रविवार, 26 जुलाई 2026
शनिवार, 25 जुलाई 2026
त्रिभुजी पत्रकार
त्रिभुज का अपना विशेष महत्व है जो दर्शाता है कि जिस को से भी देखी जाए उर्ध्वगामी ही दिखती है। पत्रकार यदि त्रिभुजी रूप में कार्यरत रहते हैं तो वह सामाजिक चेतना को विभिन्न आयाम देते हैं जिससे समाज यथोचित प्रगति, सहमति और प्रदर्शन कर पाता है। त्रिभुज का एक दूसरा रूप भी है जिसमें पंख पसारे व्योम को चूमने या लक्ष्य को भेदने की अभिलाषा नजर आती है। डॉ अरविंद सिंह को मैंने हमेशा त्रिभुजी के रूप में ही पाया है। त्रिभुजी पत्रकार के प्रमुख तीन अंग होते हैं सत्य के संग, सामान्य जनता की ओर तथा नएपन की उपलब्ध संसाधनों में पहचान।
त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह अपने पत्रकारिता जीवन में सत्य का साथ पकड़कर समय-समय पर सत्य का साथ दिया। पत्रकारिता में सत्य को दस्तावेजी रूप देने के लिए इन्होंने "सामयिक ब्लिट्ज" नामक साप्ताहिकी का प्रकाशन वाराणसी से आरम्भ किया। यहां त्रिभुजी पत्रकारिता का एक पक्ष "सत्य" प्रमाणित हो रहा है। दूसरा पक्ष है सामान्य जनता की ओर बढ़ना। यहां सामान्य जनता की विभिन्न परिभाषाएं हो सकती हैं किंतु यदि वाराणासी को ध्यान में रखकर सामान्य जनता की पहचान की जाए तो ग्रामीण जनों का पक्ष प्रमुख रहेगा। इस पक्ष को प्रमाणित करता है त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह का नियमित अपने साप्ताहिकी "सामयिक ब्लिट्ज" को निःशुल्क कुछ गांव को उपलब्ध कराना। प्रसंगवश उल्लेख किया जा रहा है कि ग्रामीण साप्ताहिकी की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक करते हैं। उपलब्ध संसाधनों में नएपन का प्रमाण इस त्रिभुजी पत्रकार के वाराणसी में आयोजित विभिन्न कार्यक्रम तथा अनेक मंदिर निर्माण, गरीबोंनको भोजन एवं कंबल आदि वितरण से जुड़ा है।
वाराणसी के स्पंदनों को जितनी कुशलता से इस त्रिभुजी पत्रकार ने अपनी पुस्तकों में समेटा है ऐसा उदाहरण वर्तमान में कहीं देखने को नहीं मिल रहा है। प्रत्येक अच्छे और बड़े काम में एक धुन होती है लय होती है जिसके आधार पर कार्यों में लयबद्धता बनी रहती है। यदि इन त्रिभुजी पत्रकार महोदय की धुन की बात करें तो वह हैं वाराणसी के सांसद और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा लय है विशेषकर वाराणसी के समग्र विकास गति। पिछले कुछ वर्षों से लगातार पुस्तकों का प्रकाशन वाराणसी के पल-पल, छिन-छिन का पारदर्शी दस्तावेज सा है। यह पुस्तक पत्रकार की डायरी की त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह के काशी के प्रति समर्पण और अनुराग को दर्शाता है। यह पुस्तक भी एक पारदर्शी दस्तावेज की तरह है।
धीरेन्द्र सिंह
कवि और ब्लॉगर
शुक्रवार, 24 जुलाई 2026
रिश्ते
रिश्तों की डोर में न मिलता ओर-छोर
भोर जिंदगी का बंदगी करे भी तो क्या
सूर्य किरणें जगाती सजाती हैं निसदिन
पक्षियों की चहचआहट लगे क्या नया
डायरी क्यों
डायरी क्यों
एक स्वाभाविक प्रश्न सहज ही इस पुस्तक के प्रबुद्ध पाठक के मन में उभर सकता है कि पत्रकार की डायरी क्यों ? इसे कदापि न स्वीकारा जाए कि इस पुस्तक के लेखक व पत्रकार की यह कोई निजी डायरी है। सामान्यतया प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है जिसके आधार पर वह पत्रकारिता को गतिशील बनाने में होता है। यदि इस पुस्तक विशेष की बात की जाए तो यह डायरी सार्वजनिक जीवन के सार्वजनिक समाचार का सार्वजनिक हित सूचक है। ज्ञातव्य है कि प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है किंतु कभी-कभी ऐसे व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव होता है कि एकल व्यक्तित्व आधारित डायरी निर्मित हो जाती है।
