रविवार, 26 अप्रैल 2026
प्रबुद्ध
प्रबुद्ध हैं तो सर्वत्र ज्ञान बांटिए
संज्ञान उत्तर प्रदेश गृहित शब्द है
थार के गुबार में लिप्त लगता व्यवहार
इतर राज्य-राष्ट्र में दीप्तिमान हैं रहिवासी
शनिवार, 25 अप्रैल 2026
उलझन
अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
कश्तियाँ दोनों की मगन साथ-साथ थीं
हस्तियां अपनी भी सबरंग बेहिसाब थीं
कुतर दिया समाज ने जुड़ाव दे पैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व
अपने को देखे या सहेजे तीरे अस्तित्व
टपक रहे हैं भाव पर मुस्कराहट के छैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया
महल की बात करे जीर्ण हो रही कुटिया
प्यार अवसर है स्नेह सुप्त ताल की मैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना।
धीरेन्द्र सिंह
26.04.2026
10.24
गजब लिखते हैं
गजब लिखते हैं सरकार जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
भावनाओं की हो पल्लवित फुनगिया
कामनाएं खिलें लेकर विचार दुनिया
अभिव्यक्तियाँ जैसे हवन विचार घी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
मेरे हर लेखन की ऊर्जा हैं पाठक
सबकी अपनी शैली लेखन जातक
पाठक-पाठिका रचना रत्नहार जिय
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
यह रचना प्रतिक्रिया का प्रभाव
प्रतिक्रिया मस्तक रखना स्वभाव
आप महत्वपूर्ण सत्कार करे जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी।
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026
देह मिलन
देह से देह मिलन भी एक जतरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026
व्यक्ति
इतना रीता भी नहीं कि
ढूंढू व्यक्ति करने को बात
इतना भरा भी नहीं कि
कर सकूं अनदेखा जज्बात
मन की कूंची है तत्पर
बहुरंगी भावनाओं की सौगात
रविवार, 22 मार्च 2026
उम्र
उम्र मुझसे मांगती है सरसराती रीति
अन्य प्रपंच ना भाए प्रणय जीवन गीत
कब कहां चूका रीता सा है लगता कहाँ
तार झंकृत हैं सभी सुप्त आपका प्रतीत
तार के कसाव का कौशल यदि छूटे
भरभराती सी लगे चट्टान निर्मित भीत
वर्तमान के सरगम में नवीनताएँ अनेक
क्या मिलेगा सोचकर कैसा था अतीत
भावनाएं पक जाने पर बदल देती रूप
सुगंध, मिठास, अहसास रहते वैसे मीत
उम्र एक बदलाव है रूप, रंग, तरंग का
रुनझुन मादकता ना बदले माथा ना पीट।
धीरेन्द्र सिंह
23.03.2026
09.12
शनिवार, 21 मार्च 2026
सत्य
सत्य क्या है सांझ सरल अरुणाई
रात्रि लगे तिमिर किसी को तरुणाई
भाव सहित दृष्टि की बहती सर्जना
जग की विविधता चेतना की परछाईं
महत्व का घनत्व है अपनत्व सघन
गगन का दहन है तपन की रुसवाई
आकर्षण कर घर्षण करता विकर्षण
बदन बहुरंगी अतरंगी द्रवित चतुराई
कामना के पर्व में योजना स्व सर्व
याचना भी रचना करे जैसे पुरवाई
मोह के खोह में देह लगे अति सुबोध
अभिलाषाएं फूट पड़ें वासंती अमराई।
धीरेन्द्र सिंह
22.03.2026
08.12