रविवार, 27 सितंबर 2026

एक तिनका

जलधारा, जीवनधारा
प्रकृति जीव आधारा
संगृहित भाव जगे
सुदूर से कोई पुकारा






भावनाओं की सरणी
कामनाएं जल सकारा
किसका वेग प्रबल है
तट किनारे प्रवाह ललकारा

हे नदी तू सखी
हम दोनों की धारा
दोनों प्रवाहित युगों सदी
मनुष्यता को है संवारा

आज मन विचलित लगे
प्रणय ने है हुंकारा
एक तिनका उनके मन का
सहेज मुझे दे जलधारा।

धीरेन्द्र सिंह
28.09.2026
10.10

उम्र का ढक्कन

प्रणय की लौ पर उम्र का ढक्कन लगा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है



लौ न बुझती उम्र दहकता बहकता बेचैन
पौ न फटती प्रीत की उमड़ते घुमड़ते नैन
कौन बांधा प्रीत सरणी सांस में यौवन बंधा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है

कह रहे उम्र बड़ी पूजा-पाठ भजन की घड़ी
चेतनाएं चुलबुली हो चाहती लगन की अड़ी
प्यार में ईश्वर नहीं क्या भक्ति का दोहन लगा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है

अंकल आंटी, दादा-दादी सुदूर की जैसे घाटी
जीवन हलचल मुक्त हुए सन्यास की है परिपाटी
हृदय उम्र से दूर लपक-लचक धुन अगन मचा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है।

धीरेन्द्र सिंह
28.09.2026
07.02