रविवार, 24 मई 2026

मचलता प्यार

जीवन एक नैया और यह उम्र है पतवार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

नैया में पतवार का है ना कोई भी एतबार
धोखा भी बहुत देता है हथेलियों का प्यार
दायित्व एक है उलझाता-सुलझाता खुमार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

मन की सुने कि समाज के विभिन्न विचार
सतर्कता में जीता व्यक्ति भी हो जाता लाचार
प्रवाह है एक जीवन बदलते संतुलन आधार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

दायित्व के दहन में मनन सघन सभी करें
निजत्व के भवन में घनन दमन सभी करें
एक प्यार ही है ऊर्जा जिसके रंगढंग हजार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार।

धीरेन्द्र सिंह
25.05.2026
05.45

शुक्रवार, 22 मई 2026

बरकत अरोड़ा

बरकत अरोड़ा
एक नन्हीं परी
न जाने कहाँ से
है वह नृत्य भरी

रात्रि के 0.44 पर
लेखन चल पल घड़ी
प्रतिभा रोमांचित की
वरना मुझे क्या पड़ी

बालिका ईश्वर प्रदत्त गुण
हाव-भाव समाए खड़ी
संगीत बजे पैर चले
थम जाए सब घड़ी

अब और क्या लिखूं
वह अद्भुत अनंत कड़ी
कैसे निभाती वयस्क भाव
वीडियो है एक कड़ी।

धीरेन्द्र सिंह
23.05.2026
0.51

गुरुवार, 21 मई 2026

बदन की मस्तियाँ

खिल उठती हैं सूर्य सी नर्म रश्मियां
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ



कल्पनाओं की मंथर गति किल्लोल
धड़कनों में उभरते हैं नए मीठे बोल
लिख देता हूँ भावनाओं की गश्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ

कितना स्वाभाविक लगे अलसाया बदन
चाँद-तारे नहीं बस मैं और अकेला गगन
बहुत कुछ छिपा लेता बदन पाकर चुस्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ

निढाल सोई सोचती होंगी उठती हूँ
आपकी कामनाएं भी बहकती होंगी
एक अंगड़ाई में चल पड़ें दिन कश्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ।

धीरेन्द्र सिंह
22.05.2026
05.45



बुधवार, 20 मई 2026

मेलोडी

दो राष्ट्र प्रतिनिधियों की है हंसी ठिठोली
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

कूटनीति में अवसर के जुड़ते हैं अध्याय
राष्ट्रशक्ति हो सक्षम मुड़ते युक्ति निभाय
अनचीन्हे इस अभिवव पल में दो जोगी
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

वैचारिक जुड़ाव हो तो हर पल मुस्कराता
बौद्धिक नई बयार हो तो अद्भुत घट जाता
वर्षों की समरसता से आया पल है संयोगी
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

इटली की मेलोनी और भारत के हैं मोदी
विश्व में खिलकर चर्चा है, चॉकलेट बोधी
उन्नत सोच भारतीय उत्पाद जुड़ी विश्व बोली
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी।

धीरेन्द्र सिंह
21.05.2026
05.46

मंगलवार, 19 मई 2026

आपबीती


आपबीती इस कदर है
खुद को नहीं खबर है
बीत गया दौर वह भी
मन मचाता भी ग़दर है






जो सोचा ना मिला वह
जो मिला किसकी नजर है
कर्म अब तक लड़ रहा
भाग्य ही असली डगर है






स्वयं खंडित पर है मंडित
स्तंभित पूरा शहर है
है बहादुर जाए कहां दूर
कष्टमय लगता सफर है






जी रहे हैं लोग ऐसे
जीवन का ऐसा असर है
चाह कुछ होती नहीं है
जीता वही जिसमें सबर है।







धीरेन्द्र सिंह
20.05.2026
07.02




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रविवार, 17 मई 2026

चाँद बांटिए

चंद लोगों में अक्सर चाँद को बाँटिए
दिल की बेचैनियों को जगह चाहिए
आप यहां-वहां से उठा कहा कीजिए
जिंदादिली की भी कोई वजह चाहिए

मन है मुस्कराता सोचकर बातें नई
मुस्कराने के लिए भी तो लगन चाहिए
दिल यह चाहता है क्या चाहत न समझती
जिंदगी भी है कैसी क्या-क्या न चाहिए

मन है दौड़ता तौलता ऊंच-नीच की बातें
कसक यह है कि कोई तो दहन चाहिए
सब दौड़ते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी
सबको अपने रंग का गगन ही चाहिए

खूब कोशिशें होतीं पटाखे-फुलझडियाँ भी
मन है चाहता उत्सव हंसी-ठिठोली चाहिए
हैं जो सयाने चुपचाप किल्लोल में डूबे
सघन प्रयास औरों का है मनटोली चाहिए।

धीरेन्द्र सिंह
18.05.2026
09.11

शनिवार, 16 मई 2026

कुछ छूट रहा

एक मुस्कराती जिंदगी, कमाल है
एक गुनगुनाती जिंदगी, धमाल है
आपके शब्दों में है नटखट शरारत
एक सुगबुगाती रागिनी का ताल है

जी मचल जाता शोखियाँ जताएं शब्द
फब्तियाँ भी मिलती जैसे बेताल हैं
हर तरह के लोग समरसता चाहते
समूह में समूह रचता लिए भूचाल है

कुछ भी लिखना कुछ भी कहना
परिभाषाएं अपनी और अपना गाल है
शब्द द्वारा व्यक्ति को पढ़ने का मजा और
व्यक्ति सोचता वही चतुर दिव्य भाल है

