शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

नवरात्रि

आदिशक्ति वंदना देहभक्ति अभिव्यंजना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना



नवरात्र के सभी पात्र विश्व के हैं क्षात्र
शक्ति उद्भवन पल्लवन विजय सुपात्र
भक्ति आराधना से गूंज उठे हर अंगना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना

मन कुलषित ले भाव, उल्लसित प्रभाव
ऐसे होते कपटी और धूप पिघलती छांव
मर्दन मात्र विकल्प यदि लेशमात्र समझ ना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना

व्रत, उपवास, भक्ति मात्र मन की ना शुद्धि
नीतिकौशल, रणकौशल में भी होती वृद्धि
शक्ति जिसकी उच्च आसक्ति की प्रवंचना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना।

धीरेन्द्र सिंह
11.10.2026
03.51

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

धाराएं उन्मत्त हैं

जमीन जिद कर सादगी की है बात कह रही
धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रहीं नदी



व्योम के रंग में परिवर्तन का हो रहा प्रयास

भीड़ यह नई लग रही प्रयोजन हैं कुछ खास

दिन समीक्षक बन रही बोल कैसी रही सदी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी


चप्पुओं का बहुत जोर है जल में भी शोर है

उजाले के समक्ष लौ कहे उसका अंजोर है

असमंजस में किनारा क्यों चर्चित शताब्दी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी


जनभाषा बीच मुखर हो उठी वीडियो भाषा

सबकुछ ढल जाता अनुरूप जैसी हो आशा

क्या सत्य क्या असत्य मच रही है खुदबुदी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी।

धीरेन्द्र सिंह
10.41
08.10.2026

गोदौलिया

आप आकर गोदौलिया में मुझसे न मिलीं
यह एक बात या राह अदाओं की खिली



गोदौलिया में बेंच पर बैठा आपसे चैट किया
झूमर, बैग वाले के पास हूँ फोटो से बता दिया
वाराणासी में अनुभूतियां झलकती हैं दिली
यह एक बात या राह अदाओं की।खिली

कुछ देर तक चैट में अपना सब बता दिया
विचारों के लेनदेन से जला भाव का दिया
धूप तेज दोपहर में शाम बारिश झूम मिली
यह एक बात या राह अदाओं की खिली

शाम फोटो भेज आपने कहा आप वहीं थीं
व्यक्तिगत मिलना न चाहीं शायद मुझमें कमी
शाम वर्षा झड़ी बीच मेरी पलकें भी थीं गीली
यह एक बात या राह अदाओं की खिली।

धीरेन्द्र सिंह
08.10.2026
09.34

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

यादों में

आप यादों में इस कदर तो आइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए



हर आहट में बेचैनी सी छटपटाहट
कामनाओं में भी होती है घबराहट
स्वप्न बनकर मन को ऐसे भरमाइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए

आप एक याद एक फरियाद युक्त
थाप जीवन की बिन आप उत्सुक
हवा सुगंध मिली जैसे महक जाइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए

कहां भटक गए या मुझे भूल गए
तलवे से हृदय तक शुष्क शूल हुए
इतनी उपेक्षा प्रतीक्षा जैसे न लहराइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाईए।

धीरेन्द्र सिंह
07.10.2026
06.46



शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

मन

मन मोह के दर्पण का अनुरागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

अकुलाहट भरी अभिव्यक्तियों की भीड़
कुलबुलाहट धरी आसक्तियाँ का नीड़
कर्म के नियुक्तियों में बड़भागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

कब चल पड़े अनचीन्ही डगर बौराया
चाहत का चादर में लिए मोहमाया
हर कदम मन का लगे बागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

मन घूमता है जैसे घूमते हैं ग्रह, नक्षत्र
मन ढूंढिए मिल जाता है भटकते सर्वत्र
मन भी तो चाँद सा निर्मल दागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है।

धीरेन्द्र सिंह
03.10.2026
04.59

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

यश-अपयश


यश-अपयश प्रभु हाँथ सबने पढ़ा है
क्या जीबन में सब कुछ ईश गढ़ा ह

व्यक्ति की आसक्तियाँ लांघती भित्तियां
कौन जाने किस गति में कौनसी नीतियां
अनपढ़ भी यज्ञ लगे लिखा-पढ़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गढ़ा है

