मंगलवार, 9 जनवरी 2024

विश्व हिंदी दिवस

 हिंदी विश्व दिवस

कौन मनाता सहर्ष

कागज का यह घोड़ा

हिंदी का कहां उत्कर्ष


एक शोर अनर्गल

कहता है चल

भाषा भाग्य विधाता

भाषा पर मचल


मोबाइल संचालन में

प्रौद्योगिकी आंगन में

सिर्फ जुड़ा बाजार

शेष आंग्ल छाजन में


कठिन है जगाना

अर्थ किसने जाना

योग्यता का क्या

जिससे न मिले खाना


हिंदी विश्व दिवस

मिले तुझे सुयश

अर्थ मिले अपार

मिले ना अपयश।



धीरेन्द्र सिंह

10.01.2024

12.52

सहन की महारानी

 हथेलियों की अंगुलियां उलझाना चाहता हूँ

तुम्हारे दर्द को मैं यूं पहचानना चाहता हूँ


बहुत हो छिपाती तुम अपनी कहानी

खुशियां लपेटे सहन की ऐ महारानी

तुम्हें तुमको तुमसे आजमाना चाहता हूँ

तुम्हाडे दर्द को मैं यूं पहचानना चाहता हूँ


जब भी करूं प्रश्न देती हो मुस्करा

अदा से कह देती मुझसा न मसखरा

राज दिल के तुम्हारे मांजना चाहता हूँ

तुम्हारे दर्द को मैं यूं पहचानना चाहता हूँ


बड़ी ढीठ हो कहते-कहते रुक जाती

धुआं फैल जाता न जलती है बाती

दिए मन के तुम्हारे लौ सुहाना चाहता हूँ

तुम्हारे दर्द को मैं यूं पहचानना चाहता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

10.01.2024


06.14

चली गई

 कौन जाने कौन सी बला टल सी गई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई


सुबह होते ही व्हाट्सएप पर झंकार

प्रीतमयी संवेदना का आदर सत्कार

नित नए अंदाज चाहे बातें भी नई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई


मैंने नहीं मेरे घर ने भी दिया दुत्कार

हिम्मती थी वह प्रतिदिन की अभिसार

चेतना में वेदना की संवेदना लड़ी गई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई


वर्ष तक किया उसकी चंचलता पर वार

इधर-उधर फुदकने से मानी ना हार

एक संग कई को घुमाती गली गई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई


अब मस्तिष्क मुक्त सजाए निस सर्जनाएं

साहित्य में घटित वही भाव लिखते जाएं

पकड़ ली, जकड़ ली लहर थी डंस गई

भाग्य का सहारा था एकदिन चली गई।


धीरेन्द्र सिंह

09.01.2024


18.56