मन बांट देता है टोकरी के फल जैसे
श्रेणियां बनती खुद अनुभव चाल है
कितना भी छुपाए छुप सकता नहीं
कुछ छूट रहा है कुछ का मलाल है।

धीरेन्द्र सिंह
17.052026
06.35

माटी 9

 माटी 9 के प्रमुख मद

1. पंजीकरण व्यवस्थित था।

2. बैठने की व्यवस्था अच्छी थी।

3.रिकोर्डिन्द फोटोग्राफी अच्छी थी।

4. मंच के आरंभ में जिस पुरुष ने आरम्भ किया वह ठीक नहीं था। न कोई भूमिका न किसी प्रकार की पार्श्वभूमि बस बोलना वह भी तेज थोड़ी कर्कश आवाज।

5. महिला ने कवि सम्मेलन का आरंभिक चर्चा ठीक किन किंतु जल्द चली गईं। प्रभाव जो जमा सकती थीं नहीं हो सका।

6. जगदंबिका पाल और कृपाशंकर सिंह नेता के इर्द-गॉर्ड भीड़ बातें कर रही थी और मंच पर मुशायरा चल रहा था।

7. एक भी कवि अपना प्रभाव नहीं छोड़ सका न श्रोताओं से जुड़ सका। मुशायरा के अध्यक्ष ने रामायण पर अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए रामायण को कहानी बतलाया जो आपत्तिजनक था।

8. सच्चिदानंद काशी पर कम और अपनी पत्नी मालविका की चर्चा अधिक किए। काशी पर दो मिनट भी नहीं बोल पाए। सच्चिदानंद अपनी पुस्तक का लेख पढ़ रहे थे जो श्रोतागण में यह उत्सुकता नहीं जगा पाया कि ललक उत्पन्न हो। संस्मरण सुना रहे थे जो विषय के अनुरूप नहीं था।

9. सच्चिदानंद राजन-साजन मिश्र का काशी पर गीत की दो पंक्तियाँ गाये जो अच्छा प्रभाव डाला।

10. महिला ने अपने संचालन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हुए मालिनी अवस्थी का स्वागत किया।

11. 6.30 शाम को पुरुष संचालक ने अपना ड्रेस बदल कर अच्छी वेशभूषा में हो गया। मालिनी अवस्थी का गाना चल रहा था। पुलिस के बड़े अधिकारी आ-जा रहे थे। मुख्यमंत्री के आगमन का समय हो रहा था।

12. संचालिका जो बुंदेलखंड की थीं उन्होंने संचालन का अनुपम कौशल का प्रदर्शन किया। मालिनी अवस्थी के गायन समापन के बाद मुख्य मंत्री के आगमन में लगनेवाले समय में मंच से कुछ देर तक बातें की फिर मंच से नीचे उतरकर श्रोताओं संग संवाद उनके गायन आदि की सहभागिता सम्मिलित की।

13. राजनेताओं की तथा पुलिसकर्मियों की मुख्य मंत्री की अगवानी की मुस्तैदी और व्यस्तता को देखने के बाद बाहर निकल विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर वाहन की प्रतीक्षा करने लगा। इसी दौरान मुख्यमंत्री का काफिला आता दिखा और आगे एक मोटरसाइकिल संग कुल पांच कारें गुजरी। वहां मुस्तैद एक पुलिसकर्मी ने कहा कि काफिला में कम गाड़ियां हैं।

14. मुख्यमंत्री के आने के पहले रात्रि 8 बजे सभागार से बाहर निकल गया।


बुधवार, 13 मई 2026

चाह सूरज

गूंजा आपका तराना है
भोर भाव मनमाना है
मोबाइल से नहीं  बातें
बस लिख गुनगुनाना है

कैसे आंख खुली तड़के
चाह का मन दीवाना है
पढ़ेंगी या ना पढ़ेंगी यह
सिवाय लिखने भरमाना है

भोर की सोच होती सच
शोर मन में अनजाना है
आज क्या कुछ अलग है
आह का जो फड़फड़ाना है

आज यह भोर चितचोर
मन का शोर जगमगाना है
एक ऊर्जा सी कौंध जाती
चाह सूरज सा उग जाना है।

धीरेन्द्र सिंह
14.05.2026
05.01


मंगलवार, 12 मई 2026

लेखन

देश, धर्म, संस्कृति पर रचना लिखिए
एक समूह जागरूक का अनुरोध था
पढ़कर अनुरोध चिंतन उसपर किया
रामायण, श्रीमदभगवतगीता की कथा

राष्ट्र की विभिन्न परम्पराएं हैं अनमोल
जो विगत इतिहास नहीं एक दर्पण था
सत्य के तथ्य को कथ्य में पिरोया गया
धूल में अटा दर्पण रह-रह चमक व्यथा

नींव सशक्त है निर्माण नया तो कीजिए
देश, धर्म, संस्कृति सांस में है सबके मथा
राम सा चरित्र कहां कृष्ण सी कहां कूटनीति
पीढ़ी के संचित मार्गदर्शन क्या मात्र कथा

लेखन कौशल है तो कलम योद्धा बन जाईए
समाज वही जीवित वर्तमान जिसने है मथा
नए अस्त्र-शस्त्र हैं नई हैं कई युद्धनीतियाँ
शौर्य-शक्ति जीवंत मात्र संयुक्त हों सखी-सखा

मेरा लेखन एक प्रहार है नहीं कोई चित्रहार
भावनाओं का जैविक युद्ध आज से है नधा
आपके सुझाव का आदर है प्रेरणा हैं दिए
भाषा का मूल योद्धा हूँ देश, संस्कृति में रचा।

