शनिवार, 15 अगस्त 2026

पोस्ट आपका

आप मुझसे हर समय गीत का वादा करें
प्रणय पाहुन सा नित रोज ही मिलता रहे
हृदय आकुल हृदय व्याकुल को ही चाहे
भावनाएं कामनाएं योजनाएं सरसता रहे






हृदय संतुलन के लिए हृदय का आकलन
संगत हृदय जहां मिला संचय चलता रहे
मांग सकता नहीं प्रणय रण का चितेरा कभी
ताक-झांक सफलता का मन में खिलता रहे

कल्पनाएं संभावनाओं की निज पटरानी है
अलग क्या कह रहा यह दिलों में ढलता है
जीवंतता जिसमें रहे उनमें ही ऐसे भाव बहें
अन्य सुप्त जीते रहते जीवंत जलते रहता है

आपका सरगम अनोखा झंकृत बिन मुखौटा
शब्द लिपटे धुन, शब्द तान लिए ढलता है
प्रणय पंखुरी पल्लवन क्रिया आप में भी है
पोस्ट आपका प्रायः इसीलिए दमकता है।

धीरेन्द्र सिंह
15.08.2026
17.11


शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता के तंत्र में यंत्रवत क्यों रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें



परतंत्र होना मनुष्य की है असमर्थता
स्वतंत्र रहे जीवन आवश्यक है सतर्कता
मनभाव जो भी हैं निर्द्वंद्व होकर कहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें

मन को मारकर भी जीना है कोई जीना
मन ऊंचा रख प्रहरी सीमा पर ताने सीना
तिरंगा में लिपटा वीर सुरक्षा सींचते रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें

निर्धारित दिशा में बहना प्रगति है उत्थान
हर देश का है आदर पर अपना देश महान
तिरंगा हमारा भाल निरंतर ऊँचा करते रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें।

धीरेन्द्र सिंह
15.08.2026
07.02


स्मृति में

स्मृति में उभरे आपके भाव टटोलता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं



यह कैसे आज आप अचानक उभर गईं
विस्तृत सुजान नभ में विद्युत सी निखर गई
आह्लाद के संवाद के भाव समेटता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं

संकल्प कभी आप थे ना था कहीं विकल्प
ना जाने कैसे होते गया परिवेश सघन तल्ख
कोशिश यही थी जीवन में एक विशेषता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं

नयनों के चमक में है स्वागत आपका आगमन
अधरों पर बसी मुस्कराहट करे आपका नमन
चेहरे पर आप ही बसी हैं इसे मैं योग्यता कहूँ
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं।

धीरेन्द्र सिंह
14.08.2026

16.19

बुधवार, 12 अगस्त 2026

व्यक्ति और समाज

भावनाएं जग रही हैं अपनी ताल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में



व्यक्ति है अकेला या घिरा है समाज से
बस द्वंद्व लगे जीवन सामाजिक अंदाज से
परवश जी रहा है घिरा सामाजिक हाल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में

कड़ियाँ की कई लड़ियाँ लगती हैं बढियां
यहां यह वहां वह संबंधों की है फुलझड़ियाँ
आतिशबाजी यदाकदा होती मन चौपाल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में

धरती पर बसा है और गगन की चाह है
रिमझिम हैं फुहारें पर अगन की आह है
आंखें समाज की जैसे तांत्रिक कपाल मैं 
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में।

धीरेन्द्र सिंह
13.08.2026
10.08

सोमवार, 10 अगस्त 2026

जिंदगी

व्यक्ति भी एक किताब का हिसाब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है

पन्ने प्रति पन्ने फड़फड़ाते पलट रहे हैं
हर पन्ने से इंसान इतराते लिपट रहे हैं
पल सजाने की कोशिश दुल्हन माहताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है

जीवन है एक डगर या लाभ-हानि का लेखा
उलझा वही जिसने ऑडिटर की तरह देखा
कर्म यात्री सा जो चला वही आफताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब।है

कुछ प्यार के पन्ने कुछ संघर्ष की है ऋचाएं
जीते जहां पर जय मिली पराजय क्यों जगाएं
प्रणय जिनका भाग्य है वह ही नवाब हैं
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है।

धीरेन्द्र सिंह
11.08.2026
06.13

रविवार, 9 अगस्त 2026

समाज

किस समाज की यह अवहेलना है
समाज से समाज को क्यों खेलना है
तख्तियों पर लिख गए हैं भाव कई
विचार से विचारों को लगे ठेलना है






धूप तपती दहकती बह रही है कहीं

चाँदनी का धर्म क्या हरदम बहकना है

व्यक्ति के लिए व्यक्ति ही है जरूरी भी

व्यक्तित्व रहे बना रंग अपना दमकना है


समाज ही साम्राज्य समाज ही विवाद

समाज की तरह जीवन को बेलना है

अवहेलना की कीमत चुकाते कई वर्ग

जो बढ़ चुके हैं आगे उन्हें क्या कहना है


तख्तियों का दौर है यही एक तौर है
बतौर शोर के यही सब तो करना है
युक्तियों की नियुक्तियों में कूटनीति है
नीति के रीति से कई भीत को ढहना है।

धीरेन्द्र सिंह
10.08.2026
09.03