"माँ गंगा ने बुलाया है" यह आस्थापूर्ण वाक्य भारतीय जनमानस के पटलनपर एक चेहरा उभरता है जिसे विश्व नरेंद्र मोदी के नाम से पहचानता है। काशी में इतना प्रबल, प्रखर और प्रियग्राही वाक्य गंगा तट पर नहीं गूंजा था। इसे वाक्य कहना भी इस वाक्य में निहित आस्था, सम्मान और समर्पण के प्रति न्यायोचित नहीं होगा। यह एक वाक्यबनाहीं बल्कि वाराणसी के लिए विशेष तौर पर एक सूक्ति बन गया था जो अब भी बनारस की हवाओं में गूंज रहा था। यहीं से पत्रकार दृष्टिकोण ने चेताया कि अब काशी में कुछ अति विशिष्ट होने की प्रबल संभावनाएं है। पत्रकारिता धर्म ने नरेंद्र मोदी को वाराणासी में गहनता से समझना और प्रत्येक गतिविधियों को सहेजना आरम्भ किया और निर्मित हो गयी पत्रकार की डायरी जो आपके समक्ष प्रस्तुत है।
डायरी की यह प्रस्तुति धरा पर गंगा अवतरण के उल्लेख के बिना अपूर्ण कहा जा सकता है। भगीरथ या भागीरथ की घोर तपस्या और दृढ़ निश्चय के बल पर ब्रह्मा के सुझाव पर शंकर ने अपनी जटा के द्वारा गंगा के असाधारण वेग को नियंत्रित कर धरा पर प्रवाहित किया। जटा जो वर्तमान में बुद्धिबल और दृष्टिकोण बल के समानार्थी है उसका प्रदर्शन नरेंद्र मोदी ने काशी में किया। इस बल के परिणामस्वरूप वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का ही निर्माण नहीं हुआ बल्कि अयोध्या में राम मंदिर भी अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ पुनर्स्थापित हुआ। यदि कहा जाए कि सनातन धर्म के लिए नरेंद्र मोदी का प्रयास भगीरथ प्रयास था तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इसे योगायोग कहा जाए या सुखद संयोग कि जिस कुल में भगीरथ का जन्म हुआ वही कुल इस पुस्तक के लेखक का भी है। परंपराओं के गौरव का उल्लेख हर कोई करता है इसलिए प्रसंगवश इस तथ्य का भी उल्लेख किया गया। गंगा सदियों से काशी से सटी हुई गतिमान हैं किंतु नरेंद्र मोदी के वाराणसी का सांसद बनने के बाद जो अभिमान काशी को हुआ है वह भगीरथ प्रयास ही तो है। बनारसी साड़ी की तरह नरेंद्र मोदी काशी को नए धागे से बुनते और संवारते गए जिससे भारत देश ही नहीं बल्कि विश्व का भी ध्यानाकर्षण हुआ। बदला हुआ आकर्षक काशी पहले से बहुत अधिक लोगों को आकर्षित कर रही है। तमिल संगमम के द्वारा उत्तर भारतौर दक्षिण भारत के बीचेक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक पुल निर्मित करना नरेंद्र मोदी की ही दूरदर्शिता है।
समय कभी टूटता नहीं है बल्कि वह परिवर्तित होता है नए रंग और ढंग में और निरंतर गतिमान रहता है। इस गतिमान समय पर काशी की मूल प्रवृत्ति को बरकरार रखते हुए नई चित्रकारी कर देना नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव है। बनारस नरेंद्र मोदी को नव रचयिता के रूप में भी जानता है। एक पत्रकार घटित लगभग सभी घटनाओं का साक्षी होता है। तथ्य ही नहीं बल्कि सत्य आधारित तथ्य को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना पत्रकार का धर्म है। एक पत्रकार की दृष्टि जब समाज और उसके परिवेश में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की सफल उपलब्धियों का क्रम निर्मित करता है तब कहीं जाकर एक पत्रकार की डायरी सजती है। उल्लेखनीय है कि गंगा और शिव आधारित काशी है जिसे नरेंद्र मोदी ने संवारा है अतएव भगीरथ, शिव, गंगा, विश्वनाथ धाम, अयोध्या का राम मंदिर आदि डायरी के प्रेतक ऊर्जा हैं। आपके समक्ष इस डायरी को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता हो रही है।