हैं रुबिका लियाकत
प्रथम चर्चा पर रखतीं पूर्ण नियंत्रण
पैनल वक्ता को देती क्रमशःनिमंत्रण
कुछ भी बोल चलें होती न हिमाकत
प्रत्यक्ष लगता, हैं रुबिका लियाकत
आकर्षक वेशभूषा बड़ी गोल बिंदी
दमकता भाव चमकती लगे हिंदी
इतनी प्रखर पत्रकारिता की सियासत
प्रत्यक्ष लगता, हैं रुबिका लियाकत
बिना किसी दबाव बिना किसी पक्ष
चर्चा का जो विषय वही होता लक्ष्य
अध्ययन, शोध की बौद्धिक नज़ाकत
प्रत्यक्ष लगता, हैं रुबिका लियाकत।
धीरेन्द्र सिंह
12.09.2025
17.43
पुस्तक प्रकाशन की आवश्यकता क्या है
प्रौद्योगिकी जब स्पष्ट कार्य करने लगी है
कश्मीर और बंगाल को पढ़ पाते भी कितना
विवेक अग्निहोत्री प्रतिभा जो कहने लगी है
गहन शोध कर सत्य कथ्य को खंगालकर
पटकथा, अभिनय, संवाद लेंस जड़ी है
निर्देशन से अभिनय सहज होकर जागृत
पुस्तकों की बातें स्पष्ट अब स्क्रीन चढ़ी हैं
हिंदी के श्रेष्ठ रचनाकार हैं विवेक अग्निहोत्री
दग्ध कोयला भी हथेली पर ठुमकने लगी है
निर्भीकता से इतिहास सजीव करें प्रस्तुत
पुस्तकें अभिव्यक्तियों में पिछड़ने लगी है।
धीरेन्द्र सिंह
10.09.2025
17.56