मन मोह के दर्पण का अनुरागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है
अकुलाहट भरी अभिव्यक्तियों की भीड़
कुलबुलाहट धरी आसक्तियाँ का नीड़
कर्म के नियुक्तियों में बड़भागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है
कब चल पड़े अनचीन्ही डगर बौराया
चाहत का चादर में लिए मोहमाया
हर कदम मन का लगे बागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है
मन घूमता है जैसे घूमते हैं ग्रह, नक्षत्र
मन ढूंढिए मिल जाता है भटकते सर्वत्र
मन भी तो चाँद सा निर्मल दागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है।
धीरेन्द्र सिंह
03.10.2026
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