शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

जीवन

कामनाएं दौड़ रहीं पर मन तो नियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

सपनों के शीर्ष पर भाव सुगंधित पड़े हैं
यथार्थ में संभव नहीं सामाजिक धड़े है 
पर प्रयास आस लिए बढ़ता अनियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

स्व को रोका है जीवन की असुविधाओं में
चाह बलवती फिर भी होती विपदाओं में
मन कहता स्वागत है हर भाव निमंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

जीवन समझ नहीं आया बस जीवन जीते हैं
विपरीत यदि कुछ होता हंस कहते रीते है 
इतना क्षद्म जीवन में राह लगे निबंधित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
21.33

चरित्र

चरित्र के चर्चे इतने इसका न कोई चित्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र



कुछ भी न रहा गोपनीय इलेक्ट्रॉनिक गति
सुख भी हो सोचनीय तात्कालिक जो मति
बहलाना-फुसलाना भ्रमित करना छिड़क इत्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

रामायण, महाभारत के मिलते हैं ऐसे पात्र
युग बांचता इन्हें पर लगे नासमझ सा छात्र
युगों से अपनों से छल सत्यता का नहीं जिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

अपने हैं जो क्रमशः बदलते हैं ढलते जाते हैं
भीतर बना दूरी करीबी भ्रम सजा भरमाते हैं
अपनापन मित्रता भी लगे भेदक लिए फिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
20.49

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

यौवन

देह दरबार है प्रपंच का अखबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है



देह सरकार ना बदले रहता यह प्रयास
दिखाते देह का साम्राज्य जिम के खास
कैसे "शो केस" देह क्या बाजार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है

स्वस्थ तन अब है गठित मांसपेशियां
निरोगी कम हैं कटाव की ले युक्तियां
स्वस्थ तनमन तो प्रसन्नता का दरबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है

दीर्घायु तक अब तो जमा रहता यौवन
रहन-सहन संयमित चयनित हैं भोजन
यौवन पर उम्र का नहीं रहता अख्तियार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
06.22

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

शब्द भाव - वडापाव

शब्द खींसे निपोर चल रहे ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे



शब्द वड़ा सा चटक होना चाहे
भाव पाव सा नरम होना चाहे
चाह चटनी की धुन रहे कैसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे

नहीं गेहूं का आटा रहता है मैदा
वड़ा में आलू, बेसन तेल कायदा
अल्पाहार सड़क किनारे शब्द ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे

शब्द की ऊष्मा सामान्य हो जाए
वडापाव गरम नहीं तो ना खा पाएं
भाषा सड़कों की लगे चिल्लर पैसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे।

धीरेन्द्र सिंह
23.10.2026
08.15

ईश्वर

प्यार की आराधना किए नहीं ईश्वरीय भक्ति में निमग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखादेखी में हैं कई मग्न



धर्म भी जलवायु अनुसार है निधारित जीवन शैली
कहीं की परम्परा मीठी लगे कहीं की लगे है कसैली
अपनी-अपनी परंपराओं के ज्ञानी-ध्यानी कई संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न

बिन भाषा शब्दार्थ समझे नित घंटों करें उसका उवाच
जीवन मनुष्य को तथ्य दर्शाता पर मानते नहीं उसे साँच
लौकिकता में भी ईश्वर परालौकिक कथ्य मिले भग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न

आधुनिकता में प्रकृति दूर भौतिकता के लिए हैं गरूर
पूजापाठ जितना अधिक उतने कष्ट जीवन के हों दूर
जीवन ईश्वर प्यार भक्ति है चाह समर्पण से व्यक्ति संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न।

धीरेन्द्र सिंह
22.10.2026
15.41

बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

उम्र साठ

उम्र 60 से अधिक तनमन में स्वस्थ झंकार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार



प्यार गहन गगन है प्यार है गहरा जलधार

बहुत जिंदगी जीनेवाले समझें छल मझधार

पगी कल्पना दुलकी चलना बातें अपरम्पार

कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार


साठ का पाठ लिए अपना अभिनव सा ठाठ

पारदर्शिता इसमें रहती कूड़ा करकट ले छाँट

एक ठहराव पूरा निभाव नहीं कोई अधिकार

कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार


साठा सो पाठा यह सत्य सदियों से चलता है

जीवन शैली उत्तम हुई जिसमें प्यार चहकता है

स्वस्थ शरीर मन स्वस्थ अधीर मांग रहा अभिसार

कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार।


धीरेन्द्र सिंह

21.10.2026

21.31

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

परछाई

दिल को इस तरह याद यूँ आपकी आयी
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

आप बहुमूल्य हैं हृदय कह रहा है निडर
श्राप किसने दिया बाधित हुई प्रेम डगर
जिंदगी तन्मय पर अचानक कैसे भरमाई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

यह टूटे प्रेम का भाव नहीं बाधित प्रवाह
सरपट प्रवाह में उभरे कई परिचित डाह
आप लड़खड़ा समझीं अभिव्यक्ति तुरपाई
चिह्यूंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

किसी जीवंत व्यक्तित्व को खुद में समेटना
मस्तिष्क समझ रहा दिल में उठ रही वेदना
आप अन्य में मशगूल कैसे चेतना को निभाई
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाई

पुरुष हूँ दम्भ सुप्तावस्था में भी लगे प्रखर
आप से पहल ना हो तो त्यजन वह डगर
यादों में जब आप आईं भूल गया ठकुराई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं।

धीरेन्द्र सिंह
29.10.2026
21.07