रविवार, 31 मार्च 2024

सूर्य खिसका

 सांझ पलकों में उतरी, सूर्य खिसका

आत्मभाव बोले कौन कहां किसका


चेतना की चांदनी में लिपटी भावनाएं

मुस्कराहटों में मछली गति कामनाएं

मेघ छटा है, बादल बरसा न बरसा

आत्मभाव बोले कौन कहां किसका


घाव हरे, निभाव ढंके, करे अगुवाई

दर्द उठे, बातें बहकी, छुपम छुपाई

जीवन एक दांव, चले रहे उसका

आत्मभाव बोले कौन कहां किसका


भ्रम के इस सत्य का सबको ज्ञान

घायल तलवार पर आकर्षक म्यान

युद्ध भी प्यार है, दाह है विश्व का

आत्मभाव बोले कौन कहां किसका।


धीरेन्द्र सिंह


31.03.2024

19.42

शनिवार, 30 मार्च 2024

कह दीजिए

 क्यों प्रतीक, बिम्ब हों

क्यों हों नव अलंकार

यदि लहरें हैं तेज तो

कह दीजिए है प्यार


क्यों महीनों तक कश्मकश

क्यों सहें मानसिक चीत्कार


यदि प्रणय की प्रफुल्ल पींगे

कह दीजिए है प्यार


साहित्य सृजन है कल्पना

मनभाव का है झंकार

यदि यथार्थ जीना हो

कह दीजिए है प्यार


आदर्श, परंपरा और नैतिकता

प्रणय न जाने यह पतवार

यदि लहरों सा हौसला

कह दीजिए है प्यार।


धीरेन्द्र सिंह

शुक्रवार, 29 मार्च 2024

प्रक्रिया

 सकारात्मक प्रेरणा रचना की है प्रक्रिया

रच जाती कविता मिले आपकी प्रतिक्रिया


पुष्प पंखुड़ियों से शब्द में सुगंध भरूं

प्रस्तुति पूर्ण हो नित सोचूं क्या करूं

धन्यवाद मुस्कराता, विश्वास जनित हिया

रच जाती कविता मिले आपकीं प्रतिक्रिया


खींच ले जाती कविता देख सन्नाटा

और मिश्रीत भावनाओं का ज्वार-भाटा

शब्द निबंधित, बिम्बित भावना क्रिया

रच जाती कविता मिले आपकी प्रतिक्रिया


अंतर्मन हो पवन, आपकी ले चेतना

विश्व एक प्रतिबिंब, छवि को देखना

शब्द कहें आपके, आप स्पंदित जिया


रच जाती कविता मिले आपकी प्रतिक्रिया।


धीरेन्द्र सिंह

29.03.2024

20.46

गुरुवार, 28 मार्च 2024

पहल प्रथम

 होठों पर शब्द रहे भागते

अधर सीमाएं कैसे डांकते

हृदय पुलक रहा था कूद

भाव उलझे हुए थे कांपते


सामाजिक बंधनों की मौन चीख

नयन चंचल, पलक रहे ढाँपते

अपूर्ण होती रही रचनाएं सभी

साहित्य के पक्ष रहे जांचते


प्रणय की अभिव्यक्ति ही नहीं

व्यथाओं में भी, सत्य रहे नाचते

लिखते-लिखते लचक गए शब्द

बांचते-बांचते रह गए नापते


सम्प्रेषण अधूरा, कहते हैं पूरा

पोस्ट से हर दिन, रहे आंकते

सामनेवाला करे पहल प्रथम

भाव रहे लड़खड़ाते, नाचते।



धीरेन्द्र सिंह

28.03.2024

19.10

बुधवार, 27 मार्च 2024

मठाधीश


 तलहटी में तथ्य को टटोलना

सत्य के चुनाव की है प्रक्रिया

कर्म की प्रधानता कहां रही

चाटुकारिता बनी है शुक्रिया


है कोई प्रमाण कहे तलहटी

घोषणाएं ही विश्वस्त क्रिया

अनुकरण जयघोष का गुंजन

दोलायमान धूरी ही समप्रिया


चल पड़े पग असंख्य, लालसा

कथ्यसा ककहरा द्रुत त्रिया

रटंत के हैं महंत दिग दिगंत

अंतहीन कामनाओं का हिया


व्यक्ति आलोड़ित अचंभित चले

मठाधीश मन्तव्य लगे दिया

तथ्य भ्रमित शमित जले

शोर है पथ आलोकित किया।


धीरेन्द्र सिंह

27.03.2024

20.26

देह

