शनिवार, 2 मई 2026
वेदनाएं
छूकर कह रही हैं यह आपकी चेतनाएं
शब्दों में सिमटकर मनोभाव चल पड़े
चौरंगी मन में चतुर्भज है कंपित चेतना
कब हो सका चलती रहे अपनी मनमर्जियाँ
धीरेन्द्र सिंह
शुक्रवार, 1 मई 2026
धक-धक
धक-धक, धीरे-धीरे, साथ-साथ, कुछ-कुछ
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस, सचमुच
आप कई आवरण के प्रकरण परे हैं विद्यमान
थाप जिंदगी के कई आवरण धरे हैं निदान
मति-मति, दौड़े-दौड़े, आस-आस, हँसमुख
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस सचमुच
यथार्थ के विचार में आपका ही नित संचार
परमार्थ है स्वीकार जाप का ही मीत प्रकार
रचि-रचि, हौले-हौले, खास-खास, अभिमुख
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच
क्रिया की प्रतिक्रिया में सक्रिय है भाव क्रिया
दिया है मन में जला विनयी है चाह प्रिया
सखि-सखि, तौले-मोले, रास-रास गुपचुप
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच।
धीरेन्द्र सिंह
02.04.2026
09.49
खामोश आंधियां
नयन की नयन से सुगंधित शरारत
मुस्कराहट में आपको मिली महारत
जुल्फ गर्दन की अठखेलियाँ भी हों
वाचाल उभरती जाए सुगंधित इबारत
शिष्ट, शालीन, व्यक्तित्व करता है मोहित
प्रभाव ऐसा हो लयबद्ध सी थरथराहट
गीत बन जाती है निहारती यह दुनिया
स्वर दें आप उसे उभरे मीठी छटपटाहट
हृदय के पंख पर बिठाकर आपको उडें
गगन कर नमन दर्शाता रंगों की महारत
आपके रंग देख मेघ भी एकटक हो तकें
नशीले रंगों की स्वामिनी फाग सी शरारत
कुशलता से छिपा लेती अपने सारे बवंडर
उड़ता जाता है परिवेश करती जाती आहत
समझने के प्रयास में होते जाते सब बदहवास
आप खामोश आंधियों में उड़ाती हैं चाहत।
धीरेन्द्र सिंह
02.05.2026
05.36
गुरुवार, 30 अप्रैल 2026
मजदूर दिवस
मजदूर दिवस है ना होइए मगरूर
भारत है निर्माता विभिन्न्न से मजदूर
पसीना बहानेवाले ही लगते हैं श्रमिक
पढ़े-लिखे भी मजदूर कर मौलिकता शमित
भारत श्रमिकों का निर्यातक है मशहूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर
आई टी का बोलबाला सब पढ़ते प्रौद्योगिकी
पूर्ण कर यह शिक्षा सेवा प्रदाता की लायिकी
कम्प्यूटर की गैर भाषा न अपना सर्च इंजन नूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर
हम विश्व के श्रेष्ठ एक शिक्षित मजदूर
मजदूर दिवस आज भी रहा हमें घूर
बहुसंख्य विदेशों में हैं जाने को प्रणपूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर।
धीरेन्द्र सिंह
01.05.2026
08.02
बुधवार, 29 अप्रैल 2026
जीवन
उम्र तन्मय हो गया है आस का उन्माद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
आर्थिक आजादी ही सर्वप्रमुख अभियान
स्वार्थ सिद्ध के खातिर करते हैं गुणगान
जीवन ऊर्जा सूख रही मिले न पानी खाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
देह तलक ही नेह है नखशिख सौंदर्य
भौतिकता में उलझे ना आत्मिक सौकर्य
नेह डगरिया नहीं गगरिया मन पनघट नाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
उम्र गुजरती राह बदलती और बदले चाल
आज सुन रहे कल बदलती उम्र अपनी ताल
पकड़-धकड़ कर उम्र को रोकें यौवन विवाद
जीवन झंझावात है कहाँ मधुर संवाद।
धीरेन्द्र सिंह
30.04.2026
08.27
मंगलवार, 28 अप्रैल 2026
आप
आप इस दिल की जिंदगानी हैं
प्यार की हम भी एक कहानी हैं
आपकी हलचलें खामोश हो रहीं
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं
गहन गहराई में भाव तुरपाई करें
अदृश्य देह आत्मा की रवानी है
आप हर बार हवा सा छू रहे हैं
ऐसा लगता हम उबलते पानी है
कहां से राह चली और शाम ढली
जिंदगी हतप्रभ सी अनजानी है
आज भी आस प्यास साँसों में
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं
आपकी ऊष्मा आपकी ऊर्जा है
एक गति मति में संगती ठानी है
प्यार के गुबार में आपका बुखार
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं।
धीरेन्द्र सिंह
29.04.2026
05.56
सोमवार, 27 अप्रैल 2026
गर्मी
मौसम आक्रामक नहीं कहीं है नर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
घर से बाहर सूर्य प्रखरता से मिलता है
पसीने में मजदूर निडरता से चलता है
धरा की उष्णता गुम्बद में फंसी चर्खी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
आग बरस रही श्रमिक को लगे है फाग
तरबतर पसीने से भींगा सजाता है आज
हमेशा मौसम न रहा जिजीविषा धर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
सतत संघर्ष में निहित मानवता का उत्कर्ष
जूझते जीवन से उन्हें क्या मौसम का विमर्श
मौसम प्रणय करता कभी चुहल बेशर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी।
धीरेन्द्र सिंह
28.04.2026
08.45
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