शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

डायरी क्यों

 डायरी क्यों

एक स्वाभाविक प्रश्न सहज ही इस पुस्तक के प्रबुद्ध पाठक के मन में उभर सकता है कि पत्रकार की डायरी क्यों ? इसे कदापि न स्वीकारा जाए कि इस पुस्तक के लेखक व पत्रकार की यह कोई निजी डायरी है। सामान्यतया प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है जिसके आधार पर वह पत्रकारिता को गतिशील बनाने में होता है। यदि इस पुस्तक विशेष की बात की जाए तो यह डायरी सार्वजनिक जीवन के सार्वजनिक समाचार का सार्वजनिक हित सूचक है। ज्ञातव्य है कि प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है किंतु कभी-कभी ऐसे व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव होता है कि एकल व्यक्तित्व आधारित डायरी निर्मित हो जाती है।

"माँ गंगा ने बुलाया है" यह आस्थापूर्ण वाक्य भारतीय जनमानस के पटलनपर एक चेहरा उभरता है जिसे विश्व नरेंद्र मोदी के नाम से पहचानता है। काशी में इतना प्रबल, प्रखर और प्रियग्राही वाक्य गंगा तट पर नहीं गूंजा था। इसे वाक्य कहना भी इस वाक्य में निहित आस्था, सम्मान और समर्पण के प्रति न्यायोचित नहीं होगा। यह एक वाक्यबनाहीं बल्कि वाराणसी के लिए विशेष तौर पर एक सूक्ति बन गया था जो अब भी बनारस की हवाओं में गूंज रहा था। यहीं से पत्रकार दृष्टिकोण ने चेताया कि अब काशी में कुछ अति विशिष्ट होने की प्रबल संभावनाएं है। पत्रकारिता धर्म ने नरेंद्र मोदी को वाराणासी में गहनता से समझना और प्रत्येक गतिविधियों को सहेजना आरम्भ किया और निर्मित हो गयी पत्रकार की डायरी जो आपके समक्ष प्रस्तुत है।

डायरी की यह प्रस्तुति धरा पर गंगा अवतरण के उल्लेख के बिना अपूर्ण कहा जा सकता है। भगीरथ या भागीरथ की घोर तपस्या और दृढ़ निश्चय के बल पर ब्रह्मा के सुझाव पर शंकर ने अपनी जटा के द्वारा गंगा के असाधारण वेग को नियंत्रित कर धरा पर प्रवाहित किया। जटा जो वर्तमान में बुद्धिबल और दृष्टिकोण बल के समानार्थी है उसका प्रदर्शन नरेंद्र मोदी ने काशी में किया। इस बल के परिणामस्वरूप वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का ही निर्माण नहीं हुआ बल्कि अयोध्या में राम मंदिर भी अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ पुनर्स्थापित हुआ। यदि कहा जाए कि सनातन धर्म के लिए नरेंद्र मोदी का प्रयास भगीरथ प्रयास था तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इसे योगायोग कहा जाए या सुखद संयोग कि जिस कुल में भगीरथ का जन्म हुआ वही कुल इस पुस्तक के लेखक का भी है। परंपराओं के गौरव का उल्लेख हर कोई करता है इसलिए प्रसंगवश इस तथ्य का भी उल्लेख किया गया। गंगा सदियों से काशी से सटी हुई गतिमान हैं किंतु नरेंद्र मोदी के वाराणसी का सांसद बनने के बाद जो अभिमान काशी को हुआ है वह भगीरथ प्रयास ही तो है। बनारसी साड़ी की तरह नरेंद्र मोदी काशी को नए धागे से बुनते और संवारते गए जिससे भारत देश ही नहीं बल्कि विश्व का भी ध्यानाकर्षण हुआ। बदला हुआ आकर्षक काशी पहले से बहुत अधिक लोगों को आकर्षित कर रही है। तमिल संगमम के द्वारा उत्तर भारतौर दक्षिण भारत के बीचेक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक पुल निर्मित करना नरेंद्र मोदी की ही दूरदर्शिता है।

समय कभी टूटता नहीं है बल्कि वह परिवर्तित होता है नए रंग और ढंग में और निरंतर गतिमान रहता है। इस गतिमान समय पर काशी की मूल प्रवृत्ति को बरकरार रखते हुए नई चित्रकारी कर देना नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव है। बनारस नरेंद्र मोदी को नव रचयिता के रूप में भी जानता है। एक पत्रकार घटित लगभग सभी घटनाओं का साक्षी होता है। तथ्य ही नहीं बल्कि सत्य आधारित तथ्य को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना पत्रकार का धर्म है। एक पत्रकार की दृष्टि जब समाज और उसके परिवेश में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की सफल उपलब्धियों का क्रम निर्मित करता है तब कहीं जाकर एक पत्रकार की डायरी सजती है। उल्लेखनीय है कि गंगा और शिव आधारित काशी है जिसे नरेंद्र मोदी ने संवारा है अतएव भगीरथ, शिव, गंगा, विश्वनाथ धाम, अयोध्या का राम मंदिर आदि डायरी के प्रेतक ऊर्जा हैं। आपके समक्ष इस डायरी को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता हो रही है।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

