रविवार, 12 जुलाई 2026
सेवानिवृत्ति
अपने घर में सबसे बड़ा होना तो सम्मान है
लोग घर में ही हैं घर डगर सा लग रहा है नजर कई हैं दौड़ती सबर वहां थक रहा है
आ रहे हैं जा रहे हैं बदला घर का विज्ञान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
खट से कप रख चले जैसे कार्यालय परिवेश है
बोलते बढ़ चले जैसे कार्यपालकीय आदेश है
भौतिक सुविधाएं सभी न मिलती अपनों की तान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है।
धीरेन्द्र सिंह
12.07.2026
19.37
शनिवार, 11 जुलाई 2026
बात लग गई
बातों बातों में न कैसे बोल थाप लग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई
न भाव नियंत्रण ना शब्द नियंत्रण के क्षण
तर्क-कुतर्क से जीत जाने का अबोला प्रण
कड़वाहट भरे आक्रमण की यूँ छाप जग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई
अहं के अलाव में वहम की विभिन्न चिंगारियां
दहन के निभाव में दोहन की कलाबाजियां
चिंगारियों की उछल कूद दुश्वारियां ठग गईं
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई
बौद्धिकता का तराजू कहीं लोकप्रियता कांटा
तोल-मोल, तौल-हौल भांति-भांति सा बांटा
कटाक्ष,व्यंग्य, चुटकियों संग खटास रंग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई।
धीरेन्द्र सिंह
11.07.2026
19.45
शनिवार, 4 जुलाई 2026
बारिश नीति
बारिश के फुहारों सी है आपकी अनुभूति
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
कल्पनाओं में सजती हैं प्रीति की कामनाएं
आकर्षण से रचती हैं रीति की भावनाएं
बात जब अभिव्यक्ति की हो संकोच प्रतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
हृदय आत्म से जो ना संबंधित, वह मुखर हैं
कुछ भी कभी भी बोल दे, वह रहगुजर है
धड़कन, तड़पन ऐसे लोगों के लिए अतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
बरस रही है झूम आपकी सभी सुंदरता
क्यों हो रही हिचक दिल में पर आतुरता
कैसे लोग कर लेते कईयों से प्रणय प्रीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति।
धीरेन्द्र सिंह
05.07.2026
11.16
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
उपवन मौन है
डंठलों को पूछता कौन है
उपवन यहां पर भी मौन है
पुष्प का अपार भार है संभाले
कंटकों की धार को भी सँवारे
सुगंध चहुँओर तरंग आध पौन है
उपवन यहां पर भी मौन है
बागबानी में डंठलों को दाना-पानी
पुष्प और कंटक की है जिंदगानी
कैंची कटा पुष्पडंठल सम्मान छौन है
उपवन यहां पर भी मौन है
है न कराहता ना उन्माद दहाड़ता
मौसमी प्रहार को मौन पछाड़ता
डंठल अनदेखे से सपनों का गौन है
उपवन यहां पर भी मौन है।
धीरेन्द्र सिंह
04.07.2026
07.57
गुरुवार, 2 जुलाई 2026
एडमिन-मॉडरेटर
हिंदी के कई समूह लिए कई चक्रव्यूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह
समूह सदस्य संख्या अधिक पोस्ट कम
टिप्पणियां गिनी-चुनी लाइक भी बेदम
समूह संचालन अति कठिन चिंतित रह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह
नया चलन शुरू हुआ सदस्यों को रिझाना
पोस्ट ऐसी हो जिसे पढ़ कामना उभर जाना
यह श्रम है समर्पण है चमकाना समूह मुहँ
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह
कॉपी पेस्ट पर हैं जीवित कई हिंदी समूह
मौलिकता कहां से लाएं सदस्य सुप्त ऊंघ
कितनी करूँ प्रशंसा आसान कार्य नहीं समूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह।
धीरेन्द्र सिंह
03.07.2026
07.22
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मंगलवार, 30 जून 2026
पथप्रदर्शक
भटक रही नव पीढ़ी नए विचारों का ले अम्बार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
सुधारना, संवारना नया प्रचलित यह कारोबार
प्रतिभा स्वयं निखरती पथप्रदर्शक कहें संवार
पिछली पीढ़ी सोचती नव पीढ़ी बुद्धू गंवार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
"मोटिवेशनल स्पीकर" उभरती चतुर प्रक्रिया
वेद-शास्त्र, धर्मग्रंथ की नए शब्दों की क्रिया
नई पीढ़ी की उन्मुक्तता को कहें लगाएं कतार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
हर बीज का अपना विकास निजी है पल्लवन
खाद-पानी-धूप मिले यथेष्ट खुला रहे उपवन
प्रतिभा होती विकसित नव चेतना की हुंकार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार।
धीरेन्द्र सिंह
02.07.2026
06.32
सोमवार, 29 जून 2026
बारिश में भींग जाएं
कई समस्या है, चिंताएं हैं, क्या चिता बनाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
भींग जाना ही होता है उस पल को जी जाना
जी जहां ना लगे वह जीवन छल है हो जाना
सामाजिक मान्यताओं अनुरूप ढलते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
जीवन की आपाधापी में बस दौड़ निरंतर दौड़
अभिलाषाओं की हो समीक्षा देखा जाए तौर
किनारे-किनारे संभलते मझधार से डरते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
रस श्रृंगार भी झेल रहा है नव मिलावट का वार
भाव-भंगिमा, अदा अठखेलियों का कहां गुबार
देह सौंदर्य पर सतत गौर करते जीवन यूँ गवाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं।
धीरेन्द्र सिंह
29.06.2026
20.30
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