बुधवार, 31 जनवरी 2024

किसान

 सूर्य रखता भाल पर तन पूर्ण स्वेद

माटी से कलरव कृषक करे बिन भेद


माटी मधुर संगीत बन फसलें लहराए

वनस्पति संग जुगलबंदी से फल इतराएं

कृषक चषक सा माटी में भरता श्रम नेग

माटी से कलरव कृषक करे बिन भेद


सर्दी की ठिठुरन में खेतों की रखवाली

मर्जी से ना मिल पाए अपनी घरवाली

थाली लोटा ऊंघता माटी भीत को देख

माटी से कलरव कृषक करे बिन भेद


मौसम मार पशुओं का वार फसल सहे

करे किसानी बस मचान चहुं दिशा गहे

ट्रैक्टर ट्रॉली अर्थ बवाली नहीं विशेष

माटी से कलरव कृषक करे बिन भेद


अन्न देवता देश का है गरीब किसान

रोटी-बेटी जब जगें माटी दे तब तान

है समर्पित साधक माटी योगी निस्तेज

माटी से कलरव कृषक करे बिन भेद।


धीरेन्द्र सिंह

01.02.2024

12.29


चलन

 

अस्तित्ब में नित अहं का दहन

बौद्धिकता का कैसा यह चलन

 

सत्य के कथ्य से कटकर दूर

चाटुकारिता करें कहते हुए हुजूर

नई पीढ़ी देख रही लेखकीय गलन

बौद्धिकता का कैसा यह चलन

 

किसी को छपने की ललक प्रथम

किसी को मंच पर महकने का वहम

प्रयासरत निरंतर कहीं तो जुड़े लगन

बौद्धिकता का कैसा यह चलन

 

सोशल मीडिया के हैं असंख्य मित्र

अधिकांश का नाम न पहचानें चित्र

लाइक टिप्पणियों का है यह जतन

बौद्धिकता का कैसा यह चलन।

 

धीरेन्द्र सिंह

31.02.2024

19.40

सोमवार, 29 जनवरी 2024

लीपें अंगना

 

गद्य-पद्य संरचना भांवों के कंगना

सबकी अपनी मर्जी लीपें जैसे अंगना

 

कुछ चाहें लिखना निर्धारित जो मानक

कुछ की अभिव्यक्तियां मुक्त उन्मानक

सर्जना कब चाहती है शर्तों में बंधना

सबकी अपनी मर्जी लीपें जैसे अंगना

 

यह लेखन सही गलत है यह उद्बोधन

पर सबमें निहित अर्थ सार्थक संबोधन

हर सोच नई लेखन नया क्यों दबंगना

सबकी अपनी मर्जी लीपें जैसे अंगना

 

श्रेष्ठता का चयन हो जैसे शबरी बेर

यह क्या लिखनेवालों को करते रहें ढेर

वर्चस्वता का ढोंग भरे उसका संग ना

सबकी अपनी मर्जी लीपें जैसे अंगना।

 

धीरेन्द्र सिंह


30.01.2024

12.22

हो जाऊंगा अशुद्ध

 मन को ना छुओ नहीं मैं बुद्ध

छुओगे तो हो जाऊंगा मैं अशुद्ध


प्रीत प्रणय है सदियों की बीमारी

रीत नीति है वादियों की ऋतु मारी

मुझसे जुड़कर प्रवाह करो न अवरुद्ध

छुओगे तो हो जाऊंगा मैं अशुद्ध


आत्म मंथन का हूँ मैं एक पुजारी

पारदर्शी सत्यता इच्छा पूर्ण सारी

सरल शांत मन ना कहीं अवरुद्ध

छुओगे तो हो जाऊंगा मैं अशुद्ध


उसे चिढ़ाता था कह रानी दिखलाओ

वह कहती थी कर्मठता तो दिखलाओ

वह थी रानी राजा सा मैं निबद्ध

छुओगे तो हो जाऊंगा में अशुद्ध


व्यक्तित्व मेरा हवन सुगंधित ज्वाला

कृतित्व को उसने टोह-टोह रच डाला

उससा कोई कहीं नहीं थी बड़ी प्रबुद्ध

छुओगे तो हो जाऊंगा मैं अशुद्ध।


धीरेन्द्र सिंह

29.01.2024


20.43


रविवार, 28 जनवरी 2024

प्रणय

 जब हृदय पुष्पित हुआ

प्रणय आभासित हुआ

व्योम तक गूंज उठी

दिल आकाशित हुआ


अभिव्यक्तियों की उलझनें

भाव आशातित हुआ

प्रणय की पुकार यह

सब अप्रत्याशित हुआ


राम की सी प्राणप्रतिष्ठा

महक मर्यादित हुआ

अरुण योगीराज सा

मनमूर्ति परिचारित हुआ


हृदय उल्लसित कुसुमित

सुगंध पर आश्रित हुआ

प्रणय बिन कहे बहे


व्यक्ति बस मात्रिक हुआ।


धीरेन्द्र सिंह

29.01.2024

08.45

शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

स्व

 

