सोमवार, 10 अगस्त 2026

जिंदगी

व्यक्ति भी एक किताब का हिसाब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है

पन्ने प्रति पन्ने फड़फड़ाते पलट रहे हैं
हर पन्ने से इंसान इतराते लिपट रहे हैं
पल सजाने की कोशिश दुल्हन माहताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है

जीवन है एक डगर या लाभ-हानि का लेखा
उलझा वही जिसने ऑडिटर की तरह देखा
कर्म यात्री सा जो चला वही आफताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब।है

कुछ प्यार के पन्ने कुछ संघर्ष की है ऋचाएं
जीते जहां पर जय मिली पराजय क्यों जगाएं
प्रणय जिनका भाग्य है वह ही नवाब हैं
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है।

धीरेन्द्र सिंह
11.08.2026
06.13

रविवार, 9 अगस्त 2026

समाज

किस समाज की यह अवहेलना है
समाज से समाज को क्यों खेलना है
तख्तियों पर लिख गए हैं भाव कई
विचार से विचारों को लगे ठेलना है






धूप तपती दहकती बह रही है कहीं

चाँदनी का धर्म क्या हरदम बहकना है

व्यक्ति के लिए व्यक्ति ही है जरूरी भी

व्यक्तित्व रहे बना रंग अपना दमकना है


समाज ही साम्राज्य समाज ही विवाद

समाज की तरह जीवन को बेलना है

अवहेलना की कीमत चुकाते कई वर्ग

जो बढ़ चुके हैं आगे उन्हें क्या कहना है


तख्तियों का दौर है यही एक तौर है
बतौर शोर के यही सब तो करना है
युक्तियों की नियुक्तियों में कूटनीति है
नीति के रीति से कई भीत को ढहना है।

धीरेन्द्र सिंह
10.08.2026
09.03

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

"तुम पसंद आए, यह इत्तेफ़ाक था..."

 

छत्तीसगढ़ का यह गायक

बना अनुभूति का नायक


विनोद राजा का यह गायन
हर धड़कन का नव वातायन
कल्पना उड़ान में सहायक
बना अनुभूति का नायक

प्रतिभा कहां छुपी जग से
गायन सप्तक ऊंचे सुर में
गीत का मीत स्वर निभावक
बना अनुभूति का नायक

दो गानों की धूम बेबाक
दोनों में शब्द इत्तेफाक
संगीत ना जाने अभिभावक
बना अनुभूति का नायक

यह एक अपरिचित नाम है
इन गानों के क्षद्म गान हैं
विनोद राजा स्वर संवाहक
बना अनुभूति का नायक।

धीरेन्द्र सिंह
08.08.2026
06.36

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

बारिश का नशा

बारिश का अपना नशा है
यदि कोई दिल में बसा है



घटाएं घिर-घिर दौड़ी आएं

जैसी यादें फिर-फिर आए

भाव ने भाव को कसा है

यदि कोई दिल में बसा है


अलगाव में भी निभाव है

वृक्ष कहीं बदलियों की छांव है

हर हाल में जीवन सजा है

यदि कोई दिल में बसा है


व्यक्ति से व्यक्ति हो जाता दूर

मेघ बरसते यह मिलन दस्तूर

शीतल हवाएं उमंगी दशा है

यदि कोई दिल में बसा है

देह नहीं नेह का संसार
स्नेह को प्रत्यक्ष कहां दरकार
धरा व्योम का फलसफा है
यदि कोई दिल में बसा है।

धीरेन्द्र सिंह
07.08.2026
08.55



मंगलवार, 4 अगस्त 2026

कविता

 कविता
उभरती है
एक नावयौना की तरह




भाग जाती है
करती अठखेलियाँ

उसे पकड़ने के लिए
होती नहीं उपयोगी दौड़
भला कौन पाया है पकड़
चंचल भावनाओं को
उछलती कामनाओं को;

सरहद होती है
कविता की भी
भागती है निरंतर ताकते
कभी छिपते
कभी लचकती नाचते
इतराती है, रिझाती है
भावनाओं को
भाव में पकाती है;

डूब जाती है कविता
जीवन की गहराई में
शायद दब जाती है
नहीं उठती भावनाओं की
लहरें
स्थिर जल सा शांत मन
समेटे रहता है बवंडर
जीवन भी तो बदलते रहता निरंतर;

अचानक छा जाती है कविता
घनेरी बदलियों की तरह
नहीं करती बूंदाबांदी
ना ही देती कोई आहट
बरस पड़ती है
झूमकर
हो जाती है प्रवाहित
शब्दों के किनारे बीच
ऐसे देती मन को
हरदम कविता सींच।

धीरेन्द्र सिंह
05.08.2026
06.34

शनिवार, 1 अगस्त 2026

सावन

शब्द चुपके आ पहुंचा भावनाओं का बन संवाहक

आप संशय में हैं उलझे समस्या यह उत्पन्न नाहक


बदलती है प्रीत रीत कल्पनाओं से परे अकस्मात
जैसे तपती दोपहरी में हो रिमझीम सावन बरसात।