गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

स्मिति की परिधि में उल्लास तुम्हारा
एक शक्ति पुंज का मिल गया है सहारा
मैं भ्रमर सा यायावर पुष्प डाल का
एक डाल ज़िन्दगी का बन गयी है नज़ारा

स्पंदन, शीतल चन्दन, भाव में वंदन
जिस क्षण हम मिले उस पल का अभिनन्दन
कश्ती को लहरों का मिला है सहारा
सागर की हुंकारों में है नाम तुम्हारा

उलझी ना डगर है पर पेंच मगर है
कुछ दूरियां कुछ व्यस्तताओं का समर है
धड़कनों को अनवरत तुम्हारे नाम का सहारा
तुम विश्व हो और अभिसार का चौबारा

पल्लवित, पुष्पित तुम्हारी हर क्यारी है
ह्रदय में विभिन्न छटाएं ही तुम्हारी हैं
अनुभूतियों ने क्षण को निखारा है संवारा
स्मिति की परिधि में विश्वास का नजारा।

1 टिप्पणी:

  1. सुगन्धित पुष्प सुशोभित हर पंक्ति न्यारी
    सुरभित भाव से सुस्जित वाटिका प्यारी।

    अप्रितम् रचना !!

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