प्रदर्शन है दर्शन है इसी में ठेलमठेल है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है
मानवता अति विशिष्ट मानव उपयोगी चीज
नैतिकता गति परिशिष्ट समाज में दिखे खीज
आदर्श और सिद्धांत चर्चा के प्रचलित भेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है
मुट्ठीभर लोग हैं जीवन उत्थान के प्रयास में
शेष व्यस्त हैं उभरती विभिन्न अपनी प्यास में
खरीद लो मानवता का हर समय का "सेल" है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है
नई पीढ़ी रहा सीख सजग भौतिक सुख मूल्य
धर्म-कर्म भी हैं दिखते परलोक भाव अमूल्य
मनुष्यता में भी लगे मनुष्य वर्गीकृत बेमेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है।
धीरेन्द्र सिंह
01.11.2026
06.22