रविवार, 24 मई 2026
मचलता प्यार
जीवन एक नैया और यह उम्र है पतवार
शुक्रवार, 22 मई 2026
बरकत अरोड़ा
बरकत अरोड़ा
एक नन्हीं परी
न जाने कहाँ से
है वह नृत्य भरी
रात्रि के 0.44 पर
लेखन चल पल घड़ी
प्रतिभा रोमांचित की
वरना मुझे क्या पड़ी
बालिका ईश्वर प्रदत्त गुण
हाव-भाव समाए खड़ी
संगीत बजे पैर चले
थम जाए सब घड़ी
अब और क्या लिखूं
वह अद्भुत अनंत कड़ी
कैसे निभाती वयस्क भाव
वीडियो है एक कड़ी।
धीरेन्द्र सिंह
23.05.2026
0.51
गुरुवार, 21 मई 2026
बदन की मस्तियाँ
खिल उठती हैं सूर्य सी नर्म रश्मियां
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ
बुधवार, 20 मई 2026
मेलोडी
दो राष्ट्र प्रतिनिधियों की है हंसी ठिठोली
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी
मंगलवार, 19 मई 2026
आपबीती
आपबीती इस कदर है
खुद को नहीं खबर है
बीत गया दौर वह भी
मन मचाता भी ग़दर है
जो सोचा ना मिला वह
जो मिला किसकी नजर है
कर्म अब तक लड़ रहा
भाग्य ही असली डगर है
स्वयं खंडित पर है मंडित
स्तंभित पूरा शहर है
है बहादुर जाए कहां दूर
कष्टमय लगता सफर है
जी रहे हैं लोग ऐसे
जीवन का ऐसा असर है
चाह कुछ होती नहीं है
जीता वही जिसमें सबर है।
धीरेन्द्र सिंह
20.05.2026
07.02
x
रविवार, 17 मई 2026
चाँद बांटिए
चंद लोगों में अक्सर चाँद को बाँटिए
दिल की बेचैनियों को जगह चाहिए
आप यहां-वहां से उठा कहा कीजिए
जिंदादिली की भी कोई वजह चाहिए
शनिवार, 16 मई 2026
कुछ छूट रहा
एक मुस्कराती जिंदगी, कमाल है
एक गुनगुनाती जिंदगी, धमाल है
आपके शब्दों में है नटखट शरारत
एक सुगबुगाती रागिनी का ताल है
माटी 9
माटी 9 के प्रमुख मद
1. पंजीकरण व्यवस्थित था।
2. बैठने की व्यवस्था अच्छी थी।
3.रिकोर्डिन्द फोटोग्राफी अच्छी थी।
4. मंच के आरंभ में जिस पुरुष ने आरम्भ किया वह ठीक नहीं था। न कोई भूमिका न किसी प्रकार की पार्श्वभूमि बस बोलना वह भी तेज थोड़ी कर्कश आवाज।
5. महिला ने कवि सम्मेलन का आरंभिक चर्चा ठीक किन किंतु जल्द चली गईं। प्रभाव जो जमा सकती थीं नहीं हो सका।
6. जगदंबिका पाल और कृपाशंकर सिंह नेता के इर्द-गॉर्ड भीड़ बातें कर रही थी और मंच पर मुशायरा चल रहा था।
7. एक भी कवि अपना प्रभाव नहीं छोड़ सका न श्रोताओं से जुड़ सका। मुशायरा के अध्यक्ष ने रामायण पर अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए रामायण को कहानी बतलाया जो आपत्तिजनक था।
8. सच्चिदानंद काशी पर कम और अपनी पत्नी मालविका की चर्चा अधिक किए। काशी पर दो मिनट भी नहीं बोल पाए। सच्चिदानंद अपनी पुस्तक का लेख पढ़ रहे थे जो श्रोतागण में यह उत्सुकता नहीं जगा पाया कि ललक उत्पन्न हो। संस्मरण सुना रहे थे जो विषय के अनुरूप नहीं था।
9. सच्चिदानंद राजन-साजन मिश्र का काशी पर गीत की दो पंक्तियाँ गाये जो अच्छा प्रभाव डाला।
10. महिला ने अपने संचालन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हुए मालिनी अवस्थी का स्वागत किया।
11. 6.30 शाम को पुरुष संचालक ने अपना ड्रेस बदल कर अच्छी वेशभूषा में हो गया। मालिनी अवस्थी का गाना चल रहा था। पुलिस के बड़े अधिकारी आ-जा रहे थे। मुख्यमंत्री के आगमन का समय हो रहा था।
12. संचालिका जो बुंदेलखंड की थीं उन्होंने संचालन का अनुपम कौशल का प्रदर्शन किया। मालिनी अवस्थी के गायन समापन के बाद मुख्य मंत्री के आगमन में लगनेवाले समय में मंच से कुछ देर तक बातें की फिर मंच से नीचे उतरकर श्रोताओं संग संवाद उनके गायन आदि की सहभागिता सम्मिलित की।
13. राजनेताओं की तथा पुलिसकर्मियों की मुख्य मंत्री की अगवानी की मुस्तैदी और व्यस्तता को देखने के बाद बाहर निकल विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर वाहन की प्रतीक्षा करने लगा। इसी दौरान मुख्यमंत्री का काफिला आता दिखा और आगे एक मोटरसाइकिल संग कुल पांच कारें गुजरी। वहां मुस्तैद एक पुलिसकर्मी ने कहा कि काफिला में कम गाड़ियां हैं।
14. मुख्यमंत्री के आने के पहले रात्रि 8 बजे सभागार से बाहर निकल गया।
