सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

जीवन संघर्ष


विगत प्रखर था या श्यामल था
इस पहर सोच कर क्या करना
है लक्ष्य खड़ा लगे प्रतिद्वंदी बड़ा
अब चिंतन में ना निर्झर हना

पल-छिन में होते हैं परिवर्तन
फिर क्या सुनना और क्या कहना
ठिठके क्षण को क्यों व्यर्थ करें
हो मुक्त समीर सा बहते रहना

एक संग बना जीवन प्रसंग है
तब जीवन से क्या है हरना
उड़ने की यह अभिलाषा प्रबल
विहंग सा उमंग से क्या डरना

रहे कुछ ना अटल, है बस छल
कलछल से क्यों यौवन भरना
है एक प्रवाह के पार पहुंचना
मांझी के सोच से क्या करना.



भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
 अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,
शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

5 टिप्‍पणियां:

  1. रहे कुछ न अटल ---- अगर इन्सान ये सोच ले तो दुनिया स्वर्ग बन जाये। सार्थ सन्देश देती रचना। बधाई।

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  2. कित्ती सुन्दर कविता....

    वसंत पंचमी पर ढेर सारी बधाई !!

    _______________________
    'पाखी की दुनिया' में भी तो वसंत आया..

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  3. बेहद उम्दा प्रस्तुति।
    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  4. ठिठके क्षण कों क्यूँ व्यर्थ करें , हो मुक्त समीर सा बहना ....वाह !, लाजवाब !

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  5. बहुत ही सुन्दर कविता, यही उत्साह बना रहे

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