गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

छपाक

 एक हल्की छप्प

कोई मछली उछली होगी

अन्यथा

यह गहरा शांत समंदर

असीम भंडार लिए

अपने अंदर

धरती की तरह

रहता है

सहज, शांत, एकाग्र,


एक हल्की स्मिति

कौंध गयी

दुबक गई अभिलाषा

नहीं की मेरी उक्त

पंक्तियों की प्रशंसा

बैठी थी

सहज, शांत, एकाग्र

रह-रहकर कौंध जाती थी

स्मिति कभी चेहरा होता या

कभी कोमल संचलन अभिव्यक्ति,


लगा कि वह बोल रही

बिन शब्द

अनुभूतियों के बयार से,

मौन तो मैं हूँ

शब्दों की भीड़ लिए,

अचानक छपाक

और

मैं उतरते चला गया।


धीरेन्द्र सिंह

27.02.2025

17.28



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