बुधवार, 17 अप्रैल 2024

छू लें हौले से

 आइए बैठकर चुनें रुई की सफेदी

धवलता अब मिलती कहां है

तमस में बत्तियों की टिमटिमाहट

सरलता रब सी मिलती कहां है


अपने घाव पर लें रख रुई फाहा

टीस औरों में दिखती कहां है

खुशियों के गलीचे के भाग्यवान

धूप इनको भी लगती कहां है


आप भी तो रुई सी हैं कोमल

घाव लगना नई बात कहां है

सब कोमलता के ही हैं पुजारी

पूछना अप्रासंगिक कोई घाव नया है


छू लें हौले से मेरे घाव हैं लालायित

मुझ सा बेफिक्र कहनेवाला कहां है

रुई की धवलता ले बोलूं, है स्वीकार्य

आपकी कोमलता सा नज़राना कहां है।


धीरेन्द्र सिंह


17.04.2024

09.08

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