सोमवार, 9 मई 2011

डर लगता है

आलीशान मकानों से डर लगता है
सफेदपोशों से अब डर लगता है

गाँधी,सुभाष,भगत सिंह,बिस्मिल
आ जाएँ कि फिर डर लगता है

आज नेतृत्व की नियत है निठुर
कारवां के भटकने का डर लगता है

जिस मिट्टी के सोंधेपन में सरूर
बदले ना कहीं खुशबू कि डर लगता है

उफन रहीं तो कहीं सूख रहीं नदियाँ
अब कश्तियों को भी डर लगता है

प्यार में भी मिलावट ना रहे तरावट
ऐसी बनावट से अब डर लगता है.




भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता, 
शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है 
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

12 टिप्‍पणियां:

  1. उफन रहीं तो कहीं सूख रहीं नदियाँ
    अब कश्तियों को भी डर लगता है

    बहुत खूब ...

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  2. yaa khuda ab her baat se darr lagta hai
    ret kee tarah nikalne ka gumaa hota hai

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  3. आज तो सच कहने से भी डर लगता है……………सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  4. लाजवाब... इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता. दुनिया की व्यथा का सजीव चित्रण.

    दुनाली पर स्वागत है-
    कहानी हॉरर न्यूज़ चैनल्स की

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  5. आज के माहौल का सही चित्रण करती हुई कृति !

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  6. अज का डर सच्चा है। अच्छे भाव। आभार।

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  7. डर डर कर सिसकती है मानवता आज


    -बहुत उम्दा कहा!!

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  8. बेहद उम्दा। शानदार।

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  9. सच कहा आपने , इतनी बनावट और मुखौटों के साथ जी रहे लोगों के साथ बस डर कर ही रहना पड़ता है। कब कौन सा नकाब उतर जाए , कुछ कहा नहीं जा सकता, इसलिए स्वयं को किसी भी अप्रत्याशित सत्य के लिए तैयार रखना होगा।

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  10. बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!
    मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

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  11. Zoot ka aisa hai bolbala
    ki ab such kehane se dar lagta hai.

    sunder aur samayik rachna

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  12. बहुस सुन्दर...एक-एक शब्द भावपूर्ण

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