रविवार, 19 अप्रैल 2015

तुम हो मेरे साथ तो

ज़िंदगी की कैसी यह चाल है 
ऊबड़ खाबड़ अनचीन्ही टाल है 
मंद है तो द्वंद है कभी अति प्रचंड 
तुम हो मेरे साथ तो एक ताल है 

सागर के थपेड़ों का था एक खौफ 
जीवन प्रवाह में तो कई कमाल है 
शीर्ष पर आसीन भूमि पर गिरे 
वर्चस्वता के लिए वर्चस्व का अकाल है 

तुम ना होती साथ तो होता क्या 
हर कदम पर चुनौतियों का द्वारपाल है 
तुम हो शृंगारपूरित या कि शक्तिस्वरूपा 
तुमसे ही उन्नत यह भाल है 

नर नारी का सम्मिश्रण सफल जीवन 
एक अकेला तो महज एक काल है 
नारी है आधार जीवन महल का सशक्त 
नर तो सामाजिक सक्रिय चौपाल है। 



भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता, 
शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

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