बुधवार, 13 मई 2026
चाह सूरज
गूंजा आपका तराना है
भोर भाव मनमाना है
मोबाइल से नहीं बातें
बस लिख गुनगुनाना है
कैसे आंख खुली तड़के
चाह का मन दीवाना है
पढ़ेंगी या ना पढ़ेंगी यह
सिवाय लिखने भरमाना है
भोर की सोच होती सच
शोर मन में अनजाना है
आज क्या कुछ अलग है
आह का जो फड़फड़ाना है
धीरेन्द्र सिंह
14.05.2026
05.01
मंगलवार, 12 मई 2026
लेखन
देश, धर्म, संस्कृति पर रचना लिखिए
एक समूह जागरूक का अनुरोध था
पढ़कर अनुरोध चिंतन उसपर किया
रामायण, श्रीमदभगवतगीता की कथा
राष्ट्र की विभिन्न परम्पराएं हैं अनमोल
जो विगत इतिहास नहीं एक दर्पण था
सत्य के तथ्य को कथ्य में पिरोया गया
धूल में अटा दर्पण रह-रह चमक व्यथा
नींव सशक्त है निर्माण नया तो कीजिए
देश, धर्म, संस्कृति सांस में है सबके मथा
राम सा चरित्र कहां कृष्ण सी कहां कूटनीति
पीढ़ी के संचित मार्गदर्शन क्या मात्र कथा
लेखन कौशल है तो कलम योद्धा बन जाईए
समाज वही जीवित वर्तमान जिसने है मथा
नए अस्त्र-शस्त्र हैं नई हैं कई युद्धनीतियाँ
शौर्य-शक्ति जीवंत मात्र संयुक्त हों सखी-सखा
मेरा लेखन एक प्रहार है नहीं कोई चित्रहार
भावनाओं का जैविक युद्ध आज से है नधा
आपके सुझाव का आदर है प्रेरणा हैं दिए
भाषा का मूल योद्धा हूँ देश, संस्कृति में रचा।
धीरेन्द्र सिंह
13.05.2026
08.18
शनिवार, 9 मई 2026
माहेरवाशी
"माहेरवाशी" कल्पना का गुणगान करूँगा
समाज भी सरकार है सम्मान करूँगा
श्रीकांत भारतीय, डॉ श्रेया भारतीय की सोच
अखिलेश चौबे, वेदिका संग 214 की फौज
नई सोच अभिनव कर्म प्रसारित जहान करूँगा
समाज भी सरकार है सम्मान करूँगा।
धीरेन्द्र सिंह
10.05.2026
10.05
मनमर्जियाँ
मनोभाव की होती हैं नित कितनी सरगर्मियां
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ
टुकड़े-टुकड़े, गिरते-पड़ते कुछ भाव कह दिए
सामनेवाला कितना समझा उतने में रह लिए
होती जो बारिश की झूमती बूंदों सी खुदगर्जियाँ
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ
कुछ कह दिए कुछ रोक लिए रोज ऐसा होता
उगता नहीं हमेशा भाव बीज जैसा है बोता
तोता सा वही रट अटक-मटक-झटक अर्जियां
निभाव में हो पाती है कितनी सी मनमर्जियाँ
व्यक्तिगत जीवन हो या किसी समूह की धरती
मनोभाव कितने बरसे पर लगे धरती है परती
डुबो न संग किसी गहरे भाव सागर में दरमियां
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ।
धीरेन्द्र सिंह
10.05.2026
06.53
गुरुवार, 7 मई 2026
समूह पुकार
पोस्ट आपकी महत्वपूर्ण लिए सरोकार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार
आपकी सोच अच्छी भाव में हैं नवीनता
आपका लेखन अभिनव लिए प्रवीणता
कुछ लोग तो करते आपकी रचना सत्कार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार
अन्य पोस्ट भी चाहें आपका भी प्रोत्साहन
एक लाइक या टिप्पणी देती नवीन मनन
जुड़िए न समूह से करते प्रसारित सुविचार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार
क्या समूह दायित्व संवाहक एडमिन, मॉडरेटर
सदस्य भी तो हैं समूह के दीप्तिमान दिवाकर
यह सलाह नही हिंदी समूह का विनीत पुकार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार।
धीरेन्द्र सिंह
07.04.2026
21.07
बुधवार, 6 मई 2026
विवाह
कुछ भावना कुछ सामाजिक चलन प्रवाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह
जो कहते खुशियों भरी है वैवाहिक जिंदगी
वह डरते यह कहने में झेले हैं जो शर्मिंदगी
आरम्भ गर्मजोशी से फिर अदृश्य सोई दाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह
सामाजिक बंधनों का है दबाव प्रखर जोड़
दिखावा प्रदर्शन खूब भीतर रोज रिश्ते तोड़
एक-दूजे से उदासीनता निकलती मुई आह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह
जो खींच रहे बलभर वह हैं साथ चलन क्रम
हर मोड़ पर उभरता है शंका लिए नया भ्रम
विवाहेत्तर संबंधों में हैं अभी भी छुईमुई पनाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह।