बर्तन सा बज रहे हैं आजकल के परिवार
नर्तन करते भाव कर न पाते ठीक श्रृंगार
सजना-संवरना कृत्रिम में मानव पड़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गढ़ा है

प्रारब्ध और कर्म संग धर्म की आपाधापी
हर राह में इध्वर दिव्यलोक की हो मापी
ईश्वरीय परिवेश सृजन में आलोचना अड़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गधा है।

धीरेन्द्र सिंह
02.10.2026
05.42

बुधवार, 30 सितंबर 2026

थपथपाहट

दर्द, कसमसाहट, छटपटाहट मिले आहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट



जग क्या है दूसरों के भावनाओं की चाहत
अकेला रहे व्यक्ति तो आसक्ति की गर्माहट
विलय होना क्या मानव मन की है नर्माहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट

किसी के होने मात्र से मन होता सुगंधित
क्या ऐसे रिश्ते सहज या होते हैं आयातित
किसी की चाह में होती क्यों है घबराहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट

सभी अपने जीवन को चाहें खूब सजाना
पर न आता सबको सही वक्त चाह जताना
मिला न मन भरा मिलन की है बड़बड़ाहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट।

धीरेन्द्र सिंह
01.10.2026
07.03


मंगलवार, 29 सितंबर 2026

आप उपवन

आपने कुछ शब्द लिखा भींग गया मन
इतनी सुगंध तरलता भरी आप उपवन



अंदाज आपका कैसे सबसे अलग है लगता
पर्वत से जैसे मद्धम गति बहता हुआ झरना
आप कौन हैं क्या हैं कैसे झंकृत मन आंगन
इतनी सुगंध तरलता भरी आप उपवन

लिखते ही रहतीं आप पोस्ट करते रहती हैं
जंगल में जैसे उन्मुक्त हवा बहते रहती है
भाव झोंके आपके रंग सुंदर करें हैं चमन
इतनी सुगंध तरलता भरी आप उपवन

इस उपवन में मनभाव को मिलता विश्रांति
आप लगन भाव की अधरों की मधुर कांति
एक खयाल आप मेरी कल्पना की दहन
इतनी सुगंध तरलता भरी आप उपवन।

धीरेन्द्र सिंह
30.09.2026
07.22

रविवार, 27 सितंबर 2026

एक तिनका

जलधारा, जीवनधारा
प्रकृति जीव आधारा
संगृहित भाव जगे
सुदूर से कोई पुकारा






भावनाओं की सरणी
कामनाएं जल सकारा
किसका वेग प्रबल है
तट किनारे प्रवाह ललकारा

हे नदी तू सखी
हम दोनों की धारा
दोनों प्रवाहित युगों सदी
मनुष्यता को है संवारा

आज मन विचलित लगे
प्रणय ने है हुंकारा
एक तिनका उनके मन का
सहेज मुझे दे जलधारा।

धीरेन्द्र सिंह
28.09.2026
10.10

उम्र का ढक्कन

प्रणय की लौ पर उम्र का ढक्कन लगा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है



लौ न बुझती उम्र दहकता बहकता बेचैन
पौ न फटती प्रीत की उमड़ते घुमड़ते नैन
कौन बांधा प्रीत सरणी सांस में यौवन बंधा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है

कह रहे उम्र बड़ी पूजा-पाठ भजन की घड़ी
चेतनाएं चुलबुली हो चाहती लगन की अड़ी
प्यार में ईश्वर नहीं क्या भक्ति का दोहन लगा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है

अंकल आंटी, दादा-दादी सुदूर की जैसे घाटी
जीवन हलचल मुक्त हुए सन्यास की है परिपाटी
हृदय उम्र से दूर लपक-लचक धुन अगन मचा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है।

धीरेन्द्र सिंह
28.09.2026
07.02

शनिवार, 26 सितंबर 2026

कौन किससे

कौन किससे निबद्ध है कहाँ कैसे आबद्ध है
यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है



