शनिवार, 6 जून 2026

धुन

आज में डूबकर उम्र जीते रहें

अपनी धुन में ही रहा कीजिए
मुग्ध होकर कई सुन रहें आपको
जैसे कहते हैं अक्सर कहा कीजिए




क्यों चुपचाप हैं बोलते पदचाप हैं
सुननेवाले कहें भाव बहा दीजिए
मिलते पागल भी हैं जिंदगी में बहुत
शब्द की चांदनी को गढ़ा कीजिए

जिससे टूटे हैं वह रह गए हैं कहीं
जख्म सूखे पल्लवन हरा कीजिए
हो रही है घुटन लंबी खामोशी से
नज़्म टूटे हुए हैं दवा दीजिए

आपकी खातिर लिख रहा है हृदय
स्वर में अपने इसे गुनगुना लीजिए
शब्द की बानगी को धुन तो दीजिए
फिर आपकी मर्जी जितनी सजा दीजिए।

धीरेन्द्र सिंह
07.06.2026
08.25


शुक्रवार, 5 जून 2026

तथ्य

तथ्य मैला हो रहा है
सत्य बना है अनुभागी
कथ्य की सीमाएं निर्धारित
जीवन लगता बैरागी







न्यायालय की ओर बढ़ें
अधिवक्ता हैं विधि रागी
भोर चाँद उदय प्रमाणित
सूर्य रात्रि गति साधी

प्रजातंत्र का मंत्र लगे टूटा
जनतंत्र बन रहा खुराफाती
भ्रष्टाचार आचार बन रहा
जमुना हों या जुमेराती

कौन रचा ऐसा समाज
जहां देखें वहां प्रतिवादी
अन्तरघर्षण बना आकर्षण
बिन दूल्हे के बाराती।

धीरेन्द्र सिंह
06.06.2026
07.05


बुधवार, 3 जून 2026

ब्लॉक भ्रम

याद आने के लिए अनुमति जरूरी नहीं

ब्लॉक करके भी क्या ब्लॉक कर पाएंगे
झोंका हवा का जहां चाहे पहुंच जाता है
इस पहुंच से भला कब तक दूर जाएंगे

अपनी करवटों में लिए कुनमुनाती बेचैनियां
अपनी हरकतों में कितना छुपा पाएंगे
छुपाने से भला कब तक छुपा पाया कोई
मुहाने तक पहुंचने को चुपचाप धाएंगे

मन गगन में दहन है अनमन तड़पन कहे
आग मद्धम ना बुझे सुनिए जल जाएंगे
महकती रिमझिम सावन का है आमंत्रण
जो जिए संग वह तरंग रह उमंग जिलाएंगे

ब्लॉक एक भ्रम है क्रम में है यह चलन
किशोर मानसिकता में भाव उलझाएंगे
टूटकर भी जुड़ जाते हैं बादल छंट जाते
अंधियारे जग में कितने जुगनु लुभाएंगे।

धीरेन्द्र सिंह
04.06.2026
12.17