सर्जना का उन्नयन हो अर्चना दे विश्वास

आत्मा जब लेती है जकड़ अपने बाहुपाश

 

मन करता सर्जना लिपटाए प्रकृति अनुराग

स्व में सृष्टि समाहित हँस करती द्वाराचार

धरा स्वयं में हरी-भरी मिले नीला आकाश

आत्मा जब लेती है जकड़ अपने बाहुपाश

 

जग लगता अवचेतन मन भीतर ही चेतन

स्पंदित, सुगंधित, समंजित है स्वधन

निपट अकेला संग जीवन खेला होता आभास

आत्मा जब लेती है जकड़ अपने बाहुपाश

 

इससे बोलो उसको फोन मन जैसे हो द्रोन

स्व मरीन अकुलाहट, बेचैनी दोषी फिर कौन

दुनियादारी दायित्व तलक फिर अपना आकाश

आत्मा जब लेती है जकड़ अपने बाहुपाश।

 

धीरेन्द्र सिंह


26.01.2024

19.19

बुधवार, 24 जनवरी 2024

दिल एक

 

कोई तो बताए एक से अधिक प्यार

दिल एक कैसे अनेक का अधिकार

 

पंखुड़ी की ओस में लिपट भावनाएं

सुगंध सी प्रवाहित होकर कामनाएं

पलकों से उठा चूनर करें अभिसार

दिल एक कैसे अनेक का अधिकार

 

रिश्ता तोड़ गयीं छोड़ गयीं महारानी

क्या यह उचित ढूंढें एक देवरानी

प्यार का भी अंग होता है प्रतिकार

दिल एक कैसे अनेक का अधिकार

 

माना कि बेखुदी मैं जाते हैं लट उलझ

यह एक दुर्घटना है प्यार ना सहज

दूसरों में ढूंढते एक उसी की झंकार

दिल एक कैसे अनेक का अधिकासर।

 

धीरेन्द्र सिंह

24.01.2024

22.58

रविवार, 21 जनवरी 2024

रामजन्मभूमि

 

झंडों ने सड़कों को इजाजत दे दी

भक्ति दे दिया और इबादत ले ली

 

आक्रमणकारी मुगल वंश का था दंश

हमसे ही हमारा चुरा लिया था अंश

मानसिक पहल ने वही इजाजत दे दी

भक्ति दे दिया और इबादत ले ली

 

रा मलला मंदिर सनातन का है गर्व

आततायियों ने सोचा बंद हो यह पर्व

सर्वोच्च न्यायालय ने राम महारत देखी

भक्ति दे दिया और इबादत ले ली

 

धार्मिक सौहार्द्रता भारत के रग बसा

अयोध्या में ही भव्य मस्जिद रचा

सनातन देता हर धर्मों को नव वेदी

भक्ति दे दिया और इबादत ले ली

 

22 जनवरी वर्ष 24 का है इतिहास

साक्ष्य विश्व होकर देखे सनातनी आस

आस्था ने विस्थापित को मात दे दी

भक्ति दे दिया और इबादत ले ली।

 


