मंगलवार, 25 अगस्त 2026

दृष्टि

कामना की याचना है और सृष्टि है
सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है



आप अपनी उलझनों के हैं पहरेदार

दूसरा अपनी समस्याओं का तारणहार

भावनाओं की सतत विभिन्न वृष्टि है

सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है


मोहक, सम्मोहक संवेदक विभेदक

चेतना के चपल चाह विज्ञ सचेतक

अभिलाषाएं पलक पर चंद्र समिष्ट है 

सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है


पढ़ना सब वस्तुतः असम्भव ही है

क्या सोचना बुरा यदि पराभव भी है
कर्मों का यह एक स्पष्ट प्रविष्टि है
सब पढ़ लिए हैं क्या ऐसी दृष्टि है।

धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
23.35

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रिश्ते

कुछ छूट गया खुद से कुछ छूट रहा है
जोड़ने को जीवन कोशिश में टूट रहा है
एक व्यक्ति नहीं व्यक्ति रिश्तों का झुंड है
छूटता हृदय नयन से अपनत्व ढूंढ रहा है






कमियां तो सब में है नर्मियों की है जरूरत
शब्दों में नमी जोर हो निभाव घुट रहा है
अहं के शंख से युद्ध की ही निकले ललकार
तर्कों से कब चला जीवन लगे उठ रहा है

मनभाव में अलाव प्रतियोगिता तो जलन भी
श्रेष्ठता की अंधी दौड़ में यथार्थ ऊंघ रहा है
शिक्षा की डिग्रियां जितनी ऊंचा तो उठे व्यक्ति
स्वार्थ की परिधि में घिरा गड़ा खूँट रहा है

कौन गलत कौन सही समझना नहीं आसान
दो में से एक सुविज्ञ जो मौन ठूंठ रहा है
सहने की हो क्षमता तो जीवन सौम्य, सुंदर है
लड़ने की गति में रिश्ता जीवन लूट रहा है।

धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
06.51



रविवार, 23 अगस्त 2026

गीत

गीत ही है जिंदगी गीत ही आधार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है



हौसले के फैसले चुनौतियों के वलबले
मीत के गीत उपलब्धियों के सिलसिले
प्रीति की प्रतीति ही बिहँसता संसार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है

मन स्पंदित श्वास सुगंधित परिवेश तरंगित
अर्चना की सर्जना में विलगाव है प्रतिबंधित
तार मन के जुड़ गए तो स्वर नए उपहार हैं
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है

कामनाएं घास सी उगती हैं मरती हर दिन
क्या बताएं चाह सजती हैं बिखरती छिन-छिन
एक तृष्णा एक बेचैनी गुप्त निज मनधार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है।

धीरेन्द्र सिंह
24.08.2026
07.57

शनिवार, 22 अगस्त 2026

सईयां

सईयां सात जनम नही धाए संग एहि जनम भाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए



सकल समाज हेरि लिए शक्ल नहीं दिखा पाए
हिया जिया संग पिया-पिया बोले क्यों ऐसा तरसाए
एक दरस की अरज है मेरी जन्मों में क्यों बहलाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए

चाहत की नई आहट थी नयन भरी जगमगाहट थी
रचि सुगन्ध परिवेश शुचि अकुलाहट मोह बुलाए
आप गरज को मरज ही समझे कितनी देर लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए

पल-पल कल-कल बहता हरदम मिलती नहीं फुहार
छल-छल ढल-ढल रहता संगम लौ भी लपक ना पाए
आज ही जीवन की दुनिया कल पर क्यों आंख लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीँ जी पाए।

धीरेन्द्र सिंह
23.08.2026
10.23

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

प्यार

मन का संतोष है भाव विशेष है निज झंकार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार



प्यार के कई विशेषण युगों से हो रहा विश्लेषण
हर रूप में प्यार जरूरी प्यार आवश्यक पोषण
प्यार समर्पण प्यार प्रदाता प्यार नहीं अधिकार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार

शिशु की निर्मल मुस्काहट बच्चों की शरारती आहट
किशोरावस्था की अनंत पेंगे युवावस्था की चाहत
हर उम्र में भाव प्यार के झूमे भव्य दिव्य उपहार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार

कभी पांव पाजेब पहन छम-छम ध्वनि सुनाए
कभी पलक उठते हुए दृग विद्युत ही बरसाए
कभी शब्दभरी फुलवारी में लहर सुगंध फुहार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार।

धीरेन्द्र सिंह
21.08.2026
18.08

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

अपने

तिलमिलाती जिंदगी संवरने को अति व्यग्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र



खींचतान में ढूंढें सब अपना ही आसमान
विश्वास लिए ऐसा जैसे हो मुक्त प्रावधान
प्यार अजेय ऊर्जा संग हो जाते हैं अभद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र

अपनों के समूह में रचते अपने चक्रव्यूह
सपनों के समूह में अपने जाते अक्सर दूह
अपनापन डरा रहा मुस्कराहट छिपे भद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र

जीवन प्रतियोगिता भरी साथ में है दृढ़ अहं
मैं बड़ा हूँ, श्रेष्ठ हूँ मैं जीवन में कहीं ना दोयम
थोथा चना बाजे घना सा सब ओर चाहें कद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र।

धीरेन्द्र सिंह
20.08.2026
21.11




बुधवार, 19 अगस्त 2026

जागना है

हर व्यक्ति की आराधना है साधना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है



एक लौ लपकती झपकती पूर्वार्ध है
एक भोर उभरती संवरती उत्तरार्ध है
आत्मचिंतन जो कहे वही जापना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है

तत्व के घनत्व में मर्म का निनाद है
शोर बहुत बाहर विवादित संवाद है
स्व की संगीत पर स्व को नाचना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है

जागना यह चित्त का अस्तित्व का भी
संवरना हर कर्म निज व्यक्तित्व का भी
मृदंग संग विहंग बन गगन छानना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है।

धीरेन्द्र सिंह
20.08.2026
07.42