मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

परछाई

दिल को इस तरह याद यूँ आपकी आयी
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

आप बहुमूल्य हैं हृदय कह रहा है निडर
श्राप किसने दिया बाधित हुई प्रेम डगर
जिंदगी तन्मय पर अचानक कैसे भरमाई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

यह टूटे प्रेम का भाव नहीं बाधित प्रवाह
सरपट प्रवाह में उभरे कई परिचित डाह
आप लड़खड़ा समझीं अभिव्यक्ति तुरपाई
चिह्यूंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

किसी जीवंत व्यक्तित्व को खुद में समेटना
मस्तिष्क समझ रहा दिल में उठ रही वेदना
आप अन्य में मशगूल कैसे चेतना को निभाई
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाई

पुरुष हूँ दम्भ सुप्तावस्था में भी लगे प्रखर
आप से पहल ना हो तो त्यजन वह डगर
यादों में जब आप आईं भूल गया ठकुराई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं।

धीरेन्द्र सिंह
29.10.2026
21.07

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

दशहरा

मर्यादा में जीवन के त्याग दिए कई धुन श्रावण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण



ज्ञान, ध्यान, उत्थान के ख्यातिप्राप्य अनुरागी
शिव को अपना सिर अर्पण करनेवाला त्यागी
ऐसे योगी की सत्ता के रुग्ण कर दिए सब चाँवड़
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण

दशहरा त्यौहार है या जीवन शैली का अभिसार
दग्ध परीक्षा तन- मन कौशल का परखे श्रृंगार
घर त्यागा, सत्ता भी, पत्नी छली गई निज प्रांगड़
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण

अब भी समाज में राम सरीखे सीता जैसी दृढ़ता
रामायण सा युद्ध निरंतर हो रही पराजित मूढ़ता
हर मन राम-सीता सा अगन-गगन रघुवंश सा प्रण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण।

धीरेन्द्र सिंह
20.10.2026
06.07


रविवार, 18 अक्टूबर 2026

दो किनारे

जैसे तैसे उड़ाते पैसे नदी धार है होता

दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता


चलन है मगन होकर गगन प्यार का रंगना
बाबू, सोना जैसे शब्द कहां सजनी व सजना
डुबकियां लगती कभी तिनके सा दिन होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता

कितनों से किया प्रेम कितने "एक्स" हैं यार
प्यार का बाजारीकरण समावेध कहां है प्यार
धड़कन की तड़पन में चाह श्रृंगार नहीं।होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता

विवाह बंधन और प्यार हो यह है बात पुरानी
प्यार बुखार है चढ़ता-उतरता तन से बेईमानी
मन विकल्प है तलाशता अवसरों को देता न्योता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता।

धीरेन्द्र सिंह
19.10.2026
05.13

यह कैसा प्रमाणपत्र ?

यह कैसा प्रमाणपत्र ?


प्रमाणपत्र

विद्यार्थियों को 

उनकी योग्यता को

प्रमाणित कर विद्यालय द्वारा

दिया जाता है

पर

कुछ हिंदी समूह भी

प्रमाणपत्र बांट रहे

ना जाने किस योग्यता से

जांच रहे;


कौन हैं 

ऐसे प्रमाणपत्र देनेवाले,

क्या मानक हैं ?

किसी को

कुछ नहीं मालूम

बस

प्रमाणपत्र बंट रहे नियमित,


यह और कुछ नहीं

समूह विशेष का

विपणन है

और समूह के 

कुछ प्रमुख का

स्व-विज्ञापन,

व्यक्ति की

श्रेष्ठता साबित करना

हिंदी जगत का

लाइलाज रोग है,


यदि इस रुग्ण प्रथा को

बंद नहीं किया जा सकता

तो वंचित रखें

मेरी रचनाओं को

प्रमाणपत्र के अनावश्यक बोझ से,

रचना वह होती हैव

जो प्रशंसा, समीक्षा, टिप्पणी की

अभिलाषी तो है पर

किसी भी स्तर के 

प्रमाणपत्र की निर्मोही है।


धीरेन्द्र सिंह

18.10.2026

19.52

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

हौसले

खुरच-खुरच कर दीवारों को नए रंग के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए



आदतें नई संवरती हैं यदि होता है प्रजातंत्र

आए दिन मुनादी होती है मिल गया नया मंत्र

एक हंगामा कई तख्तियों का प्रबंध लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए


दीवारें शक्ति हैं शौर्य है बतौर सिरमौर हैं

खुरचना प्रजातंत्र का कहें परिष्कृत तौर है

हुजूम झूमकर झंकार करे उमंग के लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए


बदल देंगे चेहरा सभी दीवार के प्रकार का

भोजन में प्रमुख वही ऐसी सोच है अचार का

नई सोच नएं मुद्दे कहां ढूंढे प्रपंच के लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए।


धीरेन्द्र सिंह
17.10.2026
03.13


गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

शस्त्र

शोषक और शोषित
इसी से जग पोषित



मानव का इतिहास
युद्ध, संघर्ष की बात
असत्य है नहीं रोपित
इसी से जग पोषित

कर्म और भाग्य लड़ें
उदाहरण हैं कई पड़े
कर्म रथ होता भूपति
इसी से जग पोषित

शस्त्र ही में शास्त्र है
शास्त्र शस्त्र क्षात्र है
शस्त्र विहीन शोषित
इसी से जग पोषित

कोई भी नहीं निहत्था
भ्रमित करते हैं जत्था
सौम्य रहें लगे रोषित
इसी से जग पोषित।

धीरेन्द्र सिंह
16.10.2026
06.09

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

हिंदी समूह

परंपरा की सीमाओं में
बंधकर जीनेवाले
जीते जाते हैं जीवन
बंधकर, अनुकरण कर
जहां एक निर्धारित
गति होती है
स्वीकार्य चलन की
सहमति होती है
जहां अविष्कार नहीं होते
परिष्कार होते हैं;

परंपराएं नहीं करतीं प्रयोग
सुयोग से जो प्राप्त
उसीका है योग
परिवर्तन करो तो
बोल पड़ेंगे लोग;

फेसबुक अधिकांश समूह
भेड़चाल चल रहे हैं
उससे मेरा बेहतर समूह
हर हाल कह रहे हैं,
दस-पन्द्रह लिखनेवाले
हर समूह में हैं लिखते
अपना बड़ा सा फोटो लगा
हर समूह यही दिखते;

समूहों की होती मंथर गति
सदस्यों की संख्या दर्शाने की रीति
प्रयोगधर्मिता को नहीं अपनाते
अपनी ताल ठोक-पीटकर
समूह को हांकते हुए चलाते।

धीरेन्द्र सिंह
14.10.2026
17.59