मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

आप

आप इस दिल की जिंदगानी हैं

प्यार की हम भी एक कहानी हैं

आपकी हलचलें खामोश हो रहीं

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं


गहन गहराई में भाव तुरपाई करें

अदृश्य देह आत्मा की रवानी है

आप हर बार हवा सा छू रहे हैं

ऐसा लगता हम उबलते पानी है


कहां से राह चली और शाम ढली

जिंदगी हतप्रभ सी अनजानी है

आज भी आस प्यास साँसों में

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं


आपकी ऊष्मा आपकी ऊर्जा है

एक गति मति में संगती ठानी है

प्यार के गुबार में आपका बुखार

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं।


धीरेन्द्र सिंह

29.04.2026

05.56

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

गर्मी

 मौसम आक्रामक नहीं कहीं है नर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी



घर से बाहर सूर्य प्रखरता से मिलता है
पसीने में मजदूर निडरता से चलता है
धरा की उष्णता गुम्बद में फंसी चर्खी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी

आग बरस रही श्रमिक को लगे है फाग
तरबतर पसीने से भींगा सजाता है आज
हमेशा मौसम न रहा जिजीविषा धर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी

सतत संघर्ष में निहित मानवता का उत्कर्ष
जूझते जीवन से उन्हें क्या मौसम का विमर्श
मौसम प्रणय करता कभी चुहल बेशर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी।

धीरेन्द्र सिंह
28.04.2026
08.45

रविवार, 26 अप्रैल 2026

प्रबुद्ध

प्रबुद्ध हैं तो सर्वत्र ज्ञान बांटिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तंत्र संज्ञान बांटिए

संज्ञान उत्तर प्रदेश गृहित शब्द है
विकासशील राज्य का जनित प्रारब्ध है
धर्म और राजनीति यहां जांचिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए

थार के गुबार में लिप्त लगता व्यवहार
संशय में उबरता सूर्यरश्मि सा त्यौहार
विस्थापन यहां विवशता कागज पर नापिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए

इतर राज्य-राष्ट्र में दीप्तिमान हैं रहिवासी
नोएडा, लखनऊ, अयोध्या आदि काशी
संज्ञान विज्ञान है तबियत से तो झांकिए
निबद्ध हैंबतो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए।


धीरेन्द्र सिंह
27.04.2026
09.14

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

उलझन

अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना



कश्तियाँ दोनों की मगन साथ-साथ थीं
हस्तियां अपनी भी सबरंग बेहिसाब थीं
कुतर दिया समाज ने जुड़ाव दे पैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना







अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व
अपने को देखे या सहेजे तीरे अस्तित्व
टपक रहे हैं भाव पर मुस्कराहट के छैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना






क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया
महल की बात करे जीर्ण हो रही कुटिया
प्यार अवसर है स्नेह सुप्त ताल की मैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना।







धीरेन्द्र सिंह
26.04.2026
10.24

गजब लिखते हैं

 
गजब लिखते हैं सरकार जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

भावनाओं की हो पल्लवित फुनगिया
कामनाएं खिलें लेकर विचार दुनिया
अभिव्यक्तियाँ जैसे हवन विचार घी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

मेरे हर लेखन की ऊर्जा हैं पाठक
सबकी अपनी शैली लेखन जातक
पाठक-पाठिका रचना रत्नहार जिय
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

यह रचना प्रतिक्रिया का प्रभाव
प्रतिक्रिया मस्तक रखना स्वभाव
आप महत्वपूर्ण सत्कार करे जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी।

धीरेन्द्र सिंह
25.04.2026
21.52



शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

देह मिलन

देह से देह मिलन भी एक जतरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

कितनी देह करती नित अपनी पूजा
स्वयं का श्रृंगार का आधार नहीं दूजा
स्वयं सुशोभित सज्जित नहीं नखरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

साहित्य यह पक्ष प्रखर दर्शाता नहीं
ऐसा लगे प्रचुर श्रृंगार इसे भाता नहीं
प्रणय तो पूजा है प्रकृति में पसरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

दूर से लगता आकर्षण अति चुम्बकीय
नयन लहक उठे महक उठे चहक हिय
घटाएं घिर आएं बदन लगे कि बदरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है।

धीरेन्द्र सिंगज
25.04.2026
11.15


शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

व्यक्ति

इतना रीता भी नहीं कि

ढूंढू व्यक्ति करने को बात

इतना भरा भी नहीं कि

कर सकूं अनदेखा जज्बात


मन की कूंची है तत्पर

बहुरंगी भावनाओं की सौगात