रविवार, 13 फ़रवरी 2011

सारे गुलाब बिक गए

सारे गुलाब बिक गए गुलाबो की आस में

एक दिन क्या आया कि मोहब्बत जग गयी

यह ज़िंदगी की दौड़ है हर कहीं पर होड़ है

जतला दो प्यार आज ना कहना कि हट गयी



यह धडकनों की पुकार है या कि इज़हार है

देने को भरोसा मान एक दुनिया है रम गयी

चितवन से, अदाओं से, शब्दों के लगाओं से

छूटा लगे है रिश्ता कि तोहफों की बन गयी



एक मलमली एहसास में जो छुप जाए कोई खास

ऋतुएं बदल जाएँ कि लगे धरती थम गयी

एक राग से अनुराग कि चले न फिर दिमाग

फिर कैसा एक दिन कहें उल्फत मचल गयी



यार के दरबार में ना होता रिश्तों का त्यौहार

एक बिजली चमकती है कि धरती दहल गयी

कोई गुलाब,तोहफा मोहब्बत को न दे न्यौता

एहसास का है जलवा झुकी पलकें कि चल गयी.





भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,
शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है 
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

7 टिप्‍पणियां:

  1. एक एअग से अनुराग कि फिर न चले दिमाग---- वाह वाह खूब कही। शुभकामनायें।

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  2. वाह वाह
    गुलाबो की आस मे
    वाह

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  3. क्या खूब लिखा है …………मन को छू गयी……………प्रेम दिवस की शुभकामनायें।

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  4. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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