 देह कहां अस्तित्ब है मनवा

आत्म प्रीति ही जग रीति

रूप की आराधाना है भ्रम

आत्मचेतना ही नव नीति


देह प्रदर्शन देता मोबाइल

दैहिक कामना ढलम ढलाई

रूप कहां की प्रेम रीति

आत्मचेतना ही नव निति


ना सोचो देह जशन है

बिना देह सजनी-सजन हैं

संवेदनाओं में गहन प्रतीति

आत्मचेतना ही नव प्रतीति


वर्षों तक हम रहे अबोले

भाव हृदय कहां बिन बोले

तत्व चेतना की ही स्थिति

आत्मचेतना ही नव प्रतीति।


धीरेन्द्र सिंह

27.03.2024

16.19

सोमवार, 25 मार्च 2024

मीते

 होली यह पढ़ हुई मालामाल

“मीते के गाल पर गुलाल”


"वाह! मन गयी अबकी होली"

प्रफुल्लित अंतर्चेतना तब बोली

भाव-भाव मिल रंग धमाल

“मीते के गाल पर गुलाल”


सोशल मीडिया पर की होली

रंग-ढंग सज होती है ठिठोली

गहन भाव शब्द हियताल

“मीते के गाल पर गुलाल”


गालों पर है गुलाल नृत्य

रंगोत्सव आता नहीं नित्य

प्रणय प्रेरणा कर गयी निहाल

“मीते के गाल पर गुलाल।“


धीरेन्द्र सिंह


25.03.2024

13.41

शनिवार, 23 मार्च 2024

ओ मनबसिया

 सब मनबतिया जग सारी रतिया, ओ मनबसिया

चांद पिघल तकिया संग झूमे, झिलमिल रतिया


 अभिलाषाओं के आंगन में दृग हुलसित छाजन

हृदय उल्लसित तो करे कौन उसका वाचन

गहन तरंगों में ध्वनि भ्रमित भ्रमर नीदिया

चांद पिघल तकिया संग झूमे, झिलमिल रतिया


सांखल खटकी द्वार की हिचकी पाहुन आए

ठग गई रात महक के कोरी खुद ही उफनाए

एक निपट सौ जुगत हार बैठीं सब नीतियां

चांद पिघल तकिया संग झूमे, झिलमिल रतिया


मन के कितने रंग, उमंग अबीर और गुलाल 

पुलकित भाव रंग संग कपोल रचित भाल

ताल नई कुछ चाल नई अभिनव ठाढ़ी कृतियाँ

चांद पिघल तकिया संग झूमे, झिलमिल रतिया।


धीरेन्द्र सिंह


25.03.2024

08.12

शुक्रवार, 22 मार्च 2024

भोर में

 भोर में खुलती हैं पलकें

हृदय में आपका स्पंदन

पलक फिर बंद होती हैं


प्रणय का होता है वंदन


सुनती आप हैं क्या निस

नेह का उन्मुक्त निबंधन

स्मरण आपकी, आदत अब

सुगंधित, शीतल सा चंदन


उदित होतीं हृदय में क्रमशः

निज आलोक का समंजन

आप से ही प्रकाशित हूँ

तरंगित आपसे है सब नंदन


कब से बिस्तर है मुग्धित

भोर करती आपका अंजन

चिड़िया चहचहाती आप सी

करवटें ढूंढती आपका आलंबन


जगाती रोज हैं मुझको ऐसे

जैसे भोर का आपसे बंधन

बदन में टूटन अनुभूतियां भी

आप ही आप का है गुंजन।


धीरेन्द्र सिंह

25.03.2024

04.39

गुरुवार, 21 मार्च 2024

नारी

 सघन हो गगन हो मनन हो

सहन हो समझ हो नमन हो


सदियों से प्रकृति में है बसेरा

देहरी के भीतर की हैं सवेरा

जीवन डगर पर भी चमन हो

सहन हो समझ हो नमन हो


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है नया

भारतीय संस्कृति में यह ना नया

नारी पर लेखन का क्यों चलन हो

सहज हो समझ हो नमन हो


अथक श्रमिक है परिवार की धूरी

आदि शक्ति वह ना कोई मजबूरी

बुद्धिमान, कीर्तिमान की अगन हो

सहज हो समझ हो नमन हो।


धीरेन्द्र सिंह

21.03.2024


20.05

बुधवार, 20 मार्च 2024

दिल दहल गया

 

