नयनों में नमी है कहिए क्या कमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है
यह सोच रोज पसरती है लेकर जिंदगी
कोई न कोई उलझता इसमें पा हुड़दंगगी
सभी गुजरते हैं इससे खुशियां तो गमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है
नयनों को यदि कहें आत्मचेतना से निरखो
सपनों को यदि कहें विवेचना में न उलझो
आत्मबल यदि हो जागृत तो हौवा, आदमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है
नयन बन सघन करते नित उपवन मनन
मन छनन-छनन चाहे लिपट उपवन मगन
नयन और मन बहुभाव स्वभाव बहुरंगी हैं
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है।
धीरेन्द्र सिंह
19.06.2026
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