मंगलवार, 3 नवंबर 2026

भाग्य

जीवन सरल है सब अपनी-अपनी राहों में
क्या कुछ नहीं मिलता भाग्य की बाहों में 



कर्म व्यस्त रखने का एक सुंदर छलावा है
शोषकों का तय यह शब्द छद्म बुलावा है
सच मान लिए सब जो लिखा किताबों में
क्या कुछ नहीं मिलता भाग्य की बाहों में

जीवन सरल हैं पर कुछ के लिए गरल है
जो भाग्य रचाते उनके कुकर्म धवल हैं
जीवन अनेक रूप है विभिन्न निगाहों में
क्या कुछ नहीं मिलता भाग्य की बाहों में

संयुक्त कर्म एकलाक्षीय है भाग्य निर्माता
ज्ञात हो रहा है सामूहिकता भाग्य विधाता
अकेले कर्म से व्यक्ति शोषक पनाहों में
क्या कुछ नहीं मिलता भाग्य की बाहों में।

धीरेन्द्र सिंह
04.11.2026
07.54

सोमवार, 2 नवंबर 2026

जानी-जानी

"इस घड़े से लोटा निकाल के"
यह भाव है कितने सवाल के



कई वीडियो में यही बसे बानी
"जानी-जानी पिला दे पानी"
शराब लुप्त घड़ा बवाल के
यह भाव है कितने सवाल के

संगीत शक्ति से शब्द खिलते
गायन बुद्धि से भाव मचलते
द्विअर्थी लेखन विरोध बवाल के
यह भाव है कितने सवाल के

भोजपुरी लेखन का है प्रभाव
टपोरी लेखन का वीडियो निभाव
सब ज़मझें साहित्य रुग्ण हाल के
यह भाव है कितने सवाल के।

धीरेन्द्र सिंह
03.11.2026
11.00

भोर

दृष्टि चाहिए वृष्टि प्यार की चहुंओर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर



अमावस सी रात व्यक्ति सोच आधारित
पूर्णिमा की आँच शक्ति ओज आपूरित
सब यहीं सबका यहीं पर ओर छोर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर

चुनौतियों कठिनाईयों से होता घायल
विपरीत हवाओं का होता वही कायल
आत्मबल से दबाता जाता जीवन शोर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर

ईश्वरीय अंश जीव ईश्वर को खोजता
मानव अमूल्य जन्म परम्परा से नोचता
फल की कामना ना देखे टहनियों के बौर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर।

धीरेन्द्र सिंह
03.11.2026
04.42

रविवार, 1 नवंबर 2026

चलो न

चलो न प्रकृति द्वार मिल श्रृंगार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

एकल नहीं कुछ संभव द्वय का दरकार
युग्म ही जीवन सुगंधमय हो हर द्वार
रंगबिरंगे भावनाओं में चमत्कार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

एक ढर्रे पर जीवन जीने के अभ्यस्त
प्रतिदिन वही कार्य कहते सब हैं व्यस्त
निर्धारित राहों का मिल परिष्कार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

अनेक पक्ष अमावस्या के प्रभाव से ग्रसित
सुख-सुविधा सभी पर आत्मा कहीं ग्रसित
शुद्ध आत्मा तक पहुंचकर अभिसार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे।

धीरेन्द्र सिंह
02.11.2026
05.03

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

मानवता

प्रदर्शन है दर्शन है इसी में ठेलमठेल है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है



मानवता अति विशिष्ट मानव उपयोगी चीज
नैतिकता गति परिशिष्ट समाज में दिखे खीज
आदर्श और सिद्धांत चर्चा के प्रचलित भेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है

मुट्ठीभर लोग हैं जीवन उत्थान के प्रयास में
शेष व्यस्त हैं उभरती विभिन्न अपनी प्यास में
खरीद लो मानवता का हर समय का "सेल" है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है

नई पीढ़ी रहा सीख सजग भौतिक सुख मूल्य
धर्म-कर्म भी हैं दिखते परलोक भाव अमूल्य
मनुष्यता में भी लगे मनुष्य वर्गीकृत बेमेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है।

धीरेन्द्र सिंह
01.11.2026
06.22

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

नाच रे तन नाच

 नाच रे तन नाच मन नाच रहा जैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे

जिंदगी उत्सवों की बेचैन प्रणाली है
मन सोच रहा क्या खनकती प्याली है
लिखा गया है जो उसे बाँच रहा कैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे

लेने को लंबित अभी फैसले बहुत हैं
मन क्यों अचंभित सिलसिले बहुत हैं
उम्र की स्लेट पर क्यों हिसाब ऐसे-तैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे

यह तन ही तो है अनुभूतियों का चितेरा
कामनाओं की धुन पर सरगमों का डेरा
मन ऊर्जा अनंत है खुद को जांच रहा कैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे।

धीरेन्द्र सिंह
31.10.2026
03.57

इतना क्या सोचना

हम भी इस तरह अब बहकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं



भाव उठते हैं जैसे इत्रदानियाँ सजी हो

धुन सारंगी और तबले में मिल रची हो
खयाल घुंघरुओं सा अब छमकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं

खुद की दीवानगी के फलसफे हैं निराले
ज़िंदगी गुनगुना रही है चाहत के नए प्याले
पुरवैया सा तन बहे चुप दर्द उभरने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं

यह आवारगी है या जीने का अंदाज नया
कोई बेचारगी है या बंधा नगीना साज बयां
इतना क्या सोचना दिल से जगने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं।

धीरेन्द्र सिंह
30.10.2026
19.43