वस्त्र की दगाबाजी
कहां से सीखा मानव
कब कहा प्रकृति ने
ढंक लो तन कपड़ों से,
सामाजिकता और सभ्यता का दर्जी
सिले जा रहा कपड़े
मानवता उतनी ही गति से
होती जा रही नग्न,
क्या मिला
ढंककर तन,
धरती, व्योम पहाड़, जंगल
जल, अग्नि, वायु सब हैं नग्न,
जंगल में कैसे रह लेते हैं
पशु, पक्षी वस्त्रहीन
नहीं बहती जंगल में
कामुकता और अश्लीलता की बयार,
क्या मनुष्य ने
चयन कर वस्त्र
किया निर्मित हथियार ?
नग्न जीना नहीं है
असभ्यता या कामुकता
बल्कि यह
स्वयं का परिचय,
स्वयं पर विश्वास,
शौर्य की सांस,
शालीनता का उजास है,
नग्न कर देना
आज भी सशक्त हथियार है
मानवता
वस्त्र में गिरफ्तार है।
धीरेन्द्र सिंह
01.04.2025
16.49
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