गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

नारीत्व

 

अकेले स्व स्पंदित हूँ तो

लगे नारीत्व घेरा है

आत्म आनंद प्लावित हो

लगे यह कैसा फेरा है

 


भाव तब शून्य रहता है

लगे अव्यक्त अंधेरा है

एक अनुभूति कमनीय सी

सघन निजत्व डेरा है

 

प्रणय का पल्लवन कब कैसे

स्वाभाविक चित्त टेरा है

प्रणय क्यों बेलगाम सा

क्या यह एकल सवेरा है


निज पुरुषत्व आह्लादित प्रचुर

कहे क्या मेरा क्या तेरा है

सुजान सत्य से मिलता

जहां नारीत्व का घेरा है।

 

धीरेन्द्र सिंह

09.02.2024

09.45

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