शुक्रवार, 22 जून 2012

स्वप्न नयनों से छलक पड़ते हैं


स्वप्न नयनों से छलक पड़ते हैं
बातें इरादों में दब जाती हैं
अधूरी चाहतों की सूची है बड़ी
चाहत संपूर्णता में कब आती है

चुग रहे हैं हम चाहत की नमी
यह नमी भी कहाँ अब्र लाती है
सब्र से अब प्यार मिले ना मिले
ज़िंदगी सोच यही हकलाती है

इतने अरमान कि सब बेईमान लगें
एहसान में भी स्वार्थ संगी-साथी है
दिल की तड़प, हृदय की पुकार  
आज के वक़्त को ना भाती है

प्यार के गीत लिखो प्यार डूबा जाय
इंसानियत निगाहों को ना समझ पाती है
फ़ेस बूक, ट्वीटर,एसएमएस की गलियाँ  
प्यार को तोड़ती, भरमाती हैं।



भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,
शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. बहुत सुंदर भाव । सरल प्रभावी रचना । अंतिम पैरे का फ़ोंट बहुत छोटा हो गया है उसे ठीक कर दें तो पाठकों को सुविधा होगी । शुभकामनाएं

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  3. चुग रहे हैं हम चाहत की नमी.
    यह नमी भी कहाँ अब्र लाती है.

    बहुत सुंदर गीत. अनुपम भाव.

    शुभकामनाएँ.

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  4. बहुत अच्छी भावाव्यक्ति , बधाई

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  5. अनुपम भाव संयोजन से सजी उम्दा पोस्ट बधाई।

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