धीरेन्द्र सिंह
06.04.2026
14.05
मंगलवार, 5 मई 2026
पोस्ट
दिखती कम मौलिकता नकल का है ताना-बाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना
हर सामान्य पोस्ट में दिखे यौवन की ही लयकारी
यौवन कहां है न दिखता लगे यथार्थ से है पर्देदारी
चापलूसी उथले मजाक से संभव है क्या जीत जाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना
कॉपी-पेस्ट का बढ़ते चलन में पोस्ट का पुनरावर्तन
मौलिक लेखक का नाम मिटा उसपर करते कई नर्तन
जैसा है वैसा नहीं दिखते कैसे लोगों का यह जमाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना
अधिकांश पोस्ट लगती वासना की कुंठा वर्जनाएं
बस सेक्स ही है जीवन जीव सेक्स में हैं भरमाए
प्यार सहज सेक्स उपज हर हृदय का है ताना-बाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना।
धीरेन्द्र सिंह
06.05.2026
06.01
शनिवार, 2 मई 2026
वेदनाएं
छूकर कह रही हैं यह आपकी चेतनाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेंगी न वेदनाएं
शब्दों में सिमटकर मनोभाव चल पड़े
अर्थों में बिखरकर सद्भाव निकल पड़े
क्या हुआ, कैसे हुआ यह समझ न पाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं
चौरंगी मन में चतुर्भज है कंपित चेतना
मन आपका न छू लूँ संशय हो तो देखना
संपर्क में होती हैं निर्मित अचानक कामनाएं
हंसिए,खिलखिलाईये घटेगी न वेदनाएं
कब हो सका चलती रहे अपनी मनमर्जियाँ
दूसरी आफत प्रणय की आती रहती अर्जियां
छोड़िए जग की बातें क्या है सोच तो बताएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं।
धीरेन्द्र सिंह
03.05.2026
06.25
शुक्रवार, 1 मई 2026
धक-धक
धक-धक, धीरे-धीरे, साथ-साथ, कुछ-कुछ
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस, सचमुच
आप कई आवरण के प्रकरण परे हैं विद्यमान
थाप जिंदगी के कई आवरण धरे हैं निदान
मति-मति, दौड़े-दौड़े, आस-आस, हँसमुख
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस सचमुच
यथार्थ के विचार में आपका ही नित संचार
परमार्थ है स्वीकार जाप का ही मीत प्रकार
रचि-रचि, हौले-हौले, खास-खास, अभिमुख
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच
क्रिया की प्रतिक्रिया में सक्रिय है भाव क्रिया
दिया है मन में जला विनयी है चाह प्रिया
सखि-सखि, तौले-मोले, रास-रास गुपचुप
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच।
धीरेन्द्र सिंह
02.04.2026
09.49
खामोश आंधियां
नयन की नयन से सुगंधित शरारत
मुस्कराहट में आपको मिली महारत
जुल्फ गर्दन की अठखेलियाँ भी हों
वाचाल उभरती जाए सुगंधित इबारत
शिष्ट, शालीन, व्यक्तित्व करता है मोहित
प्रभाव ऐसा हो लयबद्ध सी थरथराहट
गीत बन जाती है निहारती यह दुनिया
स्वर दें आप उसे उभरे मीठी छटपटाहट
हृदय के पंख पर बिठाकर आपको उडें
गगन कर नमन दर्शाता रंगों की महारत
आपके रंग देख मेघ भी एकटक हो तकें
नशीले रंगों की स्वामिनी फाग सी शरारत
कुशलता से छिपा लेती अपने सारे बवंडर
उड़ता जाता है परिवेश करती जाती आहत
समझने के प्रयास में होते जाते सब बदहवास
आप खामोश आंधियों में उड़ाती हैं चाहत।
धीरेन्द्र सिंह
02.05.2026
05.36
गुरुवार, 30 अप्रैल 2026
मजदूर दिवस
मजदूर दिवस है ना होइए मगरूर
भारत है निर्माता विभिन्न्न से मजदूर
पसीना बहानेवाले ही लगते हैं श्रमिक
पढ़े-लिखे भी मजदूर कर मौलिकता शमित
भारत श्रमिकों का निर्यातक है मशहूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर
आई टी का बोलबाला सब पढ़ते प्रौद्योगिकी
पूर्ण कर यह शिक्षा सेवा प्रदाता की लायिकी
कम्प्यूटर की गैर भाषा न अपना सर्च इंजन नूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर
हम विश्व के श्रेष्ठ एक शिक्षित मजदूर
मजदूर दिवस आज भी रहा हमें घूर
बहुसंख्य विदेशों में हैं जाने को प्रणपूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर।
धीरेन्द्र सिंह
01.05.2026
08.02
