गुरुवार, 30 जुलाई 2026

गठरी

अपनी उमर अपनी गठरी दौड़ रही अपनी पटरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी



मंडरा रहे घनेरे बादल तोड़ने को उष्माभरी सांखल
अपने श्रम से जोड़ रहा व्यक्ति जीवन सुरभि प्रांजल
बूंदों में एक नई उमंग अर्पित करती घर्षण की बिजुरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी

अभिलाषाओं के पवन झकोरे चाँदनी दहके भोरे
कब सपनों में चाह उठेगी होंगे जो चाहें सब पूरे
आकाश मुस्काता कहता व्योम भरो निजी अंजुरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी

उमर की अपनी गति है काया कहती क्यों दुर्गति है
पटरी उबड़-खाबड़ मिलती, लक्ष्य-दौड़ में सहमति है
दौड़ बादलों का नभ में गीत सावन संग बजे खंजड़ी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी।

धीरेन्द्र सिंह
31.07.2026
08.08



मंगलवार, 28 जुलाई 2026

कहाँ हो

तुम मुझसे ख़फ़ा होकर दगा दे गई
मंज़िल का ना पता क्या सदा दे गई

गूंज है अनुगूंज है दूरस्थ की सूझ है
पुंज भावनाओं का परिणाम अबूझ है
नाराजगी भी ऐसी कैसी अदा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

पलकों में नमी है तुम्हारी ही कमी है
अलकों में सितारों की महफ़िल जमी है
अनुभूतियां आसक्ति की वफ़ा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

कुछ कहती कुछ सताती हैं यह सदाएं
तुम कहाँ हो कैसे दिल का हाल बताएं
जीवन के राग बीच धुन धता दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई।

धीरेन्द्र सिंह
29.07.2026
06.49

आज

तथ्य कह रहा है कि सत्य नाराज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है



सच में बदल रहा या हवा का है बदलाव
टहनियों को रहे काट दौड़-भाग रहा छांव
परिवर्तन की लहर है या परितृप्त साज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

कितना जटिल है जो है को बदल देना
फट जाता कहीं दूध बना लेते हैं छेना
युक्तियों की सूक्तियाँ भी लाजवाब हैं
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

सघन को सहन का वहन करना ही होगा
दहन की तपन में यूँ ना कहीं जलना होगा
समझिए न मनुष्य का प्रखर कितना ताप है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
21.15

अस्तित्व

कुछ गीत गुनगुनाइए प्रतीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो



जीवंतता केवल श्वासों का नहीं सरगम
सुगंधता कर्मों का श्वास मिश्रण रहे हरदम
एक धुन, एक लय का मोहक मीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो

हर क्षेत्र के यहां हैं विभिन्न उन्नत धुरंधर
हर नेत्र में बसा है नए लक्ष्य का समुंदर
कुछ करना ऐसा समाज की नई रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो

सहजता से कहीं रहना अकर्मण्यता लगे
पलकें खुलीं हों जिसकी क्या हैं वह जगे
आकर्षक हो, अनूठा हो जगी प्रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
13.33

रविवार, 26 जुलाई 2026

जेन-जी और भाषा

जेन-जी हुजूम जंतर-मंतर परिवर्तनीय ले जिज्ञासा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा



प्रजातंत्र में विरोध भी तो है एक मौलिक अधिकार
पर भाषा में शब्द चयन बतलाते हैं व्यक्ति संस्कार
असामाजिक असभ्य शब्द से क्या टूटती निराशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा

वस्त्र की आजादी है अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता
जेन-जी आप न भूलिए आप भारत देश के नियंता
आप पर निर्भर देश है आप ही हैं सबकी नव आशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा

संयोजन, आयोजन में जेन-जी है अति तेज प्रखर
पर यह क्या लक्ष्य प्राप्ति हेतु अशोभनीय शब्द डगर
भाषा से झुक गयी आशा जेन-जी क्यों की तमाशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा।

