बुधवार, 23 सितंबर 2026
मंगलवार, 22 सितंबर 2026
यह भारत है
बहुबोली, बहुभाषाएँ संग हैं नव आशाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए
धर्म संकुचित करने पर कुछ लोग आमादा
भाषा जिसमें उभर रही है ओढ़े भाव लबादा
राष्ट्रीयता के ओर-छोर पर तिरंगा है लहराए
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए
प्रजातंत्र है मौलिक अधिकारों की आजादी
यह क्या भाषा-धर्म की इतनी प्रखर मुनादी
मानवता का सेतु सुहाना ऐसे कैसे बनाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए
सर्वभाव, सर्वधर्म, सर्वभाषा के हैं अनुरागी
यह भारत है हिलमिल, झिलमिल का रागी
कुछ हंगामे, कुछ हलचल को मुद्दा ना बनाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए।
धीरेन्द्र सिंह
23.09.2026
06.04
सोमवार, 21 सितंबर 2026
आपके नाते
मजबूर कर रही हैं आपकी बातें
दिल झुक रहा है आपके नाते
हर पोस्ट आपकी भावना दर्शाती
क्या सोचती जाएं आप है बतलाती
कुछ कल्पना आपकी कुछ बीती बातें
दिल झुक रहा है आपके नाते
मन महक उठता है बहक उगता है
भावनाओं की भूख में चहक चुगता है
आप उभर उठती हैं संभावना बांधे
दिल झुक रहा है आपके नाते
आप क्या हैं किसकी हैं फर्क नहीं
जीवंत हृदय स्वामिनी हैं तर्क नहीं
बस आकर्षण आपका दिल मेरा साधे
दिल झुक रहा है आपके नाते।
धीरेन्द्र सिंह
22.09.2026
03.59
रविवार, 20 सितंबर 2026
लौटा दिया
मुझे ना बुलाती मुझे ना सुनाती
है दुनिया में अपने दुनिया सजाती
है गुस्सा बहुत देखना नहीं चाहे
लगन है यह मेरी मुझी से छुपाती
बहुत था जतन थे बहुत से भी वादे
गगन में सहन था बादल थी सजाती
थे हतप्रभ निरख सज्जा सब विहंगम
धुन अपने में थी बढ़ती मुझको छुपाती
दरवाजे से मुझको लौटा दिया था
पहले देहरी मेरे आगमन पर थी सजाती
क्यों आए चले जाओ बोल थी खड़ी
क्षद्म नाराजगी में वेदना को।छुपाती
कई वर्ष बीते यादों से हैं ना रीते
जिंदगी भी है जिंदगी को सजाती
कुछ ना टूटा ना छूटा स्पंदन वही है
धड़कन अक्सर है अब तड़पन छुपाती।
धीरेन्द्र सिंह
21.09.2026
08.21
शुक्रवार, 18 सितंबर 2026
ऑनलाइन प्यार
भावनाएं उभरती हैं अभिव्यक्तियां अपरम्पार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार
गुण कोई होता है कर लेता सहज आकर्षित
हर भाव, सुगम भाव चाहने को रहता व्यथित
मिल जाता कोई अनुकूल, उठता भाव गुबार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार
मोबाइल के स्क्रीन पर हर बात लगे रसभीनी
शब्दों के फुहार में मिले सुगंध प्रीति नव चिन्ही
हृदय धड़कता विनय से कहता मीठा लगे दुलार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार
जब चाहें तब चाह उकेरे दिन हो या रात, सबेरे
अभिलाषाएं अनंत हैं क्यों बंदिश में खुद को घेरें
दूरी चाहे कितनी हो मजबूरी का ना रहे बुखार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार।
धीरेन्द्र सिंह
19.09.2026
06.59
गुरुवार, 17 सितंबर 2026
अपनी छांव
हर व्यक्ति अपनी छांव का गांव है
जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है
मन की भूमि पर कई नई उगती फसलें
कामनाओं की मंडियों में भाव हैं उजले
बेचने-खरीदने का ही सबका स्वभाव है
जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है
मस्तिष्क के ट्रैक्टर से काम सब हो रहा
भावना की बदलियों से सब सिंचित हो रहा
समाज की विविधताओं का दबाव है
जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है
भीड़ की आदत है पर स्वभाव चाह अकेला
स्वयं की तलाश में जीवन का है कई खेला
बढ़ सका व्यक्ति शक्ति उसके ही पांव हैं
जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है।
धीरेन्द्र सिंह
18.09.2026
07.19
बुधवार, 16 सितंबर 2026
सेवानिवृत्ति
तट पर बैठे सोचें क्या, बढ़िए नाव की ओर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर
कितना और निरखना मनवा जग की झांकी
अपने भीतर पैठ गए तो झलकी मिलती सांची
चलिए ढुकिए नीरवता में नहीं इतना बाधक शोर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर
राजनीति यदि गांव में उसमें क्यों ही उलझना
मिल बैठ ना मिलिए संग रह चर्चा में आलोचना
शांत अबाधित परिवेश ऐसा न मिले ठौर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर
पुरखे यही बसे हैं उनका है बरसता आशीष
कुलदेवी की निगरानी में मिल जाते जगदीश
अपनी भाषा अपनी संस्कृति व्यक्ति का सिरमौर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर।
धीरेन्द्र सिंह
17.09.2026
09.42
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