धीरेन्द्र सिंह

21.01.2024

23.25

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

सुतृप्ता, अतृप्ता

 सुतृप्ता, अतृप्ता, स्वमुक्ता


सुतृप्ता

एक नारी

एक रचना

एक कृति

एक वृत्ति


अतृप्ता

एक क्यारी

मति दुधारी

नया तलाशती

निस संवारती


स्वमुक्ता

एक अटारी

उन्नयनकारी

भाव चित्रकारी

ऋतु न्यारी


सुतृप्ता, अतृप्ता, स्वमुक्ता

जीवन इनसे चलता, रुकता

सुतृप्ता, स्वमुक्ता निधि सारी

अतृप्ता घातक साहित्य सूखता


अतृप्ता से बचने का हो उपाय

साहित्य हरण का लिए स्वभाव

लील जाए सर्जक और सर्जना

इसलिए लिखा, हो साहित्य बचाव।


धीरेन्द्र सिंह


11.01.2024

17.01

नया क्या खिलेगा

 मुझे इतना पढ़ ली नया क्या मिलेगा

नया ना मिला तो नया क्या खिलेगा


प्रहसन नहीं है प्रणय की यह डगर

सर्जन नहीं है अर्जन की कहां लहर

नवीनता में ही नव पथ्य खुलेगा

नया न मिला तो नया क्या खिलेगा


एक आदत हो जाए तो प्रीत पुरानी

एक सोहबत सहमत तो गति वीरानी

हर कदम बेदम ना नई राह चलेगा

नया न मिला तो नया क्या खिलेगा


जीवन में मनुष्य होता नहीं है रूढ़

धरा और व्योम वही, विभिन्नता आरूढ़

भाव पंख खुले तो वही सृष्टि रंगेगा

नया न मिला तो नया क्या खिलेगा।


धीरेन्द्र सिंह


12.01.2024

14.48

गुरुवार, 11 जनवरी 2024

स्वांग है

 पहल का प्रथम प्रहर अनुराग है

शेष तो बस संतुलित स्वांग है


सत्य प्रायः रह जाता है अबोला

असत्य ही प्रखर होकर है बोला

सामाजिकता में निर्मित ऐसा प्रभाग है

शेष तो बस संतुलित स्वांग है


भाव उल्लेख की कई अभिव्यक्तियां

यही आहत करतीं सरगमी नीतियां

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही राग है

शेष तो बस संतुलित स्वांग है


चल पड़ा जो राह विश्वास संग एकल

समाज तो क्या विश्व हुआ बेकल

रचित गठित ही सामाजिक मांग है

शेष तो बस संतुलित स्वांग है


नाद के निनाद में क्यों विवाद

भाव विभोरता पर क्यों आघात

हृदय पूजित का ही भान है

शेष तो बस संतुलित स्वांग है।


धीरेन्द्र सिंह


12.01.2024

07.11

प्यार का टर्मिनस

 प्रणय का है होता किस उम्र में सुयश

कोई तो बता दे प्यार का टर्मिनस


बहुत ढूंढने पर प्यार तथ्य न मिला

लोग कहते है जारी वही सिलसिला

अंदाज अपने-अपने, अदाओं की कसक

कोई तो बता दे प्यार का टर्मिनस


कुछ कहें प्यार बंद, भक्ति को हो लिया

प्यार समाहित उनकी भक्ति की बोलियां

मार्ग कोई भी हो प्यार चाहे चहक

कोई तो बता दे प्यार का टर्मिनस


एक बंधन लगा चंदन, है मन वंदन

राह कोई भी हो प्यार का हो क्रंदन

मन मारकर कुछ चुप ले कश्मकश

कोई तो बता दे प्यार का टर्मिनस


स्व को मुक्त करने के सब प्रयास

स्व मुक्त उड़ान हेतु कब से उजास

प्यार लौकिक-अलौकिक लिए अमृत रस

कोई तो बता दे प्यार का टर्मिनस।


धीरेन्द्र सिंह


11.01.2024

16.04

