हर व्यक्ति की आराधना है साधना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है
एक लौ लपकती झपकती पूर्वार्ध है
एक भोर उभरती संवरती उत्तरार्ध है
आत्मचिंतन जो कहे वही जापना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है
तत्व के घनत्व में मर्म का निनाद है
शोर बहुत बाहर विवादित संवाद है
स्व की संगीत पर स्व को नाचना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है
जागना यह चित्त का अस्तित्व का भी
संवरना हर कर्म निज व्यक्तित्व का भी
मृदंग संग विहंग बन गगन छानना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है।
धीरेन्द्र सिंह
20.08.2026
07.42