बुधवार, 29 अप्रैल 2026
जीवन
उम्र तन्मय हो गया है आस का उन्माद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
आर्थिक आजादी ही सर्वप्रमुख अभियान
स्वार्थ सिद्ध के खातिर करते हैं गुणगान
जीवन ऊर्जा सूख रही मिले न पानी खाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
देह तलक ही नेह है नखशिख सौंदर्य
भौतिकता में उलझे ना आत्मिक सौकर्य
नेह डगरिया नहीं गगरिया मन पनघट नाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
उम्र गुजरती राह बदलती और बदले चाल
आज सुन रहे कल बदलती उम्र अपनी ताल
पकड़-धकड़ कर उम्र को रोकें यौवन विवाद
जीवन झंझावात है कहाँ मधुर संवाद।
धीरेन्द्र सिंह
30.04.2026
08.27
मंगलवार, 28 अप्रैल 2026
आप
आप इस दिल की जिंदगानी हैं
प्यार की हम भी एक कहानी हैं
आपकी हलचलें खामोश हो रहीं
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं
गहन गहराई में भाव तुरपाई करें
अदृश्य देह आत्मा की रवानी है
आप हर बार हवा सा छू रहे हैं
ऐसा लगता हम उबलते पानी है
कहां से राह चली और शाम ढली
जिंदगी हतप्रभ सी अनजानी है
आज भी आस प्यास साँसों में
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं
आपकी ऊष्मा आपकी ऊर्जा है
एक गति मति में संगती ठानी है
प्यार के गुबार में आपका बुखार
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं।
धीरेन्द्र सिंह
29.04.2026
05.56
सोमवार, 27 अप्रैल 2026
गर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
रविवार, 26 अप्रैल 2026
प्रबुद्ध
प्रबुद्ध हैं तो सर्वत्र ज्ञान बांटिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तंत्र संज्ञान बांटिए
संज्ञान उत्तर प्रदेश गृहित शब्द है
विकासशील राज्य का जनित प्रारब्ध है
धर्म और राजनीति यहां जांचिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए
थार के गुबार में लिप्त लगता व्यवहार
संशय में उबरता सूर्यरश्मि सा त्यौहार
विस्थापन यहां विवशता कागज पर नापिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए
इतर राज्य-राष्ट्र में दीप्तिमान हैं रहिवासी
नोएडा, लखनऊ, अयोध्या आदि काशी
संज्ञान विज्ञान है तबियत से तो झांकिए
निबद्ध हैंबतो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए।
धीरेन्द्र सिंह
27.04.2026
09.14
शनिवार, 25 अप्रैल 2026
उलझन
अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
कश्तियाँ दोनों की मगन साथ-साथ थीं
हस्तियां अपनी भी सबरंग बेहिसाब थीं
कुतर दिया समाज ने जुड़ाव दे पैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व
अपने को देखे या सहेजे तीरे अस्तित्व
टपक रहे हैं भाव पर मुस्कराहट के छैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया
महल की बात करे जीर्ण हो रही कुटिया
प्यार अवसर है स्नेह सुप्त ताल की मैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना।
धीरेन्द्र सिंह
26.04.2026
10.24
गजब लिखते हैं
गजब लिखते हैं सरकार जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
भावनाओं की हो पल्लवित फुनगिया
कामनाएं खिलें लेकर विचार दुनिया
अभिव्यक्तियाँ जैसे हवन विचार घी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
मेरे हर लेखन की ऊर्जा हैं पाठक
सबकी अपनी शैली लेखन जातक
पाठक-पाठिका रचना रत्नहार जिय
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
यह रचना प्रतिक्रिया का प्रभाव
प्रतिक्रिया मस्तक रखना स्वभाव
आप महत्वपूर्ण सत्कार करे जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी।
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026
देह मिलन
देह से देह मिलन भी एक जतरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026
व्यक्ति
इतना रीता भी नहीं कि
ढूंढू व्यक्ति करने को बात
इतना भरा भी नहीं कि
कर सकूं अनदेखा जज्बात
मन की कूंची है तत्पर
बहुरंगी भावनाओं की सौगात
रविवार, 22 मार्च 2026
उम्र
