शनिवार, 12 जून 2021

गीत लिखे

गीत लिखो कोई भाव सरणी बहे
मन की अदाओं को वैतरणी मिले
यह क्या कि तर्क से जिंदगी कस रहे
धड़कनों से राग कोई वरणी मिले

अतुकांत लिखने में फिसलने का डर
तर्कों से इंसानियत के पिघलने का डर
गीत एक तरन्नुम हम_तुम का सिलसिले
नाजुक खयालों में फूलों के नव काफिले

एक प्रश्न करती है फिर प्रश्न नए भरती
अतुकांत रचनाएं भी गीतों से संवरती
विवाद नहीं मनोभावों में अंदाज खिलमिले
गीत अब मिलते कहां अतुकान्त में गिले।

धीरेन्द्र सिंह

8 टिप्‍पणियां:

  1. अब ज़िन्दगी में गिले ही गिले तो रह गए फिर गीत कैसे मिलें ?

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  2. आपकी लिखी  रचना  सोमवार 14  जून   2021 को साझा की गई है ,
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।संगीता स्वरूप 

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  3. अतुकांत रचनाएं भी गीतों से संवरती

    –सत्य कथन

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  4. वक़्क़ह बहुत ही सुंदर आदरणीय

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  5. भावों की अवरुद्ध हुई नलिकाएँ
    झर गयी असमय नवकलिकाएँ
    तुकांत-अतुकांत के प्रश्न हैं गौण
    मुरझाये मन से कैसे गीत लिखे?
    -----
    क्षमा चाहे़गे आदरणीय आपकी रचना पर कुछ पंक्तियाँ अनायास ही फूट पड़ी।
    आपकी रचना बहुत अच्छी लगी।
    सादर।

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