सोमवार, 28 मार्च 2011

जीवन

निर्मोही निर्लिप्त सजल है
यह माटी में  जमी गज़ल है

खुरच दिए इक परत चढ़ी
चेहरे में भी अदल - बदल है


लोलुपता लालसा लय बनी
इसीलिए यह नई पहल है


नई क्रांति का नया बिगुल
चंगुल में लाने का छल है


मानव का मुर्दा बन जीना
फिर भी कितनी हलचल है


नई परत से चेहरा नया
हर कठिनाई का यह हल है.





भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,
शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

7 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन की सच्चाई
    सुन्दर कविता

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  2. मानव का मुर्दा बन जीना

    फिर भी कितनी हलचल है ।


    बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  3. बहुत सार्थक और भावपूर्ण रचना..

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  4. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 29 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. मानव का मुर्दा बन जीना
    फिर भी कितनी हलचल है
    नै परत से चेहरा नया
    हर कठिनाई का यह हल है.

    बहुत अच्छी बात कही है.
    सुंदर नज़्म पेश की है.

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