बुधवार, 10 जनवरी 2024

तुम में

 केशों में तुम्हारे शब्दों को सजाकर

भावनाओं की कंघी से केश संवारकर

कुछ गीत प्रणय के कर दूं तुम्हारे प्राण

आत्मा की आत्मा से नींव बनाकर


भावनाओं पर भावनाओं को बसाकर

तिनके सा बह चले जिंदगी नहाकर

इतनी आतुरता तो हुई न अकस्मात

क्या-क्या गए सोच एक तुमको चुराकर


मन से उठे गीत होंठ देने लगे शब्द

अंगड़ाईयों को यूं तनहाईयों में गाकर

तुमको ही लिपटा पाता शब्दों में सुगंध

एक मदहोशी की खामोशी में छुपाकर


यह प्रवाह प्रणय या व्यक्तित्व तुम्हारा

क्यों लगने लगा प्रीत तुम्हारा चौबारा

निवेदित नयन के आचमन कर लिए

तब से लगने लगा तुम में जग सारा।


धीरेन्द्र सिंह


10.01.2024

23.36

मंगलवार, 9 जनवरी 2024

विश्व हिंदी दिवस

 हिंदी विश्व दिवस

कौन मनाता सहर्ष

कागज का यह घोड़ा

हिंदी का कहां उत्कर्ष


एक शोर अनर्गल

कहता है चल

भाषा भाग्य विधाता

भाषा पर मचल


मोबाइल संचालन में

प्रौद्योगिकी आंगन में

सिर्फ जुड़ा बाजार

शेष आंग्ल छाजन में


कठिन है जगाना

अर्थ किसने जाना

योग्यता का क्या

जिससे न मिले खाना


हिंदी विश्व दिवस

मिले तुझे सुयश

अर्थ मिले अपार

मिले ना अपयश।



धीरेन्द्र सिंह

10.01.2024

12.52

सहन की महारानी

 हथेलियों की अंगुलियां उलझाना चाहता हूँ

तुम्हारे दर्द को मैं यूं पहचानना चाहता हूँ


बहुत हो छिपाती तुम अपनी कहानी

खुशियां लपेटे सहन की ऐ महारानी

तुम्हें तुमको तुमसे आजमाना चाहता हूँ

तुम्हाडे दर्द को मैं यूं पहचानना चाहता हूँ


जब भी करूं प्रश्न देती हो मुस्करा

अदा से कह देती मुझसा न मसखरा

राज दिल के तुम्हारे मांजना चाहता हूँ

तुम्हारे दर्द को मैं यूं पहचानना चाहता हूँ


बड़ी ढीठ हो कहते-कहते रुक जाती

धुआं फैल जाता न जलती है बाती

दिए मन के तुम्हारे लौ सुहाना चाहता हूँ

तुम्हारे दर्द को मैं यूं पहचानना चाहता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

10.01.2024


06.14

चली गई

 कौन जाने कौन सी बला टल सी गई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई


सुबह होते ही व्हाट्सएप पर झंकार

प्रीतमयी संवेदना का आदर सत्कार

नित नए अंदाज चाहे बातें भी नई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई


मैंने नहीं मेरे घर ने भी दिया दुत्कार

हिम्मती थी वह प्रतिदिन की अभिसार

चेतना में वेदना की संवेदना लड़ी गई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई


वर्ष तक किया उसकी चंचलता पर वार

इधर-उधर फुदकने से मानी ना हार

एक संग कई को घुमाती गली गई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई


अब मस्तिष्क मुक्त सजाए निस सर्जनाएं

साहित्य में घटित वही भाव लिखते जाएं

पकड़ ली, जकड़ ली लहर थी डंस गई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई।


