बुधवार, 24 जून 2026

लाठी-लाठी का भेद

उन्मुक्त कामनाओं का कैसे करें उल्लेख
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद



अपने मन की सुनें या समाज को गुनें


उभरती हैं दबती जाती हैं आह्लादित धुनें
परिवेश ही सुन धुन निकालता मीनमेख
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद

जब मन उड़ता, चाहे जिस ओर है मुड़ता
मात्र उन्माद नहीं रहता बल्कि भाव गूढता
कदम आगे-पीछे होते देख अनगढ़ विभेद
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती है खेद

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, गया सिखाया
सामाजिकता के कई स्तर हैं, गया छुपाया
अर्थ आधारित है जीवन लाठी-लाठी का भेद
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद।

धीरेन्द्र सिंह
25.06.2026
04.23

सोमवार, 22 जून 2026

कोचिंग क्लास

कोचिंग क्लासेस एक प्रचलित शब्द
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध 

व्यवसाय हो गयी है भारतीय शिक्षा
याद करो लिख दो उत्तीर्ण परीक्षा
रटंत विद्या में सक्रिय कोचिंग संबंध
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध

लखनऊ में कोचिंग क्लास जल गया
होनहारों संग देश भविष्य तल गया
खोया जिन्होंने बच्चे क्या है यह प्रारब्ध
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध

सख्त निगरानी में रखे जाएं कोचिंग
आत्महत्या, झगड़े, आगजनी है निंद
श्रद्धांजलि देती यह व्यवस्था निःशब्द
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध।

धीरेन्द्र सिंह
23.06.2026
03.15

फोटो रचना

श्रम को कर्म के भ्रम में लेना
जैसे खटिया बिन सजा बिछौना
श्रमिक उठाता बोझ को दिनभर
साँझ ना पाता खरीद खिलौना





मिलते है ऐसे वाक्य कई बोलते
जैसे कोई खाद्य संभाला हो दोना
कर्म को सिकोड़कर दे नए अर्थ
श्रम को दे दिए करीब का कोना

संलग्न फोटो को देखिए बोल रहा
गर्मी में प्यासा नहीं जल भगोना
नहीं जलाशय ना ही जल चमक
कबूतर की प्यास तड़प थका डैना

गमले की तलहटी तक पहुंच हुई
संकट हो भारी निराशा क्यों बोना
चोंच अपनी से बूंद रहा खींच है
इसे कहते मौलिक अविष्कार होना।

धीरेन्द्र सिंह
22.06.2025
19.37




रविवार, 21 जून 2026

बदरिया

बदरिया भरकर बरसने को आ रही
मन भींगने के लिए तैयार हो रहा है 
एक प्यास धरा का व्यक्ति का भी, कहे
गर्जना, पूरब दूर से पुकार हो रहा है






कुछ भी न होता अचानक, भूमिका बने
खुद को न हो पता यह क्या हो रहा है
व्योम में बदलियों भरी हुई असंख्य हैं
क्या बात बूंद एक बदली का भिंगो रहा है

कहां से चली कहां छाई कहां पर बरसी
दूजी बदरी टकराई विद्युत बरस रहा है
आकर्षण कहें या चाहत या जन्मों का खेल
सब कुछ तो पास है पर मन तरस रहा है

घर के शॉवर से भींगना भी जैसे बरसात
फिर क्यों मन उन्मुक्त बदरी निरख रहा है
बंधनहीन उन्मुक्त छाँवमुक्त जीना चाहे
आदिकाल से ही जीवन मौसम परख रहा है।

धीरेन्द्र सिंह
22.06.2026
07.25

शनिवार, 20 जून 2026

कहां प्यार है

सत्य है, समझ है, तार्किक विचार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है




कामनाएं, कुंठाएं, वर्जनाएं ही मुखरित
अर्चनाएं कैसे लुभाएं भ्रम  है प्रचलित
छल, मजाक,मस्तियों का यह संसार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है








फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम में सक्रिय
भाषा, भाव उनका देख दुखी रहे हिय
कितना नाटकीय हो गया दिल दुलार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है







होगी कहीं गूढ़ भावना जनित ऋतुवार
कहीं कोई भाव समझता होगा ऋतुसार
हृदय से हृदय मिले यही सत्य अंकवार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है।







धीरेन्द्र सिंह
21,06.2026
22.23

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शुक्रवार, 19 जून 2026

जग रीत

जो बहता है वह सहता है यही जग रीत

कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत


बहता है जो मन साफ है मान प्रतिष्ठा साख है

संयमित प्रवाह से संचालित अप्रयोज्य साफ है
अपनी लय में चलता, बढ़ता है अघोषित उम्मीद
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत

उत्सव से वह अप्राभावित जीत में रहे निष्काम
कर्म ही उसकी पूजा सभी लक्ष्य हों जैसे धाम
अवसरवादी घर के कहते उनके प्रयास की प्रीत
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत

अनबोले अनचीन्हे रहते कर्म राह के दीवाने
अपनों को सुख सुविधा देते यह अथक परवाने
हर घर में एक ऐसे व्यक्तित्व हरदम हों प्रतीत
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत।

धीरेन्द्र सिंह
20.06.2026
04.02




बुधवार, 17 जून 2026

धमाल तुम बवाल

भोर तड़के जो टूटी नींद क्या करार धरूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ



मन है ढूंढता उस टूटे हुए क्षण की धमक
खिली थी जिंदगी महकती बहकती चमक
अब भी क्या छूटा जिसपर न अख्तियार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ

पौ फटी नहीं पसरा हुआ सन्नाटा है पुरजोर
न जानूं प्रीत आश्रित है सामाजिक गठजोड़
उभर आई हो चेतना में क्यों न अभिसार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ

न फोन न चैटिंग न वीडियो कॉल हो रहा है
जो कट गया छंट गया यह काल कह रहा है
कपाल में धमाल तुम बवाल आओ सत्कार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ।

धीरेन्द्र सिंह
18.06.2026
05.02