प्यार का रूप देख जग दहल गया

कदम थे कोमल तूफान टहल गया

 

मीठी बातों में अपनत्व की झंकार

छत पर उन्मत्तता बहकी लगे बयार

व्योम का असीमित रंग विकल भया

कदम थे कोमल तूफान टहल गया

 

बच्चों की मासूमियत भरा हुआ प्यार

बालक की निर्मलता सी प्रीत फुहार

निर्मोही देह से ले दिल सकल गया

कदम थे कोमल तूफान टहल गया

 

प्यार के उमंग में था होली का तरंग


क्या पता था छत पर कटेगी पतंग

विश्वास कैसे प्यार मर्दन चपल किया

कदम थे कोमल तूफान टहल गया।

 

धीरेन्द्र सिंह

20.03.2024

20.08

गौरैया मेरी

 गौरैया दिवस 20 मार्च 2024 के लिए :-


मेरे घर मुंडेर ना कोमल छैयां

आती न मुंडेर अब वह गौरैया


ना दाना का मोह ना चाहे पानी

फुदकन नहीं उसकी है नादानी

घूम रही भटक अब ताल-तलैया

आती न मुंडेर अब वह गौरैया


मेरे मुंडेर पर थी फुदकन आजादी

था मैं बतियाता बिना किए मुनादी

किसी ने बहकाया कर ता-ता थैया

आती न मुंडेर अब वह गौरैया


गर्दन और आंखे थी कितनी चंचल

भोली थी सह


ज थी जैसे कलकल

समझ गई बहेलियों से घिरी है नैय्या

आती न मुंडेर अब वह गौरैया।


धीरेन्द्र सिंह

20.03.2024

12.53

मंगलवार, 19 मार्च 2024

वहीं से चले

 वहीं से उतर कहीं वाह हो गए

वहीं से चले थे वहीं राह हो गए


अकस्मात है या कि कोई बात है

अनुबंध है या वही जज्बात है

कदम थे भटके या राह खो गए

वहीं से चले फिर वहीं राह हो गए


कहीं से उतरना ना होता सहज

उतरती सहजता या कि समझ

उखड़ता कहां, गहन चाह बो गए

वहीं से चले फिर वहीं राह हो गए


पीटें कनस्तर कहें यह है ढोल

मन की धुन में मन के हैं बोल

बेफिक्री इतनी व्योम अथाह हो गए

कहीं से चले फिर वहीं राह हो गए


कहें भूल गए पर ना भुला जाता

हृदय कब तिरस्कारे जो मन भाया

खयालों में बंध सुप्त प्रवाह हो गए

वहीं से चले फिर वहीं राह हो गए।


धीरेन्द्र सिंह


19.03.2024

14.48

शोख रंग

 शोख रंग अब जाग रहे हैं

मन ही मन कुछ ताग रहे हैं

मौसम है कुछ कर जाने का

संग अभिलाषाएं भाग रहे हैं


अबीर-गुलाल कपोल से भाल

शेष रंग में निहित धमाल

मन अठखेली में पाग रहे हैं

संग अभिलाषाएं भाग रहे हैं


सुसंगत है यहां रंग बरजोरी

हैं रंग दृगन की कमजोरी

रंग शोख तुम्हें साज रहे हैं

संग अभिलाषाएं भाग रहे हैं


मन कुलांच लागे नहीं साँच

मन अपने को रहता माँज

रंग उमंग ही भाग्य रहे हैं

संग अभिलाषाएं भाग रहे हैं।


धीरेन्द्र सिंह

19.03.2024

04.37

शनिवार, 16 मार्च 2024

ना जाने

 ना जाने हम कैसे महकते रहे

चली राह वैसे हम चलते रहे

एक संगीत गूंजती थी मेरे साथ


अलमस्त गीतों को रचते रहे


मिली कुछ अदाएं जैसी फिजाएं

