शनिवार, 17 जून 2017

मेरी प्रीत अर्चना की नीर हो गयी
तेरी रीत प्रीत की प्राचीर हो गयी
मेरी भावनाएं लहरों में है हुंकारे
मोहब्बत की तालीम बन ज़मीर हो गयी

प्यार की गहराईयों का अभिव्यक्तियाँ
तेरे इजहार को पाकर अमीर हो गयीं
हर बार लगे प्यार का है मुगालता मुझे
हर रोज तेरा प्यार मेरी तकदीर हो गयी

ज़िन्दगी मखमली एहसास में ढले हमेशा
बंदगी प्यार की इंसानियत की खीर हो गयी
हर चुनौतियां लगे हो जाएंगी हल यूं ही
तू क्या मिली ज़िन्दगी बाहुबली सा अधीर हो गयी

मिलते हैं कटप्पा कई राह -ए-,ज़िन्दगी मैं
देवसना सी तू ज़िन्दगी की गुलाल-अबीर हो गयी
तेरे प्यार में हो गया विशिष्ट, निराला व्यक्तित्व
अपघात का भय कैसा तू मेरी तीर हो गयी।

शनिवार, 10 जून 2017

तीन बजे रात से तुम्हें सोचते रहा
जैसे नमाज़ी सेहरी में मशगूल
ईश्वर प्यार ही तो है, सब करें
चांद की ख्वाहिश लिए उसूल

भोर की मस्जिद की दिखें हलचलें
नमाज़ी की नमाज़ हो रही कुबूल
भोर की हलचलें आरम्भ हो चलीं
सेहरी मिलने इफ्तारी को दे रही तूल

दिल में आया तुम्हारा खयाल उठ गया
भोर पाकीज़गी के शोर में मशगूल
तुम भी किसी दुआ हेतु एहसासी सजदा
और रहमत हो मिल जाओ जैसे रसूल।

सोमवार, 5 जून 2017

तुम्हारी पलकों ने मेरी पलकों को छुआ
आंखें खुली, सुबह धुली-धुली, दे दुआ

यह स्वप्न था या एहसास था ना जानूँ
पलकों में भोर का जल गया वही दिया
रोशन हो उठा दिल भावनाओं का झिलमिल
ओ प्रिये क्या सोच लिया क्या यह किया

तुम साँसों की डोर हो मेरी चितचोर हो
तुमसे मिलन चाह चलन झूमता हिया
तुम पंखुड़ियों सी कोमल, नदिया सी कल-कल
अरमानों की कश्ती में संग कहां चल दिया

प्यार हुआ, इकरार हुआ, मिली ईश्वरीय दुआ
तुम पूजा की थाल सी मैं मन्नतों की प्रक्रिया
तुम कामायनी, विश्व प्रदायनी, धरती स्वरूपा
मैं आराधक, तुम्हारा साधक, प्रोन्नत कितना किया

ओ प्रिये तुम्हारी पलकों ने मेरी पलकों को छुआ
मन मुग्धित हो मगन हुआ, एहसासी यह धुआं।

शुक्रवार, 26 मई 2017

आज निशा निमंत्रण है
हृदय भी किए प्रण है
चांदनीं में डूब नहाए मन
स्पंदनों से गूंजे हर कण-कण है।

                       -2-
आज निशा निमंत्रण है
हृदय का मुक्त भ्रमण है
चांदनीं बिखरी सकुचाई सी
चंदा कहे क्या रमण है।

                           -3-
आज निशा निमंत्रण है
हृदय करे कुछ संग्रहण है
चांदनीं बिखरी जुल्फों सी
मुग्धित हर पल - क्षण है।

गुरुवार, 25 मई 2017

मन का आचमन हुआ, अचंभित है मन
सब कुछ मिलाकर मन को तुम कर दिया
पलकों में स्वप्न हो अधीर कर रहा विचरण
अपनी हो कोई एक राह मन ढूंढ ला दिया

जेठ की तपिश सा लगे तुम बिन होना तो
सावन की रिमझिम सा है तुमने भींगा दिया
बूंदों सा भाव टपटपाते मन में थिरक रहे
ओरी से गिरते जल सा निरर्थक बहा दिया

मिलने का यह मिलन सदियों का है चलन
जलन सीने में हो रही यह क्या जला दिया
कभी बहकने लगे मन तो हो जाए अनमन
घनघन कारे बदरा संग जिया को उड़ा दिया

सब खो गया तुम में, मैं से ढला हम में
हमने हिया में सप्तरंगी सा सजा दिया
भविष्य के डगर के हैं हम गुप्त से राही
कभी उम्मीद, कभी भय तो जय को जगा दिया।

सोमवार, 15 मई 2017


 प्यार भरी दे रहीं धमकियां
कुछ तो न किया क्यों मियां

उनके तसव्वुर में बोल गया
छुपाया है जो हमारे दरमियाँ

बदगुमानी न बदमिजाजी है
हर्फ़ समझें न बना दें सुर्खियां

बेमुरव्वत कब रही मोहब्बत
तलाशे मन क्यों एहसासी सर्दियां

ना तराशो ना अब और लावण्यमयी
बुत बना दोगी हँसेगी सखियां।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

हद है कि इश्क़ अब दीवान हो गया
इंसान भी गुम होकर महान हो गया

इश्क़ तकिया कभी बिछौना सा बनाएं
आरामगाह तो कभी अभियान हो गया

उनके गेसुओं में उलझने का न मौका 
तत्काल टिकट सा इश्क़ सामान हो गया

किसको पड़ी निगाहों में उतरने की फिक्र आज
अब यूं लगे कि इश्क़ बेजुबान हो गया

सिर्फ बाहों के घेरे के अधिकांश चितेरे भरे
झटपट फटाफट लिपट का कद्रदान हो गया

धडकनों, तड़पनों, उलझनों का मज़ा भूले
इश्क़ एहसास ना रहा बड़ा नादान हो गया।
कुछ कुछ ज़िन्दगी सिखलाने लगी है
दे इश्किया मिजाज बहलाने लगी है

