कविता
उभरती है
एक नावयौना की तरह
भाग जाती है
करती अठखेलियाँ
उसे पकड़ने के लिए
होती नहीं उपयोगी दौड़
भला कौन पाया है पकड़
चंचल भावनाओं को
उछलती कामनाओं को;
सरहद होती है
कविता की भी
भागती है निरंतर ताकते
कभी छिपते
कभी लचकती नाचते
इतराती है, रिझाती है
भावनाओं को
भाव में पकाती है;
डूब जाती है कविता
जीवन की गहराई में
शायद दब जाती है
नहीं उठती भावनाओं की
लहरें
स्थिर जल सा शांत मन
समेटे रहता है बवंडर
जीवन भी तो बदलते रहता निरंतर;
अचानक छा जाती है कविता
घनेरी बदलियों की तरह
नहीं करती बूंदाबांदी
ना ही देती कोई आहट
बरस पड़ती है
झूमकर
हो जाती है प्रवाहित
शब्दों के किनारे बीच
ऐसे देती मन को
हरदम कविता सींच।
धीरेन्द्र सिंह
05.08.2026
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