सोमवार, 31 मार्च 2025

छल

 जो बीत गया वह सींच गया चिंतन कैसा

जो होगा वह भविष्य सोच अकिंचन कैसा

वर्तमान को ना लिखना है असाहित्यिक

आज का लेखन ना हो तो मंथन कैसा


मन के संदूक से निकली फैली वह चादर

सलवट कई सुगंध वही एहसास भी वैसा

मन को टांग बदन को हो कैसा अभिमान

प्रकृति दिखती वैसी मनोभाव हो जैसा


बोर कर देती है तुम्हारी विगत रचनाएं

प्यास एक अनबुझी चाह में हो समझौता

वर्तमान को छुपा विगत का गुणगान हो

वर्तमान से छल को कौन दे रहा न्यौता।


धीरेन्द्र सिंह

31.03.2025

23.01