धीरेन्द्र सिंह
13.05.2026
08.18


शनिवार, 9 मई 2026

माहेरवाशी

 "माहेरवाशी" कल्पना का गुणगान करूँगा

समाज भी सरकार है सम्मान करूँगा


श्रीकांत भारतीय, डॉ श्रेया भारतीय की सोच

अखिलेश चौबे, वेदिका संग 214 की फौज

नई सोच अभिनव कर्म प्रसारित जहान करूँगा

समाज भी सरकार है सम्मान करूँगा।



धीरेन्द्र सिंह

10.05.2026

10.05

मनमर्जियाँ

मनोभाव की होती हैं नित कितनी सरगर्मियां
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ

टुकड़े-टुकड़े, गिरते-पड़ते कुछ भाव कह दिए
सामनेवाला कितना समझा उतने में रह लिए
होती जो बारिश की झूमती बूंदों सी खुदगर्जियाँ
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ

कुछ कह दिए कुछ रोक लिए रोज ऐसा होता
उगता नहीं हमेशा भाव बीज जैसा है बोता
तोता सा वही रट अटक-मटक-झटक अर्जियां
निभाव में हो पाती है  कितनी सी मनमर्जियाँ

व्यक्तिगत जीवन हो या किसी समूह की धरती
मनोभाव कितने बरसे पर लगे धरती है परती
डुबो न संग किसी गहरे भाव सागर में दरमियां
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ।

धीरेन्द्र सिंह
10.05.2026
06.53


गुरुवार, 7 मई 2026

समूह पुकार

 पोस्ट आपकी महत्वपूर्ण लिए सरोकार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार

आपकी सोच अच्छी भाव में हैं नवीनता
आपका लेखन अभिनव लिए प्रवीणता
कुछ लोग तो करते आपकी रचना सत्कार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार

अन्य पोस्ट भी चाहें आपका भी प्रोत्साहन
एक लाइक या टिप्पणी देती नवीन मनन
जुड़िए न समूह से करते प्रसारित सुविचार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार

क्या समूह दायित्व संवाहक एडमिन, मॉडरेटर
सदस्य भी तो हैं समूह के दीप्तिमान दिवाकर
यह सलाह नही हिंदी समूह का विनीत पुकार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार।


धीरेन्द्र सिंह
07.04.2026
21.07

बुधवार, 6 मई 2026

विवाह

कुछ भावना कुछ सामाजिक चलन प्रवाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह

जो कहते खुशियों भरी है वैवाहिक जिंदगी
वह डरते यह कहने में झेले हैं जो शर्मिंदगी
आरम्भ गर्मजोशी से फिर अदृश्य सोई दाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह

सामाजिक बंधनों का है दबाव प्रखर जोड़
दिखावा प्रदर्शन खूब भीतर रोज रिश्ते तोड़
एक-दूजे से उदासीनता निकलती मुई आह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह

जो खींच रहे बलभर वह हैं साथ चलन क्रम
हर मोड़ पर उभरता है शंका लिए नया भ्रम
विवाहेत्तर संबंधों में हैं अभी भी छुईमुई पनाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह।

धीरेन्द्र सिंह
06.04.2026
14.05


मंगलवार, 5 मई 2026

पोस्ट

दिखती कम मौलिकता नकल का है ताना-बाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना

हर सामान्य पोस्ट में दिखे यौवन की ही लयकारी
यौवन कहां है न दिखता लगे यथार्थ से है पर्देदारी
चापलूसी उथले मजाक से संभव है क्या जीत जाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना

कॉपी-पेस्ट का बढ़ते चलन में पोस्ट का पुनरावर्तन
मौलिक लेखक का नाम मिटा उसपर करते कई नर्तन
जैसा है वैसा नहीं दिखते कैसे लोगों का यह जमाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना

अधिकांश पोस्ट लगती वासना की कुंठा वर्जनाएं
बस सेक्स ही है जीवन जीव सेक्स में हैं भरमाए
प्यार सहज सेक्स उपज हर हृदय का है ताना-बाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना।

धीरेन्द्र सिंह
06.05.2026
06.01


शनिवार, 2 मई 2026

वेदनाएं

छूकर कह रही हैं यह आपकी चेतनाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेंगी न वेदनाएं

शब्दों में सिमटकर मनोभाव चल पड़े
अर्थों में बिखरकर सद्भाव निकल पड़े
क्या हुआ, कैसे हुआ यह समझ न पाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं

चौरंगी मन में चतुर्भज है कंपित चेतना
मन आपका न छू लूँ संशय हो तो देखना
संपर्क में होती हैं निर्मित अचानक कामनाएं
हंसिए,खिलखिलाईये घटेगी न वेदनाएं

कब हो सका चलती रहे अपनी मनमर्जियाँ
दूसरी आफत प्रणय की आती रहती अर्जियां
छोड़िए जग की बातें क्या है सोच तो बताएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं।

धीरेन्द्र सिंह
03.05.2026
06.25

शुक्रवार, 1 मई 2026

धक-धक

धक-धक, धीरे-धीरे, साथ-साथ, कुछ-कुछ
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस, सचमुच


आप कई आवरण के प्रकरण परे हैं विद्यमान
थाप जिंदगी के कई आवरण धरे हैं निदान
मति-मति, दौड़े-दौड़े, आस-आस, हँसमुख
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस सचमुच