उम्र मुझसे मांगती है सरसराती रीति
अन्य प्रपंच ना भाए प्रणय जीवन गीत
कब कहां चूका रीता सा है लगता कहाँ
तार झंकृत हैं सभी सुप्त आपका प्रतीत
तार के कसाव का कौशल यदि छूटे
भरभराती सी लगे चट्टान निर्मित भीत
वर्तमान के सरगम में नवीनताएँ अनेक
क्या मिलेगा सोचकर कैसा था अतीत
भावनाएं पक जाने पर बदल देती रूप
सुगंध, मिठास, अहसास रहते वैसे मीत
उम्र एक बदलाव है रूप, रंग, तरंग का
रुनझुन मादकता ना बदले माथा ना पीट।
धीरेन्द्र सिंह
23.03.2026
09.12
शनिवार, 21 मार्च 2026
सत्य
सत्य क्या है सांझ सरल अरुणाई
रात्रि लगे तिमिर किसी को तरुणाई
भाव सहित दृष्टि की बहती सर्जना
जग की विविधता चेतना की परछाईं
महत्व का घनत्व है अपनत्व सघन
गगन का दहन है तपन की रुसवाई
आकर्षण कर घर्षण करता विकर्षण
बदन बहुरंगी अतरंगी द्रवित चतुराई
कामना के पर्व में योजना स्व सर्व
याचना भी रचना करे जैसे पुरवाई
मोह के खोह में देह लगे अति सुबोध
अभिलाषाएं फूट पड़ें वासंती अमराई।
धीरेन्द्र सिंह
22.03.2026
08.12
गोवा
गोवा
एक संस्कृति
एक सभ्यता
मानवता का
अभिव्यक्ति का
स्वतंत्रता का,
सागत के तट
विशिष्ट पहचान
लिए अपना आसमान
विविध विधान
नए मूल्य विज्ञान
चेतना के,
यहां व्यक्तित्व निर्द्वंद्व
स्वयं को अभिव्यक्त करता
नहीं परतंत्र
यौवन चहुंओर पसरा
भावनाओं का गणतंत्र
स्वयं की सेवा
गोवा,
मदिरा, मैथुन, मनोकामना
कल्पना का यथार्थ सामना
परिधान में परिणय
परिणय में विधान
जीव का सत्य से सामना
उर मेवा
गोवा,
सहज सुविज्ञ बन आइए
स्वयं को स्वयं से छाईए
अंतर्चेतना प्रज्वलित हो
अभिव्यक्त अपने गाइए
आत्मसेवा
गोवा।
धीरेन्द्र सिंह
21.03.2026
21.46
शनिवार, 7 मार्च 2026
नारी
शिव और शक्ति
नारी है भक्ति
सुदृढ, सक्षम, सुकोमल
संरचना की शतदल
युगनिर्माण साक्षी
नारी ही भक्ति
सनातन का आधार
नारी शक्ति प्रकार
आरोहण आसक्ति
नारी ही भक्ति
सांस-सांस नारी रूप
आस-साथ नारी धूप
नारी वैभव, मुक्ति
नारी ही भक्ति
अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष
ध्यानाकर्षण हो सहर्ष
नारी नहीं युक्ति
नारी ही भक्ति 🙏
धीरेन्द्र सिंह
11.18
08.03.2026
लाइक
रचनाओं को
निरंतर लाइक करना
सम्मान है
रचना और रचनाकार का,
रचनाकार का दायित्व है
लाइक करनेवाले को देना
धन्यवाद
पर कैसे?
लाइक कर्ता के
इनबॉक्स में जाकर
धन्यवाद ज्ञापन
आभार है,
यह प्रणाली
लाइक को नमस्कार है।
धीरेन्द्र सिंह
10.57
08.03.2026
तलहटी
तलहटी से उभरते झोंके उठे हैं
यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं
टिमटिमाती आंखों के प्रकाश पुंज
अवलोकन पर दृश्य सब है धुंध
भावनाओं के पथ जगे अनूठे हैं
यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं
अब न कसमसाहट ना बेचैनी
निरख मिले राहत हथौड़ी छैनी
शिल्पकार असफल पड़े टूटे हैं
यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं
तलहटी व्यक्तिगत आंतरिक श्रृंगार
यहीं से रुनझुन यही से उठे हुंकार
अपनी पगुराहट संग टूटे खूंटे है
यादें सोई थी कुछ छूटे उठे हैं।
धीरेन्द्र सिंह
14.11
07.03.2026
शुक्रवार, 6 मार्च 2026
तलाश
खुद को तलाशिए बिखरे हुए हैं सब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
एक उम्र सबकी है अनुभव लिए हुए
कुछ चिंतित कुछ कहें क्या वह जिए
सबका कहीं अधूरा सा जीवन सबब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
विपरीत जिंदगी को भी पड़ता है जीना
कहीं कौड़िया मिले कहीं रंगीन नगीना
हर एक का अंदाज़ हर एक का अदब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
कहे आत्मा तो मानिए कि निखर गए
जानेगा कैसे कौन कि क्यों बिखर गए
जीवन को पढ़ते-पड़ते मिले अर्थ गजब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब।
धीरेन्द्र सिंह
06.03.2026
22.34
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026
आरक्षण
आरक्षण, आरक्षण
जिसकी चर्चा प्रतिपल-प्रतिक्षण
सुरक्षित कुछ इसमें
कुछ कर रहे आक्रमण
आरक्षण -आरक्षण