धीरेन्द्र सिंह

09.01.2024


18.56

सोमवार, 8 जनवरी 2024

मालदीव हो गए

 कैसे कहें वह आत्मिक सजीव हो गए

सहयोग था प्रचुर पर मालदीव हो गए


भव्यता में सम्मिलित अभिनव योगदान

अभिव्यक्तियों में फूंके मिल चेतना प्राण

विवादखिन्नता में भ्रमित परजीव हो गए

सहयोग था प्रचुर पर मालदीव हो गए


पहले था समर्पण प्राप्त करता अनुराग

लक्षदीप सा गूंजा और हो गया विवाद

झूठे गुरुर में आधार निर्जीव बो गए

सहयोग था प्रचुर पर मालदीव हो गए


उपकार और सम्मान में हो मदांध

सोचकर बढ़े है सशक्त दूजा कांध

 देखते ही देखते वह अतीत हो गए

सहयोग था प्रचुर पर मालदीव हो गए


यह था सतत प्रयास उसी राह लौट आएं

पहले की तरह उन्मुक्त होकर खिलखिलाएं

सोशल मीडिया छोड़ रिक्त नींव हो गए

सहयोग था प्रचुर पर मालदीव हो गए।


धीरेन्द्र सिंह

08.01.2024


22.34

ना मानें

 तृषित है अधर मगर रीत न्यारी

ना माने हैं वह रचित प्रीत क्यारी


यह रचना नहीं एकल सद्प्रयास

रहे दो हृदय एक-दूजे के निवास

बोया कोई काटे जबर तरकारी

ना माने हैं वह रचित प्रीत क्यारी


ना बोलें रहें चुप पूछें जो कुछ

क्या प्रणय प्रवृत्ति होता है गुपचुप

करें विरोध खाएं कसम महतारी

ना माने हैं वह रचित प्रीत क्यारी


यह तृष्णा अजब कई लोग बेसमझ

स्व में ही सरोवर पर लहर की अरज

स्वीकारना ही है क्या आत्म आरी

ना माने हैं वह रचित प्रीत क्यारी


बहकने भटकने की नव डगर है

कहो और कितनों पर रखे नजर है

वही संग हो जो उमंग प्रीतकारी

ना माने हैं वह रचित प्रीत क्यारी।



धीरेन्द्र सिंह

08.01.2024

06.31

रविवार, 7 जनवरी 2024

छोरी

 चाहत की इतनी नहीं कमजोरी

क्यों आऊं मैं तुम्हारे पास छोरी


गर्व के तंबू में तुम्हारा है साम्राज्य

चापलूसों संग बेहतर रहता है मिजाज

सत्य के धरातल पर क्षद्मभाव बटोरी

क्यों आऊं मैं तुम्हारे पास छोरी


उम्र कहे प्रौढ़ हो, किशोरावस्था लय है

जहां भी तुम पहुंचो, तुम्हारी ही जय है

तुम हो तरंग बेढंग की मुहंजोरी

क्यों आऊं मैं तुम्हारे पास छोरी


राह अब मुड़ गयी इधर से उधर गयी

झंकृत थी वीणा अब रागिनी उतर गयी

सर्जना के शाल ओढ़ाऊँ न सिंदूरी

क्यों आऊं मैं तुम्हारे पास छोरी


आत्मा से आत्मा का होता विलय

तुम ढूंढो आत्मा में दूजा प्रणय

सुप्त यह गुप्त, निरंतर है लोरी

क्यों आऊं मैं तुम्हारे पास छोरी।



धीरेन्द्र सिंह

08.01.2024

08.48

क्या करूँ

 चांदनी बादलों से अचानक गयी सिमट

क्या करूँ व्योम से बोला बादल लिपट


प्यार उर्ध्वगामी इसकी प्रकृति ना अवनति

यार मात्र एक ठुमकी सहमति या असहमति

प्यार ना सदा मृदुल राह यह है विकट

क्या करूँ व्योम से बोला बादल लिपट


आज भी आकाश में दौड़ रहे हैं मेघ

चांदनी कब मिले, क्या लगाएं सेंध

द्विज में ही गति, बूझना कठिन त्रिपट

क्या करूँ व्योम से बोला बादल लिपट


चांदनी है चंचला चांद को न आभास

जलभरे बादलों में भी है अनन्य प्यास

प्रेम एक से ही होता बोलता विश्व स्पष्ट

क्या करूँ व्योम से बोला बादल लिपट


एक प्रतीक्षा प्यार का दिव्यतम अभिसार का

नभ में नैतिकता के भव्यतम स्वीकार का

यदि प्रणय प्रगल्भ तो चांदनी चुम्बक निपट

क्या करूँ व्योम से बोला बादल लिपट।


धीरेन्द्र सिंह


07.01.2024

19.44

शनिवार, 6 जनवरी 2024

अक्षत

 दरवाजे की घंटी ने जो बुलाया

देख सात-आठ लोग चकमकाया

ध्यान से देखा तो केसरिया गले