यथार्थ के विचार में आपका ही नित संचार
परमार्थ है स्वीकार जाप का ही मीत प्रकार
रचि-रचि, हौले-हौले, खास-खास, अभिमुख
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच


क्रिया की प्रतिक्रिया में सक्रिय है भाव क्रिया
दिया है मन में जला विनयी है चाह प्रिया
सखि-सखि, तौले-मोले, रास-रास गुपचुप
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच।


धीरेन्द्र सिंह
02.04.2026
09.49

खामोश आंधियां

नयन की नयन से सुगंधित शरारत
मुस्कराहट में आपको मिली महारत
जुल्फ गर्दन की अठखेलियाँ भी हों
वाचाल उभरती जाए सुगंधित इबारत

शिष्ट, शालीन, व्यक्तित्व करता है मोहित
प्रभाव ऐसा हो लयबद्ध सी थरथराहट
गीत बन जाती है निहारती यह दुनिया
स्वर दें आप उसे उभरे मीठी छटपटाहट

हृदय के पंख पर बिठाकर आपको उडें
गगन कर नमन दर्शाता रंगों की महारत
आपके रंग देख मेघ भी एकटक हो तकें
नशीले रंगों की स्वामिनी फाग सी शरारत

कुशलता से छिपा लेती अपने सारे बवंडर
उड़ता जाता है परिवेश करती जाती आहत
समझने के प्रयास में होते जाते सब बदहवास
आप खामोश आंधियों में उड़ाती हैं चाहत।


धीरेन्द्र सिंह
02.05.2026
05.36


गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

मजदूर दिवस

मजदूर दिवस है ना होइए मगरूर
भारत है निर्माता विभिन्न्न से मजदूर

पसीना बहानेवाले ही लगते हैं श्रमिक
पढ़े-लिखे भी मजदूर कर मौलिकता शमित
भारत श्रमिकों का निर्यातक है मशहूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर

आई टी का बोलबाला सब पढ़ते प्रौद्योगिकी
पूर्ण कर यह शिक्षा सेवा प्रदाता की लायिकी
कम्प्यूटर की गैर भाषा न अपना सर्च इंजन नूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर

हम विश्व के श्रेष्ठ एक शिक्षित मजदूर
मजदूर दिवस आज भी रहा हमें घूर
बहुसंख्य विदेशों में हैं जाने को प्रणपूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर।


धीरेन्द्र सिंह
01.05.2026
08.02

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

जीवन

 उम्र तन्मय हो गया है आस का उन्माद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद

आर्थिक आजादी ही सर्वप्रमुख अभियान
स्वार्थ सिद्ध के खातिर करते हैं गुणगान
जीवन ऊर्जा सूख रही मिले न पानी खाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद

देह तलक ही नेह है नखशिख सौंदर्य
भौतिकता में उलझे ना आत्मिक सौकर्य
नेह डगरिया नहीं गगरिया मन पनघट नाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद

उम्र गुजरती राह बदलती और बदले चाल
आज सुन रहे कल बदलती उम्र अपनी ताल
पकड़-धकड़ कर उम्र को रोकें यौवन विवाद
जीवन झंझावात है कहाँ मधुर संवाद।

धीरेन्द्र सिंह
30.04.2026
08.27

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

आप

आप इस दिल की जिंदगानी हैं

प्यार की हम भी एक कहानी हैं

आपकी हलचलें खामोश हो रहीं

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं


गहन गहराई में भाव तुरपाई करें

अदृश्य देह आत्मा की रवानी है

आप हर बार हवा सा छू रहे हैं

ऐसा लगता हम उबलते पानी है


कहां से राह चली और शाम ढली

जिंदगी हतप्रभ सी अनजानी है

आज भी आस प्यास साँसों में

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं


आपकी ऊष्मा आपकी ऊर्जा है

एक गति मति में संगती ठानी है

प्यार के गुबार में आपका बुखार

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं।


धीरेन्द्र सिंह

29.04.2026

05.56

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

गर्मी

 मौसम आक्रामक नहीं कहीं है नर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी



घर से बाहर सूर्य प्रखरता से मिलता है
पसीने में मजदूर निडरता से चलता है
धरा की उष्णता गुम्बद में फंसी चर्खी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी

आग बरस रही श्रमिक को लगे है फाग
तरबतर पसीने से भींगा सजाता है आज
हमेशा मौसम न रहा जिजीविषा धर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी

सतत संघर्ष में निहित मानवता का उत्कर्ष
जूझते जीवन से उन्हें क्या मौसम का विमर्श
मौसम प्रणय करता कभी चुहल बेशर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी।

धीरेन्द्र सिंह
28.04.2026
08.45

रविवार, 26 अप्रैल 2026

प्रबुद्ध

प्रबुद्ध हैं तो सर्वत्र ज्ञान बांटिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तंत्र संज्ञान बांटिए

संज्ञान उत्तर प्रदेश गृहित शब्द है
विकासशील राज्य का जनित प्रारब्ध है
धर्म और राजनीति यहां जांचिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए

थार के गुबार में लिप्त लगता व्यवहार
संशय में उबरता सूर्यरश्मि सा त्यौहार
विस्थापन यहां विवशता कागज पर नापिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए

इतर राज्य-राष्ट्र में दीप्तिमान हैं रहिवासी
नोएडा, लखनऊ, अयोध्या आदि काशी
संज्ञान विज्ञान है तबियत से तो झांकिए
निबद्ध हैंबतो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए।


