जीवन और समाज के प्रति होती सबकी देयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता
संस्कार के संसार में सुघड़ बनने का निज प्रकार
मन चाहे जिसको देना, दे जाता है जीवन आधार
नहीं वह सोचता कर्म लाभ दे स्वार्थ की उपादेयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता
आधार किसी को तो कोई होता है परम निराधार
रचा देना सजा देना ही होता है आकर्षक श्रृंगार
कर्म की कर्मठता से समाज बनता देख योग्यता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता
इस भाव में उलझन कहां निर्मल मन से तो सोचिए
एक नहीं कई देवता मिले होंगे भूले हैं तो खोजिए
कह दूं आप देवी-देवता क्या इसमें भी कोई शक्यता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता।
धीरेन्द्र सिंह
27.10.2026
10.05