कहे राममंदिर हेतु अक्षत है आया


श्रद्धा भाव से बढ़ गयी हथेलियां

लगा कोई नहीं मेरे राम दरमियां

राममंदिर फोटो संग इतिहास पाया

जो देखता पढ़ता था वह अक्षत है आया


कुहूक एक उठी सारी गलियां जगी

राम कण-कण में अक्षत की डली

बारह दीपक जलाने का था निदेश

 कह जै श्रीराम बढ़ गयी वह टोली


व्यक्ति में भी प्रभुता हुई दृष्टिगोचित

राम मर्यादा से हो भला क्या उचित

राम से ही सृजित संचित आत्म बोली

भजन गूंज उठा दिया ताल मन ढोली


सर्जना की अर्चना का भव्यता साक्षात

अक्षत बोल पड़ा सनातन ही उच्छ्वास

भारत संग विश्व गुंजित हो प्रीत मौली


विवाद निर्मूल सारे जीव राम टोली।


धीरेन्द्र सिंह

07.01.2024

08.28

बहुत दूर से

 बहुत दूर से वह सदा आ रही है

उन्मुक्त कभी वह लजा आ रही है


छुआ भाव ने एक हवा की तरह

हुआ छांव सा एक दुआ की तरह

वह तब से मन बना आ रही है

उन्मुक्त कभी वह लजा आ रही है


सदन चेतना के हैं सक्रिय बहुत

मनन वेदना के हैं निष्क्रिय पहुंच

भावनाएं दूर की कैसे बतिया रही हैं

उन्मुक्त कभी वह लजा आ रही है


अक्सर कदम दिल के चलते चलें

कोई क्या नियंत्रण यह हैं मनबहे

चाहतें चलते मुस्का चिहुंका रही हैं

उन्मुक्त कभी वह लजा आ रही हैं


कल्पनाओं की अपनी है दुनिया निराली

यहां न रोकटोक है ना कोई सवाली

टाइपिंग यहां अपने में इतरा रही है

उन्मुक्त कभी वह लजा आ रही हैं।


धीरेन्द्र सिंह


06.01.2024

19.33

छपवाली

 जितनी छपी है क्या सब पढ़ ली

फिर क्यों अपनी अभी छपवाली


भाषाओं में नित नए सृजन तौर

मौलिक हैं कितने कौन करे गौर

अपनी महत्ता क्या सब में बढ़ाली

फिर क्यों अपनी अभी छपवाली


क्या लिखे क्यों लिखे सिलसिले

पहले भी यही लिखा सत्यमिले

लेखन से क्या रचनात्मकता खिली

फिर क्यों अपनी अभी छपवाली


पुस्तक प्रकाशन शौक और नशा

रचनाकार बिन पके लिखा वो फंसा

कई प्रकाशकों के झांसे गली-गली

फिर क्यों अपनी अभी छपवाली


अनेक पुस्तक लेखक लगें निरुत्तर

पुस्तक की चाह जैसे पुत्री-पुत्तर

हिंदी इस जंजाल की ज्ञात क्या कड़ी

फिर क्यों अपनी अभी छपवाली।


धीरेन्द्र सिंह


06.01.2024

15.32

शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

राम मंदिर

 इतिहास के पन्नों को निहार

पांच सौ वर्षों की ललक पुकार

स्वर्ण हिरण सा विचरित भ्रम

हुआ ध्वनित फिर राम टंकार


पांच सौ वर्ष पुरातत्व अभिलाषी

कुछ प्रतीक प्रमाण सच आसी

न्यायालय सर्वोच्च का निर्णय

राम नाम का तथ्य अभिलाषी


वाद-विवाद असंयमित रचि संवाद

मेरी-तेरी का गूंजा गहि नाद

प्राण त्यजन बसि गहन घनन

राम राज्य का गुंजित निनाद


इतिहास पुनः सर्जित अनुप्रतियाँ

दिग-दिगंत अयोध्या की युक्तियां

शिल्प कौशल में संस्कृति कृतियाँ

राम मंदिर ओर प्रवाह भक्तियाँ 


बाईस जनवरी सनातनी की इकहरी

प्राण प्रतिष्ठा नयना सब लहरी

आस्था अनुनय आमंत्रित सविनय

राम धनुष सा कौन है प्रहरी।



धीरेन्द्र सिंह

05.01.2024

21.14

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

बिनकहे

 मुझे हर तरह छूकर तुमने

दिए तोड़ बिनकहे नूर सपने


एक बंधन ही था, जिलाए भरोसा

तुमने भी तो, थाली भर परोसा

यकायक नई माला लगे दूर जपने

दिए तोड़ बिनकहे नूर सपने


वेदना यह नही मात्र अनुभूतियां

प्यार में भी होती हैं क्या नीतियां

प्यार तो अटूट देखे मजबूर सपने

दिए तोड़ बिनकहे नूर सपने


तन की चाहत में है सरगर्मियां

