गुरुवार, 2 जुलाई 2026
मंगलवार, 30 जून 2026
पथप्रदर्शक
भटक रही नव पीढ़ी नए विचारों का ले अम्बार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
सुधारना, संवारना नया प्रचलित यह कारोबार
प्रतिभा स्वयं निखरती पथप्रदर्शक कहें संवार
पिछली पीढ़ी सोचती नव पीढ़ी बुद्धू गंवार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
"मोटिवेशनल स्पीकर" उभरती चतुर प्रक्रिया
वेद-शास्त्र, धर्मग्रंथ की नए शब्दों की क्रिया
नई पीढ़ी की उन्मुक्तता को कहें लगाएं कतार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
हर बीज का अपना विकास निजी है पल्लवन
खाद-पानी-धूप मिले यथेष्ट खुला रहे उपवन
प्रतिभा होती विकसित नव चेतना की हुंकार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार।
धीरेन्द्र सिंह
02.07.2026
06.32
सोमवार, 29 जून 2026
बारिश में भींग जाएं
कई समस्या है, चिंताएं हैं, क्या चिता बनाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
भींग जाना ही होता है उस पल को जी जाना
जी जहां ना लगे वह जीवन छल है हो जाना
सामाजिक मान्यताओं अनुरूप ढलते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
जीवन की आपाधापी में बस दौड़ निरंतर दौड़
अभिलाषाओं की हो समीक्षा देखा जाए तौर
किनारे-किनारे संभलते मझधार से डरते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
रस श्रृंगार भी झेल रहा है नव मिलावट का वार
भाव-भंगिमा, अदा अठखेलियों का कहां गुबार
देह सौंदर्य पर सतत गौर करते जीवन यूँ गवाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं।
धीरेन्द्र सिंह
29.06.2026
20.30
रविवार, 28 जून 2026
मन
किसको कहां मन ढूंढ रहा सब मस्त हैं
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है
विश्लेषण की क्षमता संतुलित हो संयमित
तथ्य उभरता स्पष्ट कर्म तदनुरूप नियमित
स्व से सृष्टि तक नियम पारदर्शी समस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है
एक समूह के बल पर नवनिर्माण प्रक्रिया
समूह गठन के लिए सर्वहितकारी क्रिया
निजता के जाल में निज हानि जबरदस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है
इसे न समझें काव्य प्रवचन की नई विधा
उस पीड़ा को समझिए जिसमें मानव बींधा
घर-परिवार अस्तव्यस्त व्यक्ति बाहर मस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य मस्त है।
धीरेन्द्र सिंह
29.06.2026
08.35
शनिवार, 27 जून 2026
शुक्रवार, 26 जून 2026
अर्चना
कैसे कहें उनसे अपनी निजी अभ्यर्थना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना
हृदय के स्पंदनों को छूकर हवा से बह गए
आप भी समझे ना समझे क्या वह कह गए
सबकी अपनी-अपनी दुनिया अपनी है सर्जना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना
प्यार की जब बात कहें बोले ईश्वर से प्यार
संसार यह भ्रमजाल है मुक्ति इसका द्वार
मानवीय प्रणय खड़ा आत्म देह की गर्जना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना
सत्य है कि सर्व परमऊर्जा के अंश हैं
प्रणय कहां निषेध धर्म में यह दंश है
समर्पण परमात्मा का आत्मा की ना दर्शना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना।
धीरेन्द्र सिंह
26.06. 2026
21.51
गुरुवार, 25 जून 2026
नाते तोड़ गयी
वह मुझे छोड़ गई और नाते तोड़ गयी
यह टूटन है क्या, नहीं विश्वास होता है
जीवन है जागृत है, उसपर आश्रित है
कुछ न बोली चल दी कहीं ऐसा होता है
हृदय में हाहाकार कैसा मृदुल अत्याचार
दर्द है, दुख है पर संभावना को न्योता है
मन ने किया समर्पण दिखला दी दर्पण
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है
वह मेरी भोर थी और महकती साँझ थी
आंच जिंदगी पर चलाई तेज सरौता है
घाव है दर्द है हमदर्द मन पर नहीं रोता है
कुछ न बोली चल दी कहीं ऐसा होता है
उससा जग में कही मिलटी न कोई दूजी
सूझी क्या उसको टूटन ही मात्र मौका है
जितना मुझे सँवारी उससे न बढ़ सक कभी
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है।
धीरेन्द्र सिंह
26.06.2026
08.06
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