शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

हौसले

खुरच-खुरच कर दीवारों को नए रंग के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए



आदतें नई संवरती हैं यदि होता है प्रजातंत्र

आए दिन मुनादी होती है मिल गया नया मंत्र

एक हंगामा कई तख्तियों का प्रबंध लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए


दीवारें शक्ति हैं शौर्य है बतौर सिरमौर हैं

खुरचना प्रजातंत्र का कहें परिष्कृत तौर है

हुजूम झूमकर झंकार करे उमंग के लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए


बदल देंगे चेहरा सभी दीवार के प्रकार का

भोजन में प्रमुख वही ऐसी सोच है अचार का

नई सोच नएं मुद्दे कहां ढूंढे प्रपंच के लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए।


धीरेन्द्र सिंह
17.10.2026
03.13


गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

शस्त्र

शोषक और शोषित
इसी से जग पोषित



मानव का इतिहास
युद्ध, संघर्ष की बात
असत्य है नहीं रोपित
इसी से जग पोषित

कर्म और भाग्य लड़ें
उदाहरण हैं कई पड़े
कर्म रथ होता भूपति
इसी से जग पोषित

शस्त्र ही में शास्त्र है
शास्त्र शस्त्र क्षात्र है
शस्त्र विहीन शोषित
इसी से जग पोषित

कोई भी नहीं निहत्था
भ्रमित करते हैं जत्था
सौम्य रहें लगे रोषित
इसी से जग पोषित।

धीरेन्द्र सिंह
16.10.2026
06.09

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

हिंदी समूह

परंपरा की सीमाओं में
बंधकर जीनेवाले
जीते जाते हैं जीवन
बंधकर, अनुकरण कर
जहां एक निर्धारित
गति होती है
स्वीकार्य चलन की
सहमति होती है
जहां अविष्कार नहीं होते
परिष्कार होते हैं;

परंपराएं नहीं करतीं प्रयोग
सुयोग से जो प्राप्त
उसीका है योग
परिवर्तन करो तो
बोल पड़ेंगे लोग;

फेसबुक अधिकांश समूह
भेड़चाल चल रहे हैं
उससे मेरा बेहतर समूह
हर हाल कह रहे हैं,
दस-पन्द्रह लिखनेवाले
हर समूह में हैं लिखते
अपना बड़ा सा फोटो लगा
हर समूह यही दिखते;

समूहों की होती मंथर गति
सदस्यों की संख्या दर्शाने की रीति
प्रयोगधर्मिता को नहीं अपनाते
अपनी ताल ठोक-पीटकर
समूह को हांकते हुए चलाते।

धीरेन्द्र सिंह
14.10.2026
17.59



मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

भाषा

 असहमति

अस्वीकरण नहीं होती

और सहमति

स्वीकार्यता नहीं होती

फिर इन शब्दों का

महत्व क्या

जब शब्द की मूल अभिव्यक्ति

ही बाधित हो;


शब्द अनेक हैं जो

अपने मूल अर्थ खो रहे

प्रयोगकर्ता

खिचड़ी भाषा संग सो रहे,

कौन शब्दों की खेत में

भाव की फसलों का

करेगा रखवाली ,

सब भाषा क्षेत्र में

हो रहे सुविधाभोगी;


कसमसाती भावनाओं को

उफनते शब्दों के द्वारा

कह देने की आदत,

मिश्रित शब्द अर्थ को

दे रही है जन्म,

खिचड़ी भाषा का चलन है

बोलचाल में ऐसे है

जैसे तूफानी नदी;


भाषाएं टूट रही हैं

शब्द दरक रहे हैं

अभिव्यक्तियां रुग्ण हो रहीं

और प्रयोगकर्ता

इन सबसे अनभिज्ञ

खिचड़ी भाषा में

भविष्य तलाश रहे हैं।


धीरेन्द्र सिंह

14.10.2026

07.17

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

गांव में

घने वृक्ष संग सघन पत्तियों की छांव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में



शाम छह बजे अंधियारे का होता साम्राज्य
गतिविधियां धीमी होतीं फिर सन्नाटा विराज्य
युवा विस्थापित हो रहे मुद्रा अर्जन भाव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में

अर्धरात्रि बीते खुल जाती पलकें अलसायी
घड़ी बोलती डेढ़ बजे हैं नींद क्यों उकताई
कितने करवट कितने सिलवट निद्रा निभाव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में 

बिजली का उजियारा है सुप्त परिवेश सारा है
दिन भी खाली-खाली अति मंथर पांव पसारा है
खेत-खलिहान बिक रहे हैं खरीददार उसी ठाँव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में।

धीरेन्द्र सिंह
13.10.2026
04.05

वह पल

आप इतनी मौन हैं कि कई वर्ष पिघल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए



अनियंत्रित हुआ था कौन दोनों नहीं जानते
एक-दूजे पर आरोपों की बंदूक हैं तानते
मति भ्रष्ट थी या की बहकावे में बहल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए

तीसरे नेत्र की ज्वाला का ज्वलंत प्रमाण हैं
बिन बोले एक शब्द अभिव्यक्तिय बाण हैं
एक चुप हजार चुप होकर रंगत बदल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए

आकंठ तक आपका ही कंठ था मुखरित
आलंबन मध्य साथ का ढंग था विसरित
विश्वास है इस दौर में आप अति धवल भए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए।

धीरेन्द्र सिंह
12.10.2026
14.23

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

घायल

लकड़ी के चूल्हे पर बुदबुदाता चावल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल



लकड़ियां कम हैं पर अग्नि लपक जारी

बर्तन को छू ले भोजन पकने की तैयारी

चीख रहा और लकड़ी चिल्ला रहा अटल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल

हर समय का इसका सधा एक चलन है
हो-हल्ला, हंगामे का इसका भी सदन है
थोड़ी अव्यवस्था से चाहे बनें इसके कायल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल

ना तन से ना मन से कहीं पर भी घायल
चावल को गला कर विजय की है पहल
आवाज जोर से आकर्षित जो रहे टहल
भोजन को भांप रहा कब से घायल।

धीरेन्द्र सिंह
13.10.2026
07.54