शुक्रवार, 23 जून 2023

स्व का सत्य

 

सत्य का उद्गम कहां

मवेशियों की चाह है

चारागाह की समीक्षा

युगों से अथाह है


दृष्टि परिधि में विधि

तिथि निधि माह है

अवलोकन ही तथ्य

रीति प्रतीति खास है


स्व सुकृति लगे विभाजित

मर्यादित क्या राह है

एकल एकत्व कहीं नेपथ्य

अर्थाघृत अमृत वाह है


खंडित मंडित हो रहे

पंडित ज्ञानी आह हैं

रंजित व्यंजित संधि

संचित वंचित दाह है


खोह में भी टोह

मोह लगे स्याह है

सोह सकल आधिपत्य

 कलुषता अथाह है


भगवान भव्य कहे श्रव्य

अंतस अपथ प्यास है

सत्य से संपृक्त व्यक्तित्व

कृतित्व क्यों उदास है।


धीरेन्द्र सिंह

24.06.2023

07.12