धीरेन्द्र सिंह
27.04.2026
09.14

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

उलझन

अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना



कश्तियाँ दोनों की मगन साथ-साथ थीं
हस्तियां अपनी भी सबरंग बेहिसाब थीं
कुतर दिया समाज ने जुड़ाव दे पैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना







अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व
अपने को देखे या सहेजे तीरे अस्तित्व
टपक रहे हैं भाव पर मुस्कराहट के छैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना






क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया
महल की बात करे जीर्ण हो रही कुटिया
प्यार अवसर है स्नेह सुप्त ताल की मैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना।







धीरेन्द्र सिंह
26.04.2026
10.24

गजब लिखते हैं

 
गजब लिखते हैं सरकार जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

भावनाओं की हो पल्लवित फुनगिया
कामनाएं खिलें लेकर विचार दुनिया
अभिव्यक्तियाँ जैसे हवन विचार घी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

मेरे हर लेखन की ऊर्जा हैं पाठक
सबकी अपनी शैली लेखन जातक
पाठक-पाठिका रचना रत्नहार जिय
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

यह रचना प्रतिक्रिया का प्रभाव
प्रतिक्रिया मस्तक रखना स्वभाव
आप महत्वपूर्ण सत्कार करे जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी।

धीरेन्द्र सिंह
25.04.2026
21.52



शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

देह मिलन

देह से देह मिलन भी एक जतरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

कितनी देह करती नित अपनी पूजा
स्वयं का श्रृंगार का आधार नहीं दूजा
स्वयं सुशोभित सज्जित नहीं नखरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

साहित्य यह पक्ष प्रखर दर्शाता नहीं
ऐसा लगे प्रचुर श्रृंगार इसे भाता नहीं
प्रणय तो पूजा है प्रकृति में पसरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

दूर से लगता आकर्षण अति चुम्बकीय
नयन लहक उठे महक उठे चहक हिय
घटाएं घिर आएं बदन लगे कि बदरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है।

धीरेन्द्र सिंगज
25.04.2026
11.15


शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

व्यक्ति

इतना रीता भी नहीं कि

ढूंढू व्यक्ति करने को बात

इतना भरा भी नहीं कि

कर सकूं अनदेखा जज्बात


मन की कूंची है तत्पर

बहुरंगी भावनाओं की सौगात


रविवार, 22 मार्च 2026

उम्र

 उम्र मुझसे मांगती है सरसराती रीति

अन्य प्रपंच ना भाए प्रणय जीवन गीत

कब कहां चूका रीता सा है लगता कहाँ

तार झंकृत हैं सभी सुप्त आपका प्रतीत


तार के कसाव का कौशल यदि छूटे

भरभराती सी लगे चट्टान निर्मित भीत

वर्तमान के सरगम में नवीनताएँ अनेक

क्या मिलेगा सोचकर कैसा था अतीत


भावनाएं पक जाने पर बदल देती रूप

सुगंध, मिठास, अहसास रहते वैसे मीत

उम्र एक बदलाव है रूप, रंग, तरंग का

रुनझुन मादकता ना बदले माथा ना पीट।


धीरेन्द्र सिंह

23.03.2026

09.12

शनिवार, 21 मार्च 2026

सत्य

 सत्य क्या है सांझ सरल अरुणाई

रात्रि लगे तिमिर किसी को तरुणाई

भाव सहित दृष्टि की बहती सर्जना

जग की विविधता चेतना की परछाईं


महत्व का घनत्व है अपनत्व सघन

गगन का दहन है तपन की रुसवाई

आकर्षण कर घर्षण करता विकर्षण

बदन बहुरंगी अतरंगी द्रवित चतुराई


कामना के पर्व में योजना स्व सर्व

याचना भी रचना करे जैसे पुरवाई

मोह के खोह में देह लगे अति सुबोध

अभिलाषाएं फूट पड़ें वासंती अमराई।


धीरेन्द्र सिंह

22.03.2026

08.12

गोवा

 गोवा

एक संस्कृति

एक सभ्यता

मानवता का

अभिव्यक्ति का

स्वतंत्रता का,


सागत के तट

विशिष्ट पहचान

लिए अपना आसमान

विविध विधान

नए मूल्य विज्ञान

चेतना के,


यहां व्यक्तित्व निर्द्वंद्व

स्वयं को अभिव्यक्त करता

नहीं परतंत्र

यौवन चहुंओर पसरा

भावनाओं का गणतंत्र

स्वयं की सेवा

गोवा,


मदिरा, मैथुन, मनोकामना

कल्पना का यथार्थ सामना

परिधान में परिणय

परिणय में विधान

जीव का सत्य से सामना

उर मेवा

गोवा,


सहज सुविज्ञ बन आइए

स्वयं को स्वयं से छाईए

अंतर्चेतना प्रज्वलित हो

अभिव्यक्त अपने गाइए

आत्मसेवा

गोवा।


धीरेन्द्र सिंह

21.03.2026

21.46


शनिवार, 7 मार्च 2026

नारी

शिव और शक्ति

नारी है भक्ति


सुदृढ, सक्षम, सुकोमल

संरचना की शतदल

युगनिर्माण साक्षी

नारी ही भक्ति


सनातन का आधार

नारी शक्ति प्रकार

आरोहण आसक्ति

नारी ही भक्ति


सांस-सांस नारी रूप

आस-साथ नारी धूप

नारी वैभव, मुक्ति

नारी ही भक्ति


अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष

ध्यानाकर्षण हो सहर्ष

नारी नहीं युक्ति

नारी ही भक्ति 🙏


धीरेन्द्र सिंह

11.18

08.03.2026

लाइक

 रचनाओं को

निरंतर लाइक करना

सम्मान है

रचना और रचनाकार का,

रचनाकार का दायित्व है

लाइक करनेवाले को देना

धन्यवाद

पर कैसे?

