तट पर बैठे सोचें क्या, बढ़िए नाव की ओर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर
कितना और निरखना मनवा जग की झांकी
अपने भीतर पैठ गए तो झलकी मिलती सांची
चलिए ढुकिए नीरवता में नहीं इतना बाधक शोर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर
राजनीति यदि गांव में उसमें क्यों ही उलझना
मिल बैठ ना मिलिए संग रह चर्चा में आलोचना
शांत अबाधित परिवेश ऐसा न मिले ठौर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर
पुरखे यही बसे हैं उनका है बरसता आशीष
कुलदेवी की निगरानी में मिल जाते जगदीश
अपनी भाषा अपनी संस्कृति व्यक्ति का सिरमौर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर।
धीरेन्द्र सिंह
17.09.2026
09.42