जो बीत गया वह सींच गया चिंतन कैसा
जो होगा वह भविष्य सोच अकिंचन कैसा
वर्तमान को ना लिखना है असाहित्यिक
आज का लेखन ना हो तो मंथन कैसा
मन के संदूक से निकली फैली वह चादर
सलवट कई सुगंध वही एहसास भी वैसा
मन को टांग बदन को हो कैसा अभिमान
प्रकृति दिखती वैसी मनोभाव हो जैसा
बोर कर देती है तुम्हारी विगत रचनाएं
प्यास एक अनबुझी चाह में हो समझौता
वर्तमान को छुपा विगत का गुणगान हो
वर्तमान से छल को कौन दे रहा न्यौता।
धीरेन्द्र सिंह
31.03.2025
23.01
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