लाइक कर्ता के

इनबॉक्स में जाकर

धन्यवाद ज्ञापन

आभार है,

यह प्रणाली

लाइक को नमस्कार है।


धीरेन्द्र सिंह

10.57

08.03.2026

तलहटी

तलहटी से उभरते झोंके उठे हैं

यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं


टिमटिमाती आंखों के प्रकाश पुंज

अवलोकन पर दृश्य सब है धुंध

भावनाओं के पथ जगे अनूठे हैं

यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं


अब न कसमसाहट ना बेचैनी

निरख मिले राहत हथौड़ी छैनी

शिल्पकार असफल पड़े टूटे हैं

यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं


तलहटी व्यक्तिगत आंतरिक श्रृंगार

यहीं से रुनझुन यही से उठे हुंकार

अपनी पगुराहट संग टूटे खूंटे है

यादें सोई थी कुछ छूटे उठे हैं।


धीरेन्द्र सिंह

14.11

07.03.2026

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

तलाश

खुद को तलाशिए बिखरे हुए हैं सब

सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब


एक उम्र सबकी है अनुभव लिए हुए

कुछ चिंतित कुछ कहें क्या वह जिए

सबका कहीं अधूरा सा जीवन सबब

सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब


विपरीत जिंदगी को भी पड़ता है जीना

कहीं कौड़िया मिले कहीं रंगीन नगीना

हर एक का अंदाज़ हर एक का अदब

सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब


कहे आत्मा तो मानिए कि निखर गए

जानेगा कैसे कौन कि क्यों बिखर गए

जीवन को पढ़ते-पड़ते मिले अर्थ गजब

सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब।


धीरेन्द्र सिंह

06.03.2026

22.34


मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

आरक्षण

आरक्षण, आरक्षण

जिसकी चर्चा प्रतिपल-प्रतिक्षण

सुरक्षित कुछ इसमें

कुछ कर रहे आक्रमण

आरक्षण -आरक्षण


संविधान ने बोली बोली

पहुंची ऊपर सर्वहारा टोली

यह भी प्रगति दौर रहा

अब आर्थिक पिछड़े, बोली गोली

करवट रहा बदल कण-कण


कर्म-धर्म-सत्कर्म कहते अपनी बात

विशिष्ट स्थान संग हो विशेष पहचान

यह कैसा बिहान का प्रण

अपना-अपना सबका रण

आरक्षण, आरक्षण


सीमाएं तोड़ रहा आरक्षण

नए पक्ष माँग रहे आरक्षण

क्रिकेट का खेल लोकप्रिय

खिलाड़ी को रखने का प्रण

आरक्षण-आरक्षण।


धीरेन्द्र सिंह

25.02.2026

10.20

भाषा संचेतना

 चल भी न सकें साथ लेकर बौद्धिक वफादारी

कैसे सींचते हैं आप सुरभित जिंदगी की क्यारी

एक पहल ही तो है सर्जना जगत के सब कार्य

अभिव्यक्ति सत्य है तो भाषा में ना हो दुश्वारी


हिंदी की प्रस्तुतियों में अंग्रेजी में प्रतिक्रियाएं

अंग्रेजी मोह नहीं तो क्या है हिंदी मोह खुमारी

बौद्धिकता के दो चेहरे भाषा में जो अस्पष्टता

हिंदी क्षरण पर चुप रहना गूंगों की तरफदारी


हिंदी के पोस्ट पर अंग्रेजी में थैंक यू लिखना

हिंदी का अपमान इस जीवंतता की है शुमारी

चावल में कंकड़ सा लगता है इतर भाषा शब्द

भाषा की शुद्धता भी शिक्षितों की जिम्मेदारी


विद्वान वह है असफल जिनमें भाषा मिश्रित

आश्रित होने पर लुट जाती है जमींदारी

मुझसे जुडना है तो भाषा संचेतना है प्रथम

वरना अकेले ठीक हूँ करते हिंदी की तरफदारी।


धीरेन्द्र सिंह

25.02.2026

05.20

रूठना

रूठने की क्या अदा है समझ नहीं आए

दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं


शब्दों पर हुई चर्चा भाव का हुआ खर्चा

उन्होंने लिख दिया लिखा मैंने भी पर्चा

हिंदी का सिपाही हूँ अंग्रेजी शब्द क्यों आए

दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं


लाइक मेरी रचना को करें तो हैं दिखती

टिप्पणी प्रतिक्रिया ना उनकी तेज थपकी

कहती हैं व्यक्ति विशेष पर लिखा क्यों जाए

दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं


बोलीं कि सबको लिखती अंग्रेजी में लिखा

हिंदी के साधक को अंग्रेजी में लिखा दिखा

मेरे द्वारा अब अंग्रेजी में भाषा शास्त्र कहा जाए

दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं


वह श्रेष्ठ हैं विदुषी हैं करता हूँ उनका सम्मान

चिंतन की प्रक्रिया में स्तब्ध हुआ जो आसमान

आप यह ना पूछें कौन आदि शक्ति है बताएं

दिखती है पर लिखती नहीं, लिखते जाएं।


धीरेन्द्र सिंह

24.02.2026

20.08

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

निपुण चितेरा

चेतना हुई चपल चहक उठा है सवेरा

एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा


चित्त बसा चित्र है अभिनव ना विचित्र

भावनाओं की कलियां कल्पना की मित्र

आपका उदय जीवन निर्मल वलय घेरा

एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा


शयनपूर्व मेरी रचनाओं पर दे प्रतिक्रियाएं

भोर चहचहाते शब्द कलरव नित जगाएं

आपका सानिध्य सर्जन सूर्य उदय मुंडेरा

एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा


प्रदत्त आपका यह अलंकार "निपुण चितेरा"

