जलधारा, जीवनधारा
प्रकृति जीव आधारा
संगृहित भाव जगे
सुदूर से कोई पुकारा
भावनाओं की सरणी
कामनाएं जल सकारा
किसका वेग प्रबल है
तट किनारे प्रवाह ललकारा
हे नदी तू सखी
हम दोनों की धारा
दोनों प्रवाहित युगों सदी
मनुष्यता को है संवारा
आज मन विचलित लगे
प्रणय ने है हुंकारा
एक तिनका उनके मन का
सहेज मुझे दे जलधारा।
धीरेन्द्र सिंह
28.09.2026
10.10