शनिवार, 26 सितंबर 2026

कौन किससे

कौन किससे निबद्ध है कहाँ कैसे आबद्ध है
यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है



यह मुझे सहयोग दे वह पूर्ण अपना समर्थन

सुविधा लाभ मिला करे होता रहे आवर्तन

आदर्श, सिद्धांत, नैतिकता लगता स्तब्ध है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है


अधिकांश पढ़ते रहते अपने धर्म की पुस्तक

सारांश तक झलके नहीं कामनाओं की दस्तक

धर्म भाव सब एक कहें इसपर चर्चा निःशब्द है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है


विपक्ष, विरोध हंगामे का प्रयोग सब उपद्रव

भौतिकता की चमक-दमक फिर भी पराभव

अंतर्मन की ज्योति बुझ रही गुट लयबद्ध है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है।


धीरेन्द्र सिंह

27.09.2026

08.25

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

मनुष्य

रोपता नहीं हूँ बल्कि छींटता हूँ
ढकेलता नहीं बल्कि खींचता हूँ
पल्लवन संभावना जहां भी दिखे
मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ






मनुष्य हूँ प्रबुद्ध हूँ संयुक्त हूँ

आत्मा अजर अमर से युक्त हूँ

चुनौतियां मिले आंख न मींचता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ


प्यार ले शुमार हूँ एक खुमार हूँ

व्यक्ति-व्यक्ति गढ़ सकूं कुम्हार हूँ

मनुष्यता का ना कोई रिक्तता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ


व्यक्ति का अस्तित्व हूँ नियुक्ति हूँ

मनुष्य हूँ मानवता की आसक्ति हूँ

मैं, तुम, यह, वह विलग कर उन्मुक्तता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

26.09.2026

08.18
 

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

कौन छूटा

कौन टूटा, कौन रूठा जग की यह बात है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है



साथ चलता कौन है यह लोकप्रिय भ्रम है
भीड़ हो या नाते-रिश्ते पसरे बहुत वहम हैं
कौन  छूछा, कौन भूखा सदियों के हालात हैं
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है

चल रहे अकेले अनुभूति कहे सब साथ हैं
लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं लगे एकलाक्षीय बारात है
कौन लूटा, कौन झूठा जग में यही चर्चा नाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है

विश्व यह माया है सबसे झूठी यह काया है
स्वार्थ जहां थम गया ठौर वही मन भाया है
कौन अनूठा, कौन अटूटा चलता यही विवाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है।

धीरेन्द्र सिंह
25.09.2026
05.30

बुधवार, 23 सितंबर 2026

यह कैसे रचनाकार

 समूह में
जब कभी भी
पढ़ता हूँ
प्रकाशित पुस्तक की
कोई रचना 
या कोई अंश
दया आती है रचनाकार पर
शेष नहीं रहा लेखन अंश,











बुरा लग गया ?
क्यों रचनाकार जी
समूह क्या 
शीत भंडार गृह है
जहां वर्षों पहले रचित को
भंडारण के लिए डाला जाता है
या कि रचनाकार जी
नया मौलिक लेखन से भी नाता है ?












रचनाकार हैं, कल्पनाशील हैं
फिर अपनी रचना का
बने क्यों वकील हैं ?
चिपका देते हैं पुरानी रचना
समूह का उद्देश्य नहीं सामान्य
रचे विगत साहित्य का ढकना,
क्या चूक गए हो रचनाकार
भूतकाल की रचना विज्ञापन
करतेअनचीन्ही झंकार,













समूह में
जब कभी भी
पढ़ता हूँ पूर्व प्रकाशित रचना
रचनाकार का प्रचार-प्रसार लगे
जिसकी सूख गई है कल्पना
बीते कल लिए आज में सजना।









धीरेन्द्र सिंह

23.09.2026

13.21
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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

यह भारत है

बहुबोली, बहुभाषाएँ संग हैं नव आशाएं

धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए


धर्म संकुचित करने पर कुछ लोग आमादा
भाषा जिसमें उभर रही है ओढ़े भाव लबादा
राष्ट्रीयता के ओर-छोर पर तिरंगा है लहराए
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए

प्रजातंत्र है मौलिक अधिकारों की आजादी
यह क्या भाषा-धर्म की इतनी प्रखर मुनादी
मानवता का सेतु सुहाना ऐसे कैसे बनाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए

सर्वभाव, सर्वधर्म, सर्वभाषा के हैं अनुरागी
यह भारत है हिलमिल, झिलमिल का रागी
कुछ हंगामे, कुछ हलचल को मुद्दा ना बनाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए।

धीरेन्द्र सिंह
23.09.2026
06.04


सोमवार, 21 सितंबर 2026

आपके नाते

मजबूर कर रही हैं आपकी बातें
दिल झुक रहा है आपके नाते



हर पोस्ट आपकी भावना दर्शाती

क्या सोचती जाएं आप है बतलाती

कुछ कल्पना आपकी कुछ बीती बातें

दिल झुक रहा है आपके नाते


मन महक उठता है बहक उगता है

भावनाओं की भूख में चहक चुगता है

आप उभर उठती हैं संभावना बांधे

दिल झुक रहा है आपके नाते

आप क्या हैं किसकी हैं फर्क नहीं
जीवंत हृदय स्वामिनी हैं तर्क नहीं
बस आकर्षण आपका दिल मेरा साधे
दिल झुक रहा है आपके नाते।

धीरेन्द्र सिंह
22.09.2026
03.59

रविवार, 20 सितंबर 2026

लौटा दिया

मुझे ना बुलाती मुझे ना सुनाती
है दुनिया में अपने दुनिया सजाती
है गुस्सा बहुत देखना नहीं चाहे
लगन है यह मेरी मुझी से छुपाती






बहुत था जतन थे बहुत से भी वादे
गगन में सहन था बादल थी सजाती
थे हतप्रभ निरख सज्जा सब विहंगम
धुन अपने में थी बढ़ती मुझको छुपाती

दरवाजे से मुझको लौटा दिया था
पहले देहरी मेरे आगमन पर थी सजाती
क्यों आए चले जाओ बोल थी खड़ी
क्षद्म नाराजगी में वेदना को।छुपाती

कई वर्ष बीते यादों से हैं ना रीते
जिंदगी भी है जिंदगी को सजाती
कुछ ना टूटा ना छूटा स्पंदन वही है
धड़कन अक्सर है अब तड़पन छुपाती।

धीरेन्द्र सिंह
21.09.2026
08.21