गुरुवार, 5 नवंबर 2026

विवेकहीन कह उठेंगे

आ गया प्रकाश पुनः करने हमें प्रकाशित
उपलब्धियां मिलेंगी कुछ को अप्रत्याशित



दीपावली हर गली रात्रि को सशक्त नकारने
नई ज्योति नई संभावनाओं को संवारने
हर अर्चना विश्वस्त पूजन से मिले आशातीत
उपलाधियाँ मिलेंगी कुछ को अप्रत्याशित

विवेकहीन कह उठेंगे पटाखों से हो प्रदूषण
उत्सव, धर्म, आध्यात्म में उभरते खरदूषण
सोची-समझी साजिश से आजिज जग रीत
उपलब्धियां मिलेंगी कुछ को अप्रत्याशित

दीपोत्सव से सज उठा है मुहल्ला, शहर
प्रसन्नता की मान्यता दीप ज्योति दे फहर
कुछ भी कहें लोग पर्व हो निर्द्वंद्व व्यतीत
उपलब्धियां मिलेंगी कुछ को अप्रत्याशित।

धीरेन्द्र सिंह
05.11.2026
19.26

बुधवार, 4 नवंबर 2026

आकर्षण

सुंदरता चमकती-दमकती भरमाती है
हृदय मोहित हो कहता वह मेरा साथी है



आकर्षण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है
आधा जीवन प्यार कल्पना में जिया है
बस जाता कोई रूप लगे मन में आंधी है
हृदय मोहित हो कहता वह मेरा साथी है

व्यक्ति अपने अनुसार प्यार को है जांचता
कोई रूप अनुरागी कोई विशेषता बांचता
बेहद करना चाहता डरता हद की मुनादी है
हृदय मोहित हो कहता वह मेरा साथी है

जुड़ जाना या जुड़ने का निरंतर करे प्रयास
आकर्षण में भटक व्यक्ति करे प्रेम की तलाश
भावनाओं की निज होली रंगने का मन आदी है
हृदय मोहित हो कहता वह मेरा साथी है।

धीरेन्द्र सिंह
05.11.2026
05.57

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

भाग्य

जीवन सरल है सब अपनी-अपनी राहों में
क्या कुछ नहीं मिलता भाग्य की बाहों में 



कर्म व्यस्त रखने का एक सुंदर छलावा है
शोषकों का तय यह शब्द छद्म बुलावा है
सच मान लिए सब जो लिखा किताबों में
क्या कुछ नहीं मिलता भाग्य की बाहों में

जीवन सरल हैं पर कुछ के लिए गरल है
जो भाग्य रचाते उनके कुकर्म धवल हैं
जीवन अनेक रूप है विभिन्न निगाहों में
क्या कुछ नहीं मिलता भाग्य की बाहों में

संयुक्त कर्म एकलाक्षीय है भाग्य निर्माता
ज्ञात हो रहा है सामूहिकता भाग्य विधाता
अकेले कर्म से व्यक्ति शोषक पनाहों में
क्या कुछ नहीं मिलता भाग्य की बाहों में।

धीरेन्द्र सिंह
04.11.2026
07.54

सोमवार, 2 नवंबर 2026

जानी-जानी

"इस घड़े से लोटा निकाल के"
यह भाव है कितने सवाल के



कई वीडियो में यही बसे बानी
"जानी-जानी पिला दे पानी"
शराब लुप्त घड़ा बवाल के
यह भाव है कितने सवाल के

संगीत शक्ति से शब्द खिलते
गायन बुद्धि से भाव मचलते
द्विअर्थी लेखन विरोध बवाल के
यह भाव है कितने सवाल के

भोजपुरी लेखन का है प्रभाव
टपोरी लेखन का वीडियो निभाव
सब ज़मझें साहित्य रुग्ण हाल के
यह भाव है कितने सवाल के।

धीरेन्द्र सिंह
03.11.2026
11.00

भोर

दृष्टि चाहिए वृष्टि प्यार की चहुंओर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर



अमावस सी रात व्यक्ति सोच आधारित
पूर्णिमा की आँच शक्ति ओज आपूरित
सब यहीं सबका यहीं पर ओर छोर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर

चुनौतियों कठिनाईयों से होता घायल
विपरीत हवाओं का होता वही कायल
आत्मबल से दबाता जाता जीवन शोर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर

ईश्वरीय अंश जीव ईश्वर को खोजता
मानव अमूल्य जन्म परम्परा से नोचता
फल की कामना ना देखे टहनियों के बौर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर।

धीरेन्द्र सिंह
03.11.2026
04.42

रविवार, 1 नवंबर 2026

चलो न

चलो न प्रकृति द्वार मिल श्रृंगार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

एकल नहीं कुछ संभव द्वय का दरकार
युग्म ही जीवन सुगंधमय हो हर द्वार
रंगबिरंगे भावनाओं में चमत्कार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

एक ढर्रे पर जीवन जीने के अभ्यस्त
प्रतिदिन वही कार्य कहते सब हैं व्यस्त
निर्धारित राहों का मिल परिष्कार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

अनेक पक्ष अमावस्या के प्रभाव से ग्रसित
सुख-सुविधा सभी पर आत्मा कहीं ग्रसित
शुद्ध आत्मा तक पहुंचकर अभिसार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे।

धीरेन्द्र सिंह
02.11.2026
05.03

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

मानवता

प्रदर्शन है दर्शन है इसी में ठेलमठेल है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है



मानवता अति विशिष्ट मानव उपयोगी चीज
नैतिकता गति परिशिष्ट समाज में दिखे खीज
आदर्श और सिद्धांत चर्चा के प्रचलित भेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है

मुट्ठीभर लोग हैं जीवन उत्थान के प्रयास में
शेष व्यस्त हैं उभरती विभिन्न अपनी प्यास में
खरीद लो मानवता का हर समय का "सेल" है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है

नई पीढ़ी रहा सीख सजग भौतिक सुख मूल्य
धर्म-कर्म भी हैं दिखते परलोक भाव अमूल्य
मनुष्यता में भी लगे मनुष्य वर्गीकृत बेमेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है।

धीरेन्द्र सिंह
01.11.2026
06.22