सृजन की वेदना कब समसीतोष्ण है
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं
उकेरी भावनाओं में मौलिकता नही मिलती
संकरी कामनाएं हो तो भौतिकता कहीं मिलती
जीवन है प्रवाह जहां सब लगते तृष्ण हैं
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं
जन्म से किए अनुभव संघर्ष और वेदना
कुछ जिए कुछ जताए जिंदगी की चेतना
जैसे देखें हैं दिखते क्या बहुरूपिया मृण हैं
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं
आराधना संग साधना की कामना है जरूरी
भक्ति उद्भव स्वयं का नहीं कभी मजबूरी
भवसागर में बहता हर जीव मात्र तृण है
मानव जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं।
धीरेन्द्र सिंह
04.09.2026
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