बानगी तो देखिए सत्य अड़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है
कुर्ता विशिष्टता का प्रतीक हो गया
गमछा संवर सिर से गले हो गया
नेतृत्व की कुर्सी में भविष्य पड़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है
शासित कहीं न दिखते सब ही शासक
शोषण वह प्रक्रिया है सब ही उपासक
लघुतम, लघु सत्ताएं परिवार पड़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है
चैनल विभिन्न की व्यावसायिक चतुराई
पत्रकारिता में सत्य को मिले निठुराई
जो देख रहा पढ़ रहा वैसा ही गढ़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है
आधे-अधूरे हैं पर पूर्णता का है दिखावा
आगे जमूरे हैं हर निपुणता में छलावा
शिक्षा है उच्चतम व्यक्ति क्या पढ़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है।
धीरेन्द्र सिंह
27.08.2026
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