संविधान ने बोली बोली
पहुंची ऊपर सर्वहारा टोली
यह भी प्रगति दौर रहा
अब आर्थिक पिछड़े, बोली गोली
करवट रहा बदल कण-कण
कर्म-धर्म-सत्कर्म कहते अपनी बात
विशिष्ट स्थान संग हो विशेष पहचान
यह कैसा बिहान का प्रण
अपना-अपना सबका रण
आरक्षण, आरक्षण
सीमाएं तोड़ रहा आरक्षण
नए पक्ष माँग रहे आरक्षण
क्रिकेट का खेल लोकप्रिय
खिलाड़ी को रखने का प्रण
आरक्षण-आरक्षण।
धीरेन्द्र सिंह
25.02.2026
10.20
भाषा संचेतना
चल भी न सकें साथ लेकर बौद्धिक वफादारी
कैसे सींचते हैं आप सुरभित जिंदगी की क्यारी
एक पहल ही तो है सर्जना जगत के सब कार्य
अभिव्यक्ति सत्य है तो भाषा में ना हो दुश्वारी
हिंदी की प्रस्तुतियों में अंग्रेजी में प्रतिक्रियाएं
अंग्रेजी मोह नहीं तो क्या है हिंदी मोह खुमारी
बौद्धिकता के दो चेहरे भाषा में जो अस्पष्टता
हिंदी क्षरण पर चुप रहना गूंगों की तरफदारी
हिंदी के पोस्ट पर अंग्रेजी में थैंक यू लिखना
हिंदी का अपमान इस जीवंतता की है शुमारी
चावल में कंकड़ सा लगता है इतर भाषा शब्द
भाषा की शुद्धता भी शिक्षितों की जिम्मेदारी
विद्वान वह है असफल जिनमें भाषा मिश्रित
आश्रित होने पर लुट जाती है जमींदारी
मुझसे जुडना है तो भाषा संचेतना है प्रथम
वरना अकेले ठीक हूँ करते हिंदी की तरफदारी।
धीरेन्द्र सिंह
25.02.2026
05.20
रूठना
रूठने की क्या अदा है समझ नहीं आए
दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं
शब्दों पर हुई चर्चा भाव का हुआ खर्चा
उन्होंने लिख दिया लिखा मैंने भी पर्चा
हिंदी का सिपाही हूँ अंग्रेजी शब्द क्यों आए
दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं
लाइक मेरी रचना को करें तो हैं दिखती
टिप्पणी प्रतिक्रिया ना उनकी तेज थपकी
कहती हैं व्यक्ति विशेष पर लिखा क्यों जाए
दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं
बोलीं कि सबको लिखती अंग्रेजी में लिखा
हिंदी के साधक को अंग्रेजी में लिखा दिखा
मेरे द्वारा अब अंग्रेजी में भाषा शास्त्र कहा जाए
दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं
वह श्रेष्ठ हैं विदुषी हैं करता हूँ उनका सम्मान
चिंतन की प्रक्रिया में स्तब्ध हुआ जो आसमान
आप यह ना पूछें कौन आदि शक्ति है बताएं
दिखती है पर लिखती नहीं, लिखते जाएं।
धीरेन्द्र सिंह
24.02.2026
20.08
सोमवार, 23 फ़रवरी 2026
निपुण चितेरा
चेतना हुई चपल चहक उठा है सवेरा
एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा
चित्त बसा चित्र है अभिनव ना विचित्र
भावनाओं की कलियां कल्पना की मित्र
आपका उदय जीवन निर्मल वलय घेरा
एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा
शयनपूर्व मेरी रचनाओं पर दे प्रतिक्रियाएं
भोर चहचहाते शब्द कलरव नित जगाएं
आपका सानिध्य सर्जन सूर्य उदय मुंडेरा
एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा
प्रदत्त आपका यह अलंकार "निपुण चितेरा"
महत्व मेरे लेखन का आपने जो यूँ उकेरा
तन अपरिचित मन हर्षित चर्चाओं का डेरा
एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा।
धीरेन्द्र सिंह
24.02.2026
05.43
रविवार, 22 फ़रवरी 2026
साउथ अफ्रीका
क्या खेल है क्रिकेट
जैसे जंगल का आखेट
लग गया तो लग गया
वरना होता निशाना ठेठ
खूब हंगामा हुआ सब ओर
भारत पर चले ना कोई जोर
सब दे गए अपना विकेट भेंट
कारणों को दें अब तर्क लपेट
साउथ अफ्रीका की टीम
है क्रिकेट की हकीम
चमके गेंद-बल्ले समेत
हल चला जैसे खेत
ऊर्जा, रुपया, समय कर व्यर्थ
इतनी करारी हार का क्या अर्थ
सुपर आठ भारतीय टीम लपेट
साउथ अफ्रीका टीम ने दिया फेंट।
धीरेन्द्र सिंह
23.02.2026
08.09
कोशिश
रात्रि के 11 बज रहे हैं
साउथ अफ्रीका से
हार चुका भारत
टी 20 मैच,
इस पराजय में
याद आयी तुम
जो
करती है संघर्ष खुलकर
और
बदल देती है निर्णय,
यह बताओ
तुम भारतीय क्रिकेट में
क्यों नहीं,
क्या जीत वहीं, जहां
बोले बल्ला
अभिषेक शर्मा का प्रयास,
मुग्धित है क्रिकेट अभिषेक पर
जैसे
