बुधवार, 27 अगस्त 2025

पधारे मेरे घर

 प्रगति सकल चिंतन हो एक सामाजिक गणवेश

ऐसी बोली बोल रहे हैं पधारे मेरे घर श्री गणेश


सज्जा मनोभाव की करने का है यह एक प्रयास

गौरव है प्राप्त होता श्री गणेश करें गृह निवास

दीवारों से पूछिए कैसा हो जाता है अद्भुत परिवेश

ऐसी बोली बोल रहे हैं पधारे मेरे घर श्री गणेश


अपनी अनुभूतियों का अब और ना करूँ बखान

गणेशोत्सव परंपरा के सृजनकर्ता हैं अति महान

श्री गणेश इस अवधि में देते आशीष शक्ति विशेष

ऐसी बोली बोल रहे हैं पधारे मेरे घर श्री गणेश


करबद्ध खड़ा हूँ वचनबद्ध आबद्ध स्वयं से सम्बद्ध

गणपति विराजे हैं तो भाव से हूँ आपूरित निबद्ध

आपका भी मंगल हो दंगल अब जीवन का संदेश

ऐसी बोली बोल रहे हैं पधारे मेरे घर श्री गणेश🙏🏻


धीरेन्द्र सिंह

27.08.2025

16.28

सोमवार, 25 अगस्त 2025

गणेश

 हर गली हर सड़क हर बिल्डिंग लिए एक भेष

आ गए हैं मुंबई की धड़कन, ऊर्जा लिए गणेश


अति विशाल अति भव्य झांकिया समय संभव

अति विशाल महानगरी देखता न कभी पराभव

एक दिवसीय, दस दिवसीय अर्चना अति विशेष

आ गए हैं मुंबई की धड़कन, ऊर्जा लिए गणेश


मुम्बई, नवी मुंबई अब तीसरी आ रही है मुम्बई

विस्तार है स्वीकार है सत्कार है हर कल्पना नई

गणपति बप्पा में है डूबा महाराष्ट्र का पूर्ण परिवेश

आ गए हैं मुंबई की धड़कन, ऊर्जा लिए गणेश


अपने घर में पधारे गणेश जी की प्रथम अर्चना

फिर मुंबई में भ्रमण कर रात्रिभर गणेश कल्पना

वक्रतुंड महाकाय का आशीष करें निर्मूलन क्लेश

आ गए हैं मुंबई की धड़कन, ऊर्जा लिए गणेश।


धीरेन्द्र सिंह

26.08.2025

11.46

दौर के दौड़

 दौर के दौड़ में हैं थक रहे पाँव

गौर से तौर देखे कहाँ तेरा गांव


एक जगत देखूं है ज्ञानी अभिमानी

एक जगत निर्मल निर्मोही जग जानी

जिससे भी पता पूछूं ना जानें ठाँव

गौर से तौर देखे कहाँ तेरा गांव


वह जो पुकार हृदय में रही गूँज

उभरते भाव रहे कामना को पूज

और कितना दौड़ना कहां है छांव

गौर से तौर देखे कहां तेरा गांव


पथ भी अनेक विभिन्न रंग के राही

हर पथ गूंजता करता तेरी वाहवाही

ओ चपल तू छलक ललक दे दांय

गौर से तौर देखे कहां तेरा गांव।


धीरेन्द्र सिंह

25.08.2025

21.00

शनिवार, 23 अगस्त 2025

आध्यात्मिक

अस्वाभिक परिवेश में बुलाया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो


माना कि स्वयं को हो करते अभिव्यक्त

पर यह तो मानो हर आत्मा यहां है भक्त

धर्म के भाव छांव संग गहराया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो


आसक्त है मन तुमसे जहां गहरी वादियां

उन्मुक्त तपन में सघन विचरती किलकरियाँ

अनुगूंज अपने मन का छुपाया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो


यह तन सर्वप्रथम है आराधना का स्थल

तन जीर्ण-शीर्ण ना हो करें प्रयास प्रतिपल

आसक्ति-भक्ति-मुक्ति जतलाया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो


चिकने चेहरे निर्मल मुस्कान लिए प्रेमगान

उल्लसित उन्मुक्त प्यार ही में किए ध्यान

यही आध्यात्मिक यह झुठलाया ना करो

आध्यात्मिक हो यह दिखावा ना करो।


धीरेन्द्र सिंह

24.08.2025

08.42

मर्द

 सबकी अपनी सीमाएं सबके अपने दर्द

अपनी श्रेष्ठता निर्मित करना क्या है मर्द


आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक परिवेश

इन तीनों से होता निर्मित मानव का भेष

पार्श्वभूमि समझे बिना निकालते हैं अर्थ७

अपनी श्रेष्ठता निर्मित करना क्या है मर्द


हर व्यक्ति चाणक्य है संचित अनुभव ज्ञान०

एक स्थिति में कोई शांत कोई लिए म्यान

आक्रामकता पौरुषता सौम्यता क्या सर्द

अपनी श्रेष्ठता निर्मित करना क्या है मर्द


व्यक्ति परखना पुस्तक की समीक्षा जैसे

बाहर से जो दिख रहा क्या भीतर वैसे

क्षद्म रूप के चलन में रूप आडंबर तर्क

अपनी श्रेष्ठता निर्मित करना क्या है मर्द।


धीरेन्द्र सिंह

23.08.2025

16.14

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

छनाछन

 भूल जाइए तन मात्र रहे जागृत मन

प्रतिध्वनि तब उभरेगी छन छनाछन


काया की माया में है धूप कहीं छाया

मन से जो जीता वह जग जीत पाया

आत्मचेतना है सुरभित सुंदर अभिगम

प्रतिध्वनि तब उभरेगी छन छनाछन


युक्तियों से रिक्तियों को कौन भरपाया

आसक्तियों की भित्ति पर चित्रित मोहमाया

थम जाएं वहीं जहां अटके मुक्त मन

प्रतिध्वनि तब उभरेगी छन छनाछन


पट्टे में बंधे श्वान से लेकर हैं चलते मन

बँध जाना जीवन में न कहे धरती गगन

खोलकर यह बंधन अपने में हों मगन

प्रतिध्वनि तब उभरेगी छन छनाछन।


धीरेन्द्र सिंह

22.08.2025

07.48




सलवटें

सलवटें नहीं होती
सिर्फ बिछी चादर में
व्यक्तित्व भी होता है भरा
असंख्य सलवटों से
कुछ चीन्हे कुछ अनचीन्हे,

नित हटाई जाती है
सलवटें चादर की
पर नही हटाता कोई
व्यक्तित्व की सलवटें
प्रयास जाते हैं थक,

कैसे बना जाए
विराटमना
निर्मलमना,
घेरे जग का कोहरा घना,
आओ छू लो
मन मेरा, मैं तेरा
बन चितेरा,

ना
प्यार नहीं आशय
प्यार तो है हल्का भाव
भाव है आत्म मिलन,
सलवटें प्यार से 
मिटती नहीं,
आत्मा जब आत्मा से
मिलती है
चादर व्यक्तित्व की
खिंचती है
तो हो जाता है
आत्मबोध,

आओ मिलकर
व्यक्तित्व चादर का
खिंचाव करें
संयुक्त खिलकर
सलवट रहित व्यक्तित्व का
निभाव करें।

धीरेन्द्र सिंह
21.08.2025
13.56