सोमवार, 13 दिसंबर 2010

मिल रहे हैं द्रोन

कौन है सम्पूर्ण और अपूर्ण कौन
सागर की लहरें मंथर पहाड़ मौन

ज़िंदगी के वलय में एकरूपता कहॉ
तलाशते जीवन में मिल रहे हैं द्रोन

एकलव्यी चेतनाएं अप्रासंगिक बनीं
दरबारियों के विचार हैं तिकोन

अब मुखौटा देखकर लगती मुहर
हर नए हुजूम को बनाती पौन

लक्ष्य के संधान की विवेचनाएं
देगा परिणाम अब बढ़कर कौन.



भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
 अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,
 शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

2 टिप्‍पणियां:

  1. सोचने पर मजबूर करती रचना ...अच्छी अभिव्यक्ति

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  2. hmmm...agree with Sangeeta di...bahut hi praabhawshaali kavita...aapki hindi pe itnii sashakt pakad dekh ke.osch rhii hun...ab aapka blog roz prna pregaa..taaki main bhi itnaa prbhaawshaali likh skun...

    bdhaayi
    take care

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