वर्षों से जिनके साथ कट रही है जिंदगी
क्या हुआ कि ज़िन्दगी ही फुसलाने लगी है

एक वह शख्स मेरी ज़िंदगी में छाए इस कदर
किसी भी छाए में याद खूब गुदगुदाने लगी है

उनके पहलू में भी दरमियाँ आ जाये वह हरदम
भरम रहे कि उसकी अंगुलियां सहलाने लगी है

किसी के साथ ज़िन्दगी किसी के पास ज़िन्दगी
मोहब्बत इल्म बनकर क्यों इठलाने लगी है

नहीं गंवारा उनकी बाहों का बंधन कसम से
दिल रोए और जिस्म जुल्म उठाने लगी है

किस मोड़ पर मिले हम कि ना विद्रोह दम
नए हमदम की चाहत रोज रुलाने लगी है।

निज़ता

निज़ता

भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ताअभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई हैदिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.
शब्द सहमत नहीं
भावनाएं ढल रहीं
खयाल उनका है ऐसा
लचक कहीं बल कहीं

घनेरे बादलों से घिरा
लगे आसमां चपल नहीं
बिजलियाँ चमक रहीं
लगे क्यों धवल नहीं

यादें ऐसे ही तड़पायें
तन में हलचल नहीं
यह स्थिरता है अजब
स्पंदन पल-पल कहीं

अभिव्यक्तियाँ मस्तियाँ बनी
सम्प्रेषण में कलकल नहीं
एक आकर्षण सहज सा
प्रिये जहां मन भी वहीं।
मैं भी तो किसी जिस्म की फरियाद हूँ
कल्पनाओं में अभी तक अविजित नाबाद हूँ

ज़िन्दगी को जिस तरह जिलाओ जी लेती है
मैं भी तो किसी खयालों का प्यारा आफताब हूँ

कहीं कभी तो किसी को छू लेगा मन मेरा भी
चूनर की चुनहटों में फुसफुसाती एक आवाज हूँ

मन मयूर की तरह फैलाए है पंख ऐ जहां
जहां में मेरी भी जन्नत जहां मैं लाजवाब हूँ

मेरी प्रिये मन में जिये कुछ फलसफे लिए
मैं  आवारगी के चमन का दिलफेंक आदाब हूँ।

शनिवार, 11 मार्च 2017

रंग-रंग परिवेश है, लेकर अपनी आस
चाहत चठख रंग तलाशे, अपनी-अपनी प्यास
फागुन आया लिए फुहारें, तन-मन हर्षाए
नयन-नयन पिचकारी, ढूंढे कोई ख़ास

कान्हा-कान्हा पुरुष बने, नारी राधा हिय साथ
अर्पित मन अकुलाय के, मांगे प्रीत विश्वास
अबीर-गुलाल कमाल किए, हिय से हिय छुए
हर्ष-विषाद सब रंग हुए, बन एक दूजे के ख़ास

विपुल संपदा, व्यापक संस्कृति, जग पाए गति
 रंग बिखेरें छटाएं और फागुन भारत उल्लास
सभी भाव मुखरित हों, सब के माफिक रंग
समरसता की होली यह मन में लाए मधुमास

फागुन एक त्यौहार नहीं जीवन का रसधार
रंग लगाकर हर्षित हो मन स्नेह का अहसास
इन शब्दों में भर रंगों को आप को शुभ होली
अल्हड़, अलमस्त, अलहदा फागुन का है मास।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

ताश के पत्तों की तरह फेंट रहा दिल
कोशिश यही कि जाएं खूब हिलमिल
दिल का मिलना है जैसे सूर्यमुखी खिलना
और फिर चहक उठें दिल दो खिल-खिल

सब प्यार की चादर से दुआ प्रीत की मांगें
अरमान दिल में संग मीत को लिए भागें
छू न सके छाया, माया, प्रतिकाया कातिल
चाहत के धागों से जो सजी चुनरी झिलमिल

परिचय में प्रस्फुटित एक नया मचान है
नयनों में अंकित प्रेम का फरमान है
तरल भावनाएं उमंगित रही तलाश साहिल
परिचय भी हो गहरा यूँ तो चाहे नई मंजिल

खयालों में शब्दों में सब समेट रहा हूँ
उत्साह लिए दिल को नित फेंट रहा हूँ
एक शबनमी सुबह से मिले रश्मियाँ खुशदिल
क्या बात रहे फिर जो जवां दिल जाएँ मिल।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

स्मिति की परिधि में उल्लास तुम्हारा
एक शक्ति पुंज का मिल गया है सहारा
मैं भ्रमर सा यायावर पुष्प डाल का
एक डाल ज़िन्दगी का बन गयी है नज़ारा

स्पंदन, शीतल चन्दन, भाव में वंदन
जिस क्षण हम मिले उस पल का अभिनन्दन
कश्ती को लहरों का मिला है सहारा
सागर की हुंकारों में है नाम तुम्हारा

उलझी ना डगर है पर पेंच मगर है
कुछ दूरियां कुछ व्यस्तताओं का समर है
धड़कनों को अनवरत तुम्हारे नाम का सहारा
तुम विश्व हो और अभिसार का चौबारा

पल्लवित, पुष्पित तुम्हारी हर क्यारी है
ह्रदय में विभिन्न छटाएं ही तुम्हारी हैं
अनुभूतियों ने क्षण को निखारा है संवारा
स्मिति की परिधि में विश्वास का नजारा।