आँचल सी लहराती मोहक दिशाएं

जहां तक हवाएं बहकते रहे

अलमस्त गीतों को रचते रहे


प्रणय का विलय शब्द भाव किए

बहुत दूर हैं संग उनके ही जिए

तिरस्कार पाकर सुप्त जलते रहे

अलमस्त गीतों को रचते रहे


संग जी लिया उम्र को पी लिया

आसक्त था अनासक्त अब जिया

राह एकल ढलते उभरते रहे

अलमस्त गीतों को रचते रहे।


धीरेन्द्र सिंह

16.03.2024

2१.02

वह हैं कहते

 मुझे इन पलकों से अनुमति मिली है

अब वह हैं कहते कि सहमति नहीं है


नयन के विवादों से हुआ था समझौता

नत होकर पलकों ने दिया तब न्यौता

अधर स्मिति रचि मति गही है

अब वह हैं कहते कि सहमति नहीं है


फागुन के पाहुन की हो रही अगुवाई

प्रीत की झंकार निखार रही अंजुराई

चाहत की चौखट चमकती वहीं है

अब वह हैं कहते कि सहमति नहीं है


रंगों ने बाजार में ग़दर है मचाई

पर रंगने में उसकी है ढिठाई


“बुरा न मानो” रास्ता ही सही है

अब वह हैं कहते कि सहमति नहीं है।


धीरेन्द्र सिंह

16.03.2024

19.23

शोर

 बहकते रहो तुम भभकते रहो

शोर के भाव ले चहकते रहो


कुछ किताबें लिखी जो हो बतकही

विद्वता का पताका कही सो सही

मूल क्या है कभी ना लहकते गहो

शोर के भाव से चहकते रहो


यह ना समझें चालें हैं अज्ञात

विगत की धूरी से लेखन नात

धर्म ग्रंथ कथानक लिखते बहो

शोर के भाव से चहकते रहो


एक आकर वर्तनी सुधारने लगे

भाषा अज्ञानता को बखानते चले

भाषा भंगिमा संग यूं गमकते ढहो

शोर के भाव से चहकते रहो


फेसबुकिया मंडली के ओ शिल्पकार

कमेंट्स और लाइक के हो तलबगार

उड़ ना पाओगे ऐसे ही मंजते रहो

शोर के भाव से चहकते रहो।


धीरेन्द्र सिंह

16.03.2024

15.20

एक खयाल

 एक खयाल का कमाल 

आप ही का है धमाल 

स्पंदनों की चाँदनी है 

दूरियों का है मलाल 


तुम कहो क्यों सोच 

विगत का ही सवाल 

ऐसी सोच से ही 

हृदय करता है बवाल 


सुन रही हो रागिनी

स्वर का है मलाल 

सप्तक हतप्रभ खड़े हैं 

भटक गए हैं ताल 


चलो एकराग अब बनें

गति हो सुगम द्रुतताल 

समन्वय ही राह जीवम

तुम सदा हो दृगभाल। 


धीरेन्द्र सिंह 

15.03.2024 

22.36

खोजते ही रहे

 कहाँ किसकी कब लगी यह दुआ 

कथानक अचानक नियामक हुआ


जो सोचा उसे खोजते ही रहे 

लोग ऐसे मिले रोकते ही रहे 

अब किसने हौले मन को छुआ

कथानक अचानक नियामक हुआ 


शब्द प्रारब्ध से हो रहा स्तब्ध 

भाव भी क्रमशः होते रहे ध्वस्त  

दिल रहा बोलता लगी है बददुआ 

कथानक अचानक नियामक हुआ 


सहजता सरलता सत्यता का सम्मान 

करे अभिव्यक्त जीवन के आसमान 

तापमान स्थिर शेष गया बन धुआं 

कथानक अचानक नियामक हुआ। 


धीरेन्द्र सिंह 

15.03.2024

14.48