महत्व मेरे लेखन का आपने जो यूँ उकेरा

तन अपरिचित मन हर्षित चर्चाओं का डेरा

एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा।


धीरेन्द्र सिंह

24.02.2026

05.43

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

साउथ अफ्रीका

 क्या खेल है क्रिकेट

जैसे जंगल का आखेट

लग गया तो लग गया

वरना होता निशाना ठेठ


खूब हंगामा हुआ सब ओर

भारत पर चले ना कोई जोर

सब दे गए अपना विकेट भेंट

कारणों को दें अब तर्क लपेट


साउथ अफ्रीका की टीम

है क्रिकेट की हकीम

चमके गेंद-बल्ले समेत

हल चला जैसे खेत


ऊर्जा, रुपया, समय कर व्यर्थ

इतनी करारी हार का क्या अर्थ

सुपर आठ भारतीय टीम लपेट

साउथ अफ्रीका टीम ने दिया फेंट।


धीरेन्द्र सिंह

23.02.2026

08.09

कोशिश

रात्रि के 11 बज रहे हैं

साउथ अफ्रीका से

हार चुका भारत

टी 20 मैच,


इस पराजय में

याद आयी तुम

जो

करती है संघर्ष खुलकर

और

बदल देती है निर्णय,


यह बताओ

तुम भारतीय क्रिकेट में

क्यों नहीं,

क्या जीत वहीं, जहां

बोले बल्ला 

अभिषेक शर्मा का प्रयास,


मुग्धित है क्रिकेट अभिषेक पर

जैसे

उन्मुक्त प्रशंसक हूँ तुम्हारा

जानती हो

समर्पित कोशिश ने ही

हार को

जीत में है संवारा;