प्यार तो महक दिलों के दरमियां

प्यार बंटता भी है कब कहा युग ने

तोड़ दिए बिनकहे नूर सपने


चाह की राह में कैसा भटकाव

जुड़ी डालियां जब तक ही छांव

कैसा अलगाव खुद को लगे छलने

तोड़ दिए बिनकहे नूर सपने।


धीरेन्द्र सिंह

05.02.2024


08.23


बहेलिया

 प्रहर की डगर पर, अठखेलियां

पक्षी फड़फड़ाए, छुपे हैं बहेलिया


मार्ग प्रशस्त और अति व्यस्त

कहीं उल्लास तो है कोई पस्त

चंपा, चमेली संग कई कलियां

पक्षी फड़फड़ाए, छुपे हैं बहेलिया


लक्ष्यप्राप्ति को असंख्य जनाधार

आत्मदीप प्रज्ज्वलित लौ संवार

सुगबुगाहट में सुरभित हैं बस्तियां

पक्षी फडफ़ड़ाए, छुपे हैं बहेलिया


बहेलिया स्वभाव करे छुप घात

नकारात्मकता से रखे यह नात

कलरव मर्दन करने की तख्तियां

पक्षी फड़फड़ाए, छुपे हैं बहेलिया।


धीरेन्द्र सिंह


04.02.2024

20.47

बुधवार, 3 जनवरी 2024

मस्तियाँ


अजब गजब दिल की बन रही बस्तियां

हर बार धार नई दे तुम्हारी मस्तियाँ

 

तुम के संबोधन को बुरा ना मानिए

सर्वव्यापी तुम ही कहा जाए जानिये

सर्वव्यापी लग रहीं आपकी शक्तियां

हर पल धार नई दे तुम्हारी मस्तियाँ

 

लगन की दहन मनन नित्य कह रहा

क्यों छुपाएं सत्य रतन दीप्ति कर रहा

उलझन समाए भ्रमित भौंचक हैं बस्तियां

हर पल धार नई दे तुम्हारी मस्तियाँ

 

नित नए भाव से मुखर आपके अंदाज

विभिन्न रस सराबोर समययुक्त साज

कलाएं अनेक अद्भुत लगें अभिव्यक्तियां

हर पल धार नई दे तुम्हारी मस्तियाँ

 

लुप्त हुए सुप्त हुए या कहीं गुप्त हुए

मुक्त हुए सूक्ति हुए या वही उपयुक्त हुए

आपकी अदाओं की अंजन भर अणुशक्तियां

हर पल धार नई दे तुम्हारी शक्तियां।

 

धीरेन्द्र सिंह


03.02.2024

19.22

मंगलवार, 2 जनवरी 2024

आपकीं लाइक

 मेरी रचना इकाई न दहाई

आपकी लाइक से हर्षाई


अभिव्यक्ति में आसक्ति नहीं

शब्दों में मनयुक्ति नहीं

भावनाओं की है उतराई

आपकी लाइक से हर्षाई


मन उत्साहित है लेखन

शब्द अबाधित हैं खेवन

है रहस्य रचना तुरपाई

आपकीं लाईक से हर्षाई


सत्य ही साहित्य है

तथ्य ही व्यक्तित्व है

सर्जना की ऋतु अंगड़ाई

आपकी लाईक से हर्षाई


स्नेह की स्निग्धता आपूरित

मेघ की निर्द्वंदता समाहित

भावनाएं प्रवाहित छुईमुई

आपकी लाइक से हर्षाई।



धीरेन्द्र सिंह

03.01.2024

10.22

हयवदन

 तृषित नयन डूबे गहन करे आचमन

गहराई की गूंज रचे प्रक्रिया हयवदन


प्रगति की गति नहीं जो मति नहीं

निर्णय कैसा जहां उदित सहमति नहीं

द्वार-द्वार ऊर्जा की प्रज्ज्वलित अगन

गहराई की गूंज रचे प्रक्रिया हयवदन


दृष्टि गरज तो क्या दृष्टिकोण सरस

बदलियां घनी तो क्या व्योम जाए बरस

भ्रम रचित कर्म में युक्तियां गबन

गहराई की गूंज रचे प्रक्रिया हयवदन।


धीरेन्द्र सिंह

02.01.2024

18.10

चांद

 मन भावों की करने गहरी एक जांच

नववर्ष के प्रथम प्रहर निकला चांद


देख चांद मन बोला क्या तुम पाओगे

भाव जंगल मन में भटक थक जाओगे

यहां वेदना सघन कोई न पाता आंक

नववर्ष के प्रथम प्रहर निकला चांद


मनगामी अनुगामी तथ्यपूर्ण है कल्पना

सत्य अल्प अनुभूतियां बाकी है जपना

सब दोहरे हैं सबकी अपनी-अपनी मांद

नववर्ष के प्रथम पहर निकला चांद


क्या प्रतीक है यह और प्रकृति संदेश

ताक रहा भाव नयन से कोई विशेष

सरपंच सा व्योम क्या सुन रहा फरियाद

नववर्ष के प्रथम पहर निकला चांद।


धीरेन्द्र सिंह


02.01.2024

13.57