धीरेन्द्र सिंह
27.07.2026
08.28

शनिवार, 25 जुलाई 2026

त्रिभुजी पत्रकार

त्रिभुज का अपना विशेष महत्व है जो दर्शाता है कि जिस को से भी देखी जाए उर्ध्वगामी ही दिखती है। पत्रकार यदि त्रिभुजी रूप में कार्यरत रहते हैं तो वह सामाजिक चेतना को विभिन्न आयाम देते हैं जिससे समाज यथोचित प्रगति, सहमति और प्रदर्शन कर पाता है। त्रिभुज का एक दूसरा रूप भी है जिसमें पंख पसारे व्योम को चूमने या लक्ष्य को भेदने की अभिलाषा नजर आती है। डॉ अरविंद सिंह को मैंने हमेशा त्रिभुजी के रूप में ही पाया है। त्रिभुजी पत्रकार के प्रमुख तीन अंग होते हैं सत्य के संग, सामान्य जनता की ओर तथा नएपन की उपलब्ध संसाधनों में पहचान। 

त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह अपने पत्रकारिता जीवन में सत्य का साथ पकड़कर समय-समय पर सत्य का साथ दिया। पत्रकारिता में सत्य को दस्तावेजी रूप देने के लिए इन्होंने "सामयिक ब्लिट्ज" नामक साप्ताहिकी का प्रकाशन वाराणसी से आरम्भ किया। यहां त्रिभुजी पत्रकारिता का एक पक्ष "सत्य" प्रमाणित हो रहा है। दूसरा पक्ष है सामान्य जनता की ओर बढ़ना। यहां सामान्य जनता की विभिन्न परिभाषाएं हो सकती हैं किंतु यदि वाराणासी को ध्यान में रखकर सामान्य जनता की पहचान की जाए तो ग्रामीण जनों का पक्ष प्रमुख रहेगा। इस पक्ष को प्रमाणित करता है त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह का नियमित अपने साप्ताहिकी "सामयिक ब्लिट्ज" को निःशुल्क कुछ गांव को उपलब्ध कराना। प्रसंगवश उल्लेख किया जा रहा है कि ग्रामीण साप्ताहिकी की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक करते हैं। उपलब्ध संसाधनों में नएपन का प्रमाण इस त्रिभुजी पत्रकार के वाराणसी में आयोजित विभिन्न कार्यक्रम तथा अनेक मंदिर निर्माण, गरीबोंनको भोजन एवं कंबल आदि वितरण से जुड़ा है।

वाराणसी के स्पंदनों को जितनी कुशलता से इस त्रिभुजी पत्रकार ने अपनी पुस्तकों में समेटा है ऐसा उदाहरण वर्तमान में कहीं देखने को नहीं मिल रहा है। प्रत्येक अच्छे और बड़े काम में एक धुन होती है लय होती है जिसके आधार पर कार्यों में लयबद्धता बनी रहती है। यदि इन त्रिभुजी पत्रकार महोदय की धुन की बात करें तो वह हैं वाराणसी के सांसद  और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा लय है विशेषकर वाराणसी के समग्र विकास गति। पिछले कुछ वर्षों से लगातार पुस्तकों का प्रकाशन वाराणसी के पल-पल, छिन-छिन का पारदर्शी दस्तावेज सा है। यह पुस्तक पत्रकार की डायरी की त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह के काशी के प्रति समर्पण और अनुराग को दर्शाता है। यह पुस्तक भी एक पारदर्शी दस्तावेज की तरह है। 

धीरेन्द्र सिंह

कवि और ब्लॉगर

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

रिश्ते

रिश्तों की डोर में न मिलता ओर-छोर
भोर जिंदगी का बंदगी करे भी तो क्या
सूर्य किरणें जगाती सजाती हैं निसदिन
पक्षियों की चहचआहट लगे क्या नया






संवेदनाएं सिमट रहीं चिमटी से उगें भाव
कामनाएं टिड्डी दल मन के फसल का क्या
प्रतियोगिता में स्वार्थ का समय-समय हवन
धुआं उठता बहुत घनेरा हवा का इसमें क्या

इंटरनेट से ही प्रायः अपनों से होती भेंट
दरवाजे पर दें दस्तक द्वार खुल रहा क्या
दो-तीन दिन ठहर लिए तो वर्ष भर छुट्टी
बर्तन को कोई साझा अब कर रहा है क्या

यह प्रवाह है समय का जय-जय तो कीजिए
एक उम्र चुकाने का समय रह गया ही क्या
ढल जाना समय संग जैसे उड़ती चले पतंग
रुख मोड़ने की जिद में कुछ मिल सका है क्या।

धीरेन्द्र सिंह
25.07.2026
08.16