सुनो

तुम जिस अंदाज में

आ जाती हो

जेहन में मेरे, संभावनाएं घेरे

चली जाओ न

लिए अपनी यही ऊर्जा

भारतीय क्रिकेट टीम में,


तुम अजेय हो

इसीलिए बिना तुम्हें बोले

तुम्हारी कामना करता हूँ,

अविजित असाधारण रहो

यही कोशिश

यही कामना करता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

22.01.2026

23.01

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

खिलना

 कोई कैसे खिलता है

कलियों से पूछा तो

बागीचा हंस पड़ा,

पुष्प ने कहा

जिसकी दृष्टि में

जो जंच पड़ा,

उलझन में

काफी देर तक

बागीचे में रहा खड़ा,


खिलना क्या

दृष्टि का विषय है

या कि यह कहीं

संतुष्टि का विषय है,

तर्क उलझाए रहा अड़ा,

बागीचा बोल पड़ा

मात्र किताबी ज्ञान

क्या जाने अनुभव घड़ा,


व्यक्ति रहता है खड़ा

बागीचा में

खिलने का उपाय ढूंढते,

कलियां रहती हैं

मंद-मंद मुस्कराती,

पुष्प रहते हैं बिखेरते

सुगंध, रंग अनेक,

व्यक्ति करते रहता है

खिलने का प्रयास।


धीरेन्द्र सिंह

22.02.2026

06.19

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

भाषा कोंपल उगती नई नई

हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई


21 फरवरी का यह दिन निर्धारण

बहु मातृभाषा आधारित उच्चारण

भाषा भी विपणन की प्रत्याशा हुई

हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई


मातृभूमि से सन्नद्ध रहती मातृभाषा

हिंदी संग सम्बद्ध हैं भारतीय भाषा

वसुधैव कुटुम्बकम लिए आशा नई

हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई


राजभाषा कार्यालयों में रही कराह

राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलनेवालों की चाह

मातृभूमि में हिंदी को कई निराशा हुई

हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई


बांग्लादेश की पहल यूनेस्को का स्वीकार

रजत जयंती दिवस बीता ना सुनी हुंकार

बहुभाषा प्रयोग यूनेस्को की अभिलाषा हुई

हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई।


धीरेन्द्र सिंह

21.02.2026

09.52

नंगनम

प्रतिरोध में अर्धनग्न हो बोल चली जुबां

अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा


विश्व के विभिन्न दिग्गजों से पूर्ण मंडपम

एक वर्ग युवा का अचानक हुआ नंगनम

देश में आमंत्रित विश्व अतिथियों को छुवा

अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा


वसुधैव कुटुम्बकम है पारम्परिक देश नारा

ए आई ने विश्व संवारने को भारत से पुकारा

टी शर्ट उतारकर युवा देने लगे वादा बद्दुआ

अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा


ए आई में विश्व नेतृत्व की भारत की तैयारी

एक वर्ग के युवा के मंडपम में की दुश्वारी

भारत के कुछ युवा उद्वेलित अविवेकी धुआं

अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा।


धीरेन्द्र सिंह

20.02.2026

20.46




गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

कोरा कागज

कोरा कागज ही दिल तो रहता है

जब कोई दिलदार मिल जाता है

नई अनुभूतियों के स्पंदन से उभर

नए कोने से नया फूल खिल जाता है


शुरू होती हैं शालीनभरी सूक्तियाँ कई

शब्द, भाषा में भी चमक-दमक आता है

भाव के अर्थ कई निकालता है नित मन

एक अनजाना भी करीब कैसे आता है


प्यार बस एक बार ही होता है अर्धसत्य

तथ्य जीवन के परिणाम नए लाता है

मन अनुरूप मिल जाती अभिव्यक्तियाँ तो

एक गुलाबी सा आवरण सा छा जाता है


हो सायास कुछ प्रयास नई कोशिश भी

तर्ज तब फ़र्ज़ बन खुदगर्ज हो जाता है

अब इसे भाव समझें या कि असभ्यता

खिलता है मन तो दीवाना सा कह जाता है।


धीरेन्द्र सिंह

20.02.2026

06.45

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

गलगोटिया

गलगोटिया विश्वविद्यालय का आतिथ्य है

रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है


मौलिकता की हो रही है भूख हड़ताल

नैतिकता की इसमें करे कौन पड़ताल

आवरण आकर्षक लगे क्षद्म व्यक्तित्व है

रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है


भूत-भविष्य नहीं वर्तमान की है बातें

हिंदी वाले समझें आग सा न इसे बांटे

चीन का रोबोट कुत्ता में क्या लालित्य है

रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है


सजता है मंच रहते बैठे कई हिंदी डॉक्टर

उबासी लेती पुस्तकों पर बातें तथ्य हटकर

बजती हैं थकी तालियां ऐसा ही कृतित्व है

रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है।


धीरेन्द्र सिंह

19.02.2026

08.15


मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

तड़के

आप मेरे मन में

होती हैं उदित कई बार

जैसे सागर से उभरे

सूर्य लिए ऊर्जा द्वार


तर्क की कसौटियां लुभावनी

भावना तो बयार पावनी

आप भी पुरवैया बयार

सुगंध की लिए कतार


मन में उभरे लिए छटाएं

भाल तक पहुंच गुनगुनाएं

स्पंदित हो जगे सहस्त्रधार

यही है आपके उभरने की कतार


तड़के खुली पलकें था प्रकाश

मन आलोकित सत्य करता तलाश

आप उभरें मन तत्पर करे करार

कल्पनाओं को करे कौन स्वीकार।


धीरेन्द्र सिंह

18.02.2026

04.46


सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

छोड़ जाता हूँ

अपने लिए जो रचता हूँ

जुड़ खूब उससे सजता हूँ

लचकती डाल सा मोड़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


नित संपर्कियों को पढ़ता हूँ

उत्कर्ष हो ध्येय लेकर रचता हूँ

भटकते भाव लेकर ओढ़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


प्रतिष्ठा को कनिष्ठा सा समझता हूँ

निष्ठा को समझ ऊर्जा दहकता हूँ

अगन के दहन में दिए जोड़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


न छोडूं तो कैसे जी सकता हूँ

अटक जाऊं धीमी आंच पकता हूँ

निरन्तर नित नया रच दौड़ जाता हूँ

फिर वह रचना छोड़ जाता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

17.02.2026

10.31

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

प्रतिकार

अस्वीकार जब तिरस्कार हो

बिन बोले तब धिक्कार हो

मुहँ मोड़ना होता है तभी

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


तत्क्षण का विरोध अस्थाई

रोष संग यह साथ निभाई

अनियंत्रित उठता गुबार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


अपनापन कोई भेद न माने

ऊंच-नीच हो जाय अनजाने

आकर देहरी अस्वीकार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


अर्थ का अनर्थ निकाला जाए

भाव कलुषता डाल भड़काए

जब छूटता लगे अधिकार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो।


धीरेन्द्र सिंह

14.02.2026

16.09


मंगलवार, 13 जनवरी 2026

कूद-फांद

कूद-फांद कर निनाद

जाने कौन छुपा मांद


समय बदल रहा क्या

अभय मचल रहा क्या

पिघल रहा अब विषाद

जाने कौन छुपा मांद


शब्द हैं कालिख पुते

भाव घृणा को जपे

असुरा गूंजे है निनाद

जाने कौन छुपा मांद


शब्दभेदी क्या चले बाण

एकलव्य हैं कई निष्णात

तड़पन बने धड़कन संवाद

जाने कौन छुपा मांद।


धीरेन्द्र सिंह

14.01.2026

06.18




सोमवार, 12 जनवरी 2026

परछाईं

जी रहे हैं खुल जीवन जुगत भरी चतुराई में 

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


अपने दिल की धड़कन की चिंता सबको है

अपने खिल हो जाएं पुलकित निजता वो है

क्या-क्या रहे छुपाते जीवन की तुरपाई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


यादें रंग-बिरंगी फीके प्रभाव में करें आलोड़न

पीड़ाएं दुबकाए कोने हृदय करे प्रायः प्रभु भंजन

जीवन कितना दिया -लिया पारस्परिक बहुराई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


क्या समझे कितना समझे जब चिंतन हो उथले

जिसको जितना समझा जीवन वैसे थापे उपले

जीवन जोड़-घटाना कर भरी अकुलाहट रंगराई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में।


धीरेन्द्र सिंह

13.01.2026

14.45



शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

धारदार

शब्दों की धार पर

कामनाओं की तपन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


स्वार्थ एकमात्र सिद्धि लगे

चाहतों का हो जतन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


जिसकी लाठी उसकी भैंस

यह मुहावरा प्रचलित सघन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


जनचेतना नित घायल होती

मनवेदना कलुषित उपवन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन।


धीरेन्द्र सिंह

09.01.2026

18.21