उन्मुक्त प्रशंसक हूँ तुम्हारा
जानती हो
समर्पित कोशिश ने ही
हार को
जीत में है संवारा;
सुनो
तुम जिस अंदाज में
आ जाती हो
जेहन में मेरे, संभावनाएं घेरे
चली जाओ न
लिए अपनी यही ऊर्जा
भारतीय क्रिकेट टीम में,
तुम अजेय हो
इसीलिए बिना तुम्हें बोले
तुम्हारी कामना करता हूँ,
अविजित असाधारण रहो
यही कोशिश
यही कामना करता हूँ।
धीरेन्द्र सिंह
22.01.2026
23.01
शनिवार, 21 फ़रवरी 2026
खिलना
कोई कैसे खिलता है
कलियों से पूछा तो
बागीचा हंस पड़ा,
पुष्प ने कहा
जिसकी दृष्टि में
जो जंच पड़ा,
उलझन में
काफी देर तक
बागीचे में रहा खड़ा,
खिलना क्या
दृष्टि का विषय है
या कि यह कहीं
संतुष्टि का विषय है,
तर्क उलझाए रहा अड़ा,
बागीचा बोल पड़ा
मात्र किताबी ज्ञान
क्या जाने अनुभव घड़ा,
व्यक्ति रहता है खड़ा
बागीचा में
खिलने का उपाय ढूंढते,
कलियां रहती हैं
मंद-मंद मुस्कराती,
पुष्प रहते हैं बिखेरते
सुगंध, रंग अनेक,
व्यक्ति करते रहता है
खिलने का प्रयास।
धीरेन्द्र सिंह
22.02.2026
06.19
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
भाषा कोंपल उगती नई नई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई
21 फरवरी का यह दिन निर्धारण
बहु मातृभाषा आधारित उच्चारण
भाषा भी विपणन की प्रत्याशा हुई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई
मातृभूमि से सन्नद्ध रहती मातृभाषा
हिंदी संग सम्बद्ध हैं भारतीय भाषा
वसुधैव कुटुम्बकम लिए आशा नई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई
राजभाषा कार्यालयों में रही कराह
राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलनेवालों की चाह
मातृभूमि में हिंदी को कई निराशा हुई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई
बांग्लादेश की पहल यूनेस्को का स्वीकार
रजत जयंती दिवस बीता ना सुनी हुंकार
बहुभाषा प्रयोग यूनेस्को की अभिलाषा हुई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई।
धीरेन्द्र सिंह
21.02.2026
09.52
नंगनम
प्रतिरोध में अर्धनग्न हो बोल चली जुबां
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा
विश्व के विभिन्न दिग्गजों से पूर्ण मंडपम
एक वर्ग युवा का अचानक हुआ नंगनम
देश में आमंत्रित विश्व अतिथियों को छुवा
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा
वसुधैव कुटुम्बकम है पारम्परिक देश नारा
ए आई ने विश्व संवारने को भारत से पुकारा
टी शर्ट उतारकर युवा देने लगे वादा बद्दुआ
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा
ए आई में विश्व नेतृत्व की भारत की तैयारी
एक वर्ग के युवा के मंडपम में की दुश्वारी
भारत के कुछ युवा उद्वेलित अविवेकी धुआं
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा।
धीरेन्द्र सिंह
20.02.2026
20.46
गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026
कोरा कागज
कोरा कागज ही दिल तो रहता है
जब कोई दिलदार मिल जाता है
नई अनुभूतियों के स्पंदन से उभर
नए कोने से नया फूल खिल जाता है
शुरू होती हैं शालीनभरी सूक्तियाँ कई
शब्द, भाषा में भी चमक-दमक आता है
भाव के अर्थ कई निकालता है नित मन
एक अनजाना भी करीब कैसे आता है
प्यार बस एक बार ही होता है अर्धसत्य
तथ्य जीवन के परिणाम नए लाता है
मन अनुरूप मिल जाती अभिव्यक्तियाँ तो
एक गुलाबी सा आवरण सा छा जाता है
हो सायास कुछ प्रयास नई कोशिश भी
तर्ज तब फ़र्ज़ बन खुदगर्ज हो जाता है
अब इसे भाव समझें या कि असभ्यता
खिलता है मन तो दीवाना सा कह जाता है।
धीरेन्द्र सिंह
20.02.2026
06.45
बुधवार, 18 फ़रवरी 2026
गलगोटिया
गलगोटिया विश्वविद्यालय का आतिथ्य है
रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है
मौलिकता की हो रही है भूख हड़ताल
नैतिकता की इसमें करे कौन पड़ताल
आवरण आकर्षक लगे क्षद्म व्यक्तित्व है
रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है
भूत-भविष्य नहीं वर्तमान की है बातें
हिंदी वाले समझें आग सा न इसे बांटे
