आ गया प्रकाश पुनः करने हमें प्रकाशित
उपलब्धियां मिलेंगी कुछ को अप्रत्याशित
दीपावली हर गली रात्रि को सशक्त नकारने
नई ज्योति नई संभावनाओं को संवारने
हर अर्चना विश्वस्त पूजन से मिले आशातीत
उपलाधियाँ मिलेंगी कुछ को अप्रत्याशित
विवेकहीन कह उठेंगे पटाखों से हो प्रदूषण
उत्सव, धर्म, आध्यात्म में उभरते खरदूषण
सोची-समझी साजिश से आजिज जग रीत
उपलब्धियां मिलेंगी कुछ को अप्रत्याशित
दीपोत्सव से सज उठा है मुहल्ला, शहर
प्रसन्नता की मान्यता दीप ज्योति दे फहर
कुछ भी कहें लोग पर्व हो निर्द्वंद्व व्यतीत
उपलब्धियां मिलेंगी कुछ को अप्रत्याशित।
धीरेन्द्र सिंह
05.11.2026
19.26