रविवार, 25 अक्टूबर 2026

कैसे चित्रकार हो

लेखन में यदि लय नहीं कैसे शब्दकार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

यह रचनाकार पर व्यक्तिगत नहीं आक्षेप है
हिंदी लेखन सरस आसक्तिगत हो निक्षेप है
हिंदी पाठक और बढ़ें हिंदी लेखन रसदार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

प्यार के वर्णन में क्या केवल वासना झंकार
प्यार ऊर्जा आत्मा का जीवन का है श्रृंगार
प्यार सज्जित शब्दों में जीवन भाव बहार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

प्यार में भी तर्क है दर्शन है जीवन चिंतन है
व्यक्ति त्याग कर अकेली साधना क्या मंथन है
ईश्वर जैसा भव्य दिव्य देहधारी व्यक्ति दुलार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो।

धीरेन्द्र सिंह
26.10.2026
09.24


फिर ना आई

इल्दीहा दिल दिया बिल भी तो दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

खूब बातें दिल मिल बांटे ना कुछ छांटे
हृदय क्या विलय क्या होते क्या हैं नाते
उसका काम उसका नाम भाव हल्दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

तब खिला एकबार मिला टूटा सिलसिला
प्रणय रुग्ण भाव लगा गई थी तिलमिला
कर्म अठखेलियाँ नहीं वार्ता भाव बहा दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

इल्दीहा शब्द नहीं हृदय वेदना का चिंघाड़
भावना में तैरे बिना तत्क्षण प्यार लगे पहाड़
संवेदना अशिक्षित थी मिलन बिल तक जिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया ।

धीरेन्द्र सिंह
26.10.2026
08.55

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

जीवन

कामनाएं दौड़ रहीं पर मन तो नियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

सपनों के शीर्ष पर भाव सुगंधित पड़े हैं
यथार्थ में संभव नहीं सामाजिक धड़े है 
पर प्रयास आस लिए बढ़ता अनियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

स्व को रोका है जीवन की असुविधाओं में
चाह बलवती फिर भी होती विपदाओं में
मन कहता स्वागत है हर भाव निमंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

जीवन समझ नहीं आया बस जीवन जीते हैं
विपरीत यदि कुछ होता हंस कहते रीते है 
इतना क्षद्म जीवन में राह लगे निबंधित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
21.33

चरित्र

चरित्र के चर्चे इतने इसका न कोई चित्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र



कुछ भी न रहा गोपनीय इलेक्ट्रॉनिक गति
सुख भी हो सोचनीय तात्कालिक जो मति
बहलाना-फुसलाना भ्रमित करना छिड़क इत्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

रामायण, महाभारत के मिलते हैं ऐसे पात्र
युग बांचता इन्हें पर लगे नासमझ सा छात्र
युगों से अपनों से छल सत्यता का नहीं जिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

अपने हैं जो क्रमशः बदलते हैं ढलते जाते हैं
भीतर बना दूरी करीबी भ्रम सजा भरमाते हैं
अपनापन मित्रता भी लगे भेदक लिए फिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
20.49

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

यौवन

देह दरबार है प्रपंच का अखबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है



देह सरकार ना बदले रहता यह प्रयास
दिखाते देह का साम्राज्य जिम के खास
कैसे "शो केस" देह क्या बाजार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है

स्वस्थ तन अब है गठित मांसपेशियां
निरोगी कम हैं कटाव की ले युक्तियां
स्वस्थ तनमन तो प्रसन्नता का दरबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है

दीर्घायु तक अब तो जमा रहता यौवन
रहन-सहन संयमित चयनित हैं भोजन
यौवन पर उम्र का नहीं रहता अख्तियार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
06.22

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

शब्द भाव - वडापाव

शब्द खींसे निपोर चल रहे ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे



शब्द वड़ा सा चटक होना चाहे
भाव पाव सा नरम होना चाहे
चाह चटनी की धुन रहे कैसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे

नहीं गेहूं का आटा रहता है मैदा
वड़ा में आलू, बेसन तेल कायदा
अल्पाहार सड़क किनारे शब्द ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे

शब्द की ऊष्मा सामान्य हो जाए
वडापाव गरम नहीं तो ना खा पाएं
भाषा सड़कों की लगे चिल्लर पैसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे।

धीरेन्द्र सिंह
23.10.2026
08.15

ईश्वर

प्यार की आराधना किए नहीं ईश्वरीय भक्ति में निमग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखादेखी में हैं कई मग्न



धर्म भी जलवायु अनुसार है निधारित जीवन शैली
कहीं की परम्परा मीठी लगे कहीं की लगे है कसैली
अपनी-अपनी परंपराओं के ज्ञानी-ध्यानी कई संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न

बिन भाषा शब्दार्थ समझे नित घंटों करें उसका उवाच
जीवन मनुष्य को तथ्य दर्शाता पर मानते नहीं उसे साँच
लौकिकता में भी ईश्वर परालौकिक कथ्य मिले भग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न

आधुनिकता में प्रकृति दूर भौतिकता के लिए हैं गरूर
पूजापाठ जितना अधिक उतने कष्ट जीवन के हों दूर
जीवन ईश्वर प्यार भक्ति है चाह समर्पण से व्यक्ति संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न।

धीरेन्द्र सिंह
22.10.2026
15.41