सोमवार, 24 जनवरी 2011

आस की ज्योति

नयन नटखट पलक पटापट मन है हतप्रभ
स्मित सिमट होंठों पर नव राग सजाए
साज-सुर संगत करें नित रंगत समेटे
इन्द्रधनुषीय भाल पर रहे बाण चलाए

सागरीय लहरों से भाव टूट रहे तटबंध पर
मृग मरीचिका बने रिश्ता हो अनुबंध पर
पूर्वाग्रसित भाव से कैसे कोई गंगा नहाए
नयनों की वाचालता पर मन रह-रह धाए

भावों का मोहक संयोजन ले दबंगतापूर्ण अंजन
पलकों की पुलकित हलचल ले भावमयी क्रंदन
बावरे मन का बवंडर नयनों में ऐसे इठलाए
जैसे तूफानी समंदर में नाव बे मांझी हो जाए

मन निरखता तन थिरकता चित्रमयी दुनिया सजाए
नयन नाजुक नाज़नीन ना जाने क्या बोल जाए
शब्द खिलकर लबों पर काश यह बोल पाए
एक पट की प्रतीक्षा है आस की ज्योति जलाए.


भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,
 शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

6 टिप्‍पणियां:

  1. वावरे मन का बबंडर..... सारगर्भित रचना . बहुत सुंदर .बधाई

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  2. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 25-01-2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  3. जीवन और मन के रंगों में पगी अभिव्यक्ति....बेहतरीन

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  4. बहुत सुन्दर शब्द संयोजन ...अच्छी भावाभिव्यक्ति

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  5. बेहतरीन काव्यात्मक प्रस्तुति. सुन्दर शब्द संयोजन.

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