निर्मुक्त हो जीवन

आस जब तुम्हारी है प्यास जब तुम्हारी है
कहो क्यों न करूँ मैं फिर तुम्हारी अर्चना
सृष्टि जब दुलारी है दृष्टि की जब लयकारी है
कहो क्यों न हृदय तब करे मुग्धित गर्जना






शक्ति की सब करें अर्चना अद्भुत है सर्जना
पुष्प, दीप यही सब सीख क्यों नही हो कामना
ध्यान का ही गान चलता जीवन है इसमें पलता
कहो क्यों न हो व्यथित कथित का हो सामना







स्वयं को बांधकर अभिलाषाएं बांटकर गतिशील
कहो क्यों न करूं में फिर बंधनों का मर्दना
सत्य हो तुम शिष्ट हो पर एक परिशिष्ट हो
कहो क्यों न नव पृष्ठ रचूं लेकर प्रखर रचना







कठिन नहीं शब्द हैं भाव भी नहीं हैं स्तब्ध
कहो फिर क्यों न गढूं शब्द निहित अभ्यर्थना
बोलती ही तुम कितनी संतुलन के बाद भी
उन्मुक्त जीवन के लिए निर्मुक्त हो जीवन व्यंजना।







धीरेन्द्र सिंह
24.07.2026
05.49
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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

पथिक हूँ

मैं ही कारवां, मैं ही गति, मैं ही पथिक हूँ
संघर्ष है, समस्या हैं किंतु मस्त व्यथित हूँ




जग जाग रहा लगता पर प्रायः उनींदा है
दृग ताक रहा अक्सर पर स्वप्न सरीखा है
कुछ कर्म कुछ भाग्य से लगता समर्थित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ

जो भी जुड़ा चलता रहा कुछ रिश्ते चुरा
निरपेक्ष मैं रहा पर कह गया मुझको बुरा
मैं जैसा था वैसा हूँ वह कहते परिवर्तित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ

कांटे नहीं तो गुलाब की परिकल्पना कठिन
बांटे नहीं तो श्वासों की अभ्यर्थना मलिन
शुचिता से जी रहा हूँ समाधान समर्पित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ।

धीरेन्द्र सिंह
22.07.2026
08.37

सोमवार, 20 जुलाई 2026

स्वीकार्य जिंदगी

समझकर भी नासमझ सी है कार्य बंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी




जुड़े हुए हैं जो कुछ मुड़े भी लगते वो
अपनेपन की भावना में रहता जीवन बो
सब कुछ सहज हो जैसे भीतर तो शर्मिंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

दांतों के बीच जीभ कटती है पर न बोलती
कड़वाहट भी हो कितनी जिह्वा मीठा बोलती
सहन के गगन में रहे परिवेश परिवार बुलन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

सबका जीवन अलग भिन्न तंत्र-मंत्र, आराधना
अपनों की खातिर जीना पिघलती सी कामना
झर चुके हैं खुद लुटे हैं पर अपनों बीच हदबन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
11.10

आप हैं बस सोचती

सींचता है हृदय हरदम बनकर पुनीत पावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

आप नयनों में नहीं झांकती बस ताकती है
मेघ पुतली में सघन हैं सत्य यह नहीं मानती हैं
नयन भर नमी हमेशा पलकों का रहता है छावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

चमकती हैं पुतलियां होता है जब नेह गर्जन
आप ही कारण हैं आप ही हैं भाव बूंद नर्तन
झमाझम भाव वर्षा में हो जाता जलमग्न तन आंगन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

हृदय सूर्य सा दग्ध मेरा आप भावना का सागर
वाष्पित होती मन में बसती रचती रहती बादर
हृदय बरसता लिए सहजता और भींगता दामन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
03.49

शनिवार, 18 जुलाई 2026

आत्मिक संघर्ष

पकड़ना चाहते इतना पर कितना छूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है




प्यार के हिलोरे हैं अनुराग के बेचैन किनारे
वह अपना है तो अनवरत अपने को दुलारें
जिंदगी उपद्रव भी लगे और समय लूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

बादलों सा उड़ता नभ से जुड़ता चित्त चंचल
कभी बाहों का घेरा तो कभी उड़ता आँचल
विचारों में बंधा जीवन अपने में ही घुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

धधकती आग भीतर पर मंद होता प्रकाश है
वृष्टि की चर्चे बहुत हैं पर दिखती नई प्यास है
तन की कहें मन की सुने व्यक्ति इसमें लुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है।

धीरेन्द्र सिंह
19.07.2026
16.42

जीवन

मिल रहे हैं दर्द मगर मर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं




हैं जो अपने क्यों लगे गलत पनपने
लगाव था निभाव भविष्य के सपने
फिसल गए स्वार्थ का यूँ तर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं

भावुकता भर स्वभाव वही हाव-भाव
अपनों के बीच खोजते पहचानी छांव
ऐसे बन गयी दूरियां लिए कर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं

मन है टूटता फिर बनता जैसे कोशिकाएं
अपनों का दर्द कितना कोई ना बता पाए
जीना यही है जीवन दर्द यूँ दर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं।

धीरेन्द्र सिंह
18.07.2026
20.27