मंगलवार, 14 जुलाई 2026

धड़कन-धड़कन

कहीं न कहीं तो बंधना मन के लिए जरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

पग भी चले थे राह में कंकड़ियों से नित उलझते
कई लक्ष्य गए गुजर कथ्य जीवन के भी समझते
सबकुछ बसा है दिल में उदासी तो कभी मगरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

जीवन के कटोरे में भर-भर के मिले है दूध-भात
कटोरे को है रहता भरता कोई तो हितैषी अज्ञात
हर सांस जो चले साथ कोई रिश्ता हो, ना धूरी है
सांसो का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

बंधता है मन जहां वही लगता सुखकर ठाँव है
यदि देखें गहनता से तो मन भी तन का निभाव है
हर तड़पन एक यात्रा, लगती पूरी कभी अधूरी है
सांसो का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है।

धीरेन्द्र सिंह
15.07.2026
08.40


सोमवार, 13 जुलाई 2026

बस प्यार

आपकी परिभाषा कुछ हो पर प्यार है बस प्यार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार




वासना से लेकर प्यार जापना का ही चलन है
जिसका जैसा परिवेश वैसा प्यार का नमन है
युक्तियां सारी आजमाइए अभ्युक्तियाँ दे प्यार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय  सुधि पतवार

हर हृदय में हार सुगंधित भावनाओं के पुष्प
किसको पहनाता, रिझाता बात तो यह गुप्त
चेतना में प्यार मुखर तो हावभाव में झंकार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार

आपकी परिभाषा में जुड़ गई मन की आशा
मन से मन को जोड़कर पूर्ण करें हम जिज्ञासा
मैं तो स्पष्ट लिख चुका कहिए क्या है इकरार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार।

धीरेन्द्र सिंह
14.07.2026
07.51

रविवार, 12 जुलाई 2026

सेवानिवृत्ति

अपने घर में सबसे बड़ा होना तो सम्मान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है

संपन्नता की ध्वजा व्यवस्थित विधिवत सजा                      फुरसत की टोपी पहने कहें जिंदगी दे मजा                        जीवन कहे राग, द्वेष, विषाद का बहे तूफान है                      सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है                     


                        

 





लोग घर में ही हैं घर डगर सा लग रहा है                          नजर कई हैं दौड़ती सबर वहां थक रहा है
आ रहे हैं जा रहे हैं बदला घर का विज्ञान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
                      
खट से कप रख चले जैसे कार्यालय परिवेश है
बोलते बढ़ चले जैसे कार्यपालकीय आदेश है
भौतिक सुविधाएं सभी न मिलती अपनों की तान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है।

धीरेन्द्र सिंह
12.07.2026
19.37

शनिवार, 11 जुलाई 2026

बात लग गई

बातों बातों में न कैसे बोल थाप लग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई




न भाव नियंत्रण ना शब्द नियंत्रण के क्षण
तर्क-कुतर्क से जीत जाने का अबोला प्रण
कड़वाहट भरे आक्रमण की यूँ छाप जग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई

अहं के अलाव में वहम की विभिन्न चिंगारियां
दहन के निभाव में दोहन की कलाबाजियां
चिंगारियों की उछल कूद दुश्वारियां ठग गईं
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई

बौद्धिकता का तराजू कहीं लोकप्रियता कांटा
तोल-मोल, तौल-हौल भांति-भांति सा बांटा
कटाक्ष,व्यंग्य, चुटकियों संग खटास रंग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई।

धीरेन्द्र सिंह
11.07.2026
19.45




शनिवार, 4 जुलाई 2026

बारिश नीति

 बारिश के फुहारों सी है आपकी अनुभूति
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति



कल्पनाओं में सजती हैं प्रीति की कामनाएं
आकर्षण से रचती हैं रीति की भावनाएं
बात जब अभिव्यक्ति की हो संकोच प्रतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति







हृदय आत्म से जो ना संबंधित, वह मुखर हैं
कुछ भी कभी भी बोल दे, वह रहगुजर है
धड़कन, तड़पन ऐसे लोगों के लिए अतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति







बरस रही है झूम आपकी सभी सुंदरता
क्यों हो रही हिचक दिल में पर आतुरता
कैसे लोग कर लेते कईयों से प्रणय प्रीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति।







धीरेन्द्र सिंह
05.07.2026
11.16

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

उपवन मौन है

डंठलों को पूछता कौन है
उपवन यहां पर भी मौन है



पुष्प का अपार भार है संभाले
कंटकों की धार को भी सँवारे
सुगंध चहुँओर तरंग आध पौन है
उपवन यहां पर भी मौन है







बागबानी में डंठलों को दाना-पानी
पुष्प और कंटक की है जिंदगानी
कैंची कटा पुष्पडंठल सम्मान छौन है
उपवन यहां पर भी मौन है







है न कराहता ना उन्माद दहाड़ता
मौसमी प्रहार को मौन पछाड़ता
डंठल अनदेखे से सपनों का गौन है
उपवन यहां पर भी मौन है।







धीरेन्द्र सिंह
04.07.2026
07.57

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

एडमिन-मॉडरेटर

हिंदी के कई समूह लिए कई चक्रव्यूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह



समूह सदस्य संख्या अधिक पोस्ट कम
टिप्पणियां गिनी-चुनी लाइक भी बेदम
समूह संचालन अति कठिन चिंतित रह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह







नया चलन शुरू हुआ सदस्यों को रिझाना
पोस्ट ऐसी हो जिसे पढ़ कामना उभर जाना
यह श्रम है समर्पण है चमकाना समूह मुहँ
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह







कॉपी पेस्ट पर हैं जीवित कई हिंदी समूह
मौलिकता कहां से लाएं सदस्य सुप्त ऊंघ
कितनी करूँ प्रशंसा आसान कार्य नहीं समूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह।







धीरेन्द्र सिंह
03.07.2026
07.22
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