चीन का रोबोट कुत्ता में क्या लालित्य है
रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है
सजता है मंच रहते बैठे कई हिंदी डॉक्टर
उबासी लेती पुस्तकों पर बातें तथ्य हटकर
बजती हैं थकी तालियां ऐसा ही कृतित्व है
रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है।
धीरेन्द्र सिंह
19.02.2026
08.15
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026
तड़के
आप मेरे मन में
होती हैं उदित कई बार
जैसे सागर से उभरे
सूर्य लिए ऊर्जा द्वार
तर्क की कसौटियां लुभावनी
भावना तो बयार पावनी
आप भी पुरवैया बयार
सुगंध की लिए कतार
मन में उभरे लिए छटाएं
भाल तक पहुंच गुनगुनाएं
स्पंदित हो जगे सहस्त्रधार
यही है आपके उभरने की कतार
तड़के खुली पलकें था प्रकाश
मन आलोकित सत्य करता तलाश
आप उभरें मन तत्पर करे करार
कल्पनाओं को करे कौन स्वीकार।
धीरेन्द्र सिंह
18.02.2026
04.46
सोमवार, 16 फ़रवरी 2026
छोड़ जाता हूँ
अपने लिए जो रचता हूँ
जुड़ खूब उससे सजता हूँ
लचकती डाल सा मोड़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
नित संपर्कियों को पढ़ता हूँ
उत्कर्ष हो ध्येय लेकर रचता हूँ
भटकते भाव लेकर ओढ़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
प्रतिष्ठा को कनिष्ठा सा समझता हूँ
निष्ठा को समझ ऊर्जा दहकता हूँ
अगन के दहन में दिए जोड़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
न छोडूं तो कैसे जी सकता हूँ
अटक जाऊं धीमी आंच पकता हूँ
निरन्तर नित नया रच दौड़ जाता हूँ
फिर वह रचना छोड़ जाता हूँ।
धीरेन्द्र सिंह
17.02.2026
10.31
शनिवार, 14 फ़रवरी 2026
प्रतिकार
अस्वीकार जब तिरस्कार हो
बिन बोले तब धिक्कार हो
मुहँ मोड़ना होता है तभी
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
तत्क्षण का विरोध अस्थाई
रोष संग यह साथ निभाई
अनियंत्रित उठता गुबार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
अपनापन कोई भेद न माने
ऊंच-नीच हो जाय अनजाने
आकर देहरी अस्वीकार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
अर्थ का अनर्थ निकाला जाए
भाव कलुषता डाल भड़काए
जब छूटता लगे अधिकार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो।
धीरेन्द्र सिंह
14.02.2026
16.09
मंगलवार, 13 जनवरी 2026
कूद-फांद
कूद-फांद कर निनाद
जाने कौन छुपा मांद
समय बदल रहा क्या
अभय मचल रहा क्या
पिघल रहा अब विषाद
जाने कौन छुपा मांद
शब्द हैं कालिख पुते
भाव घृणा को जपे
असुरा गूंजे है निनाद
जाने कौन छुपा मांद
शब्दभेदी क्या चले बाण
एकलव्य हैं कई निष्णात
तड़पन बने धड़कन संवाद
जाने कौन छुपा मांद।
धीरेन्द्र सिंह
14.01.2026
06.18
सोमवार, 12 जनवरी 2026
परछाईं
जी रहे हैं खुल जीवन जुगत भरी चतुराई में
और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में
अपने दिल की धड़कन की चिंता सबको है
अपने खिल हो जाएं पुलकित निजता वो है
क्या-क्या रहे छुपाते जीवन की तुरपाई में
और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में
यादें रंग-बिरंगी फीके प्रभाव में करें आलोड़न
पीड़ाएं दुबकाए कोने हृदय करे प्रायः प्रभु भंजन
जीवन कितना दिया -लिया पारस्परिक बहुराई में
और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में
क्या समझे कितना समझे जब चिंतन हो उथले
जिसको जितना समझा जीवन वैसे थापे उपले
जीवन जोड़-घटाना कर भरी अकुलाहट रंगराई में
और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में।
धीरेन्द्र सिंह
13.01.2026
14.45
शुक्रवार, 9 जनवरी 2026
धारदार
शब्दों की धार पर
कामनाओं की तपन
विचार भी चलें कैसे
धारदार हुई जो अगन
स्वार्थ एकमात्र सिद्धि लगे
चाहतों का हो जतन
विचार भी चलें कैसे
धारदार हुई जो अगन
जिसकी लाठी उसकी भैंस
यह मुहावरा प्रचलित सघन
विचार भी चलें कैसे
धारदार हुई जो अगन
जनचेतना नित घायल होती
मनवेदना कलुषित उपवन
विचार भी चलें कैसे
धारदार हुई जो अगन।
धीरेन्द्र सिंह
09.01.2026
18.21