यह मुझे सहयोग दे वह पूर्ण अपना समर्थन

सुविधा लाभ मिला करे होता रहे आवर्तन

आदर्श, सिद्धांत, नैतिकता लगता स्तब्ध है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है


अधिकांश पढ़ते रहते अपने धर्म की पुस्तक

सारांश तक झलके नहीं कामनाओं की दस्तक

धर्म भाव सब एक कहें इसपर चर्चा निःशब्द है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है


विपक्ष, विरोध हंगामे का प्रयोग सब उपद्रव

भौतिकता की चमक-दमक फिर भी पराभव

अंतर्मन की ज्योति बुझ रही गुट लयबद्ध है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है।


धीरेन्द्र सिंह

27.09.2026

08.25

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

मनुष्य

रोपता नहीं हूँ बल्कि छींटता हूँ
ढकेलता नहीं बल्कि खींचता हूँ
पल्लवन संभावना जहां भी दिखे
मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ






मनुष्य हूँ प्रबुद्ध हूँ संयुक्त हूँ

आत्मा अजर अमर से युक्त हूँ

चुनौतियां मिले आंख न मींचता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ


प्यार ले शुमार हूँ एक खुमार हूँ

व्यक्ति-व्यक्ति गढ़ सकूं कुम्हार हूँ

मनुष्यता का ना कोई रिक्तता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ


व्यक्ति का अस्तित्व हूँ नियुक्ति हूँ

मनुष्य हूँ मानवता की आसक्ति हूँ

मैं, तुम, यह, वह विलग कर उन्मुक्तता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

26.09.2026

08.18
 

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

कौन छूटा

कौन टूटा, कौन रूठा जग की यह बात है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है



साथ चलता कौन है यह लोकप्रिय भ्रम है
भीड़ हो या नाते-रिश्ते पसरे बहुत वहम हैं
कौन  छूछा, कौन भूखा सदियों के हालात हैं
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है

चल रहे अकेले अनुभूति कहे सब साथ हैं
लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं लगे एकलाक्षीय बारात है
कौन लूटा, कौन झूठा जग में यही चर्चा नाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है

विश्व यह माया है सबसे झूठी यह काया है
स्वार्थ जहां थम गया ठौर वही मन भाया है
कौन अनूठा, कौन अटूटा चलता यही विवाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है।

धीरेन्द्र सिंह
25.09.2026
05.30

बुधवार, 23 सितंबर 2026

यह कैसे रचनाकार

 समूह में
जब कभी भी
पढ़ता हूँ
प्रकाशित पुस्तक की
कोई रचना 
या कोई अंश
दया आती है रचनाकार पर
शेष नहीं रहा लेखन अंश,











बुरा लग गया ?
क्यों रचनाकार जी
समूह क्या 
शीत भंडार गृह है
जहां वर्षों पहले रचित को
भंडारण के लिए डाला जाता है
या कि रचनाकार जी
नया मौलिक लेखन से भी नाता है ?












रचनाकार हैं, कल्पनाशील हैं
फिर अपनी रचना का
बने क्यों वकील हैं ?
चिपका देते हैं पुरानी रचना
समूह का उद्देश्य नहीं सामान्य
रचे विगत साहित्य का ढकना,
क्या चूक गए हो रचनाकार
भूतकाल की रचना विज्ञापन
करतेअनचीन्ही झंकार,













समूह में
जब कभी भी
पढ़ता हूँ पूर्व प्रकाशित रचना
रचनाकार का प्रचार-प्रसार लगे
जिसकी सूख गई है कल्पना
बीते कल लिए आज में सजना।









धीरेन्द्र सिंह

23.09.2026

13.21
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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

यह भारत है

बहुबोली, बहुभाषाएँ संग हैं नव आशाएं

धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए


धर्म संकुचित करने पर कुछ लोग आमादा
भाषा जिसमें उभर रही है ओढ़े भाव लबादा
राष्ट्रीयता के ओर-छोर पर तिरंगा है लहराए
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए

प्रजातंत्र है मौलिक अधिकारों की आजादी
यह क्या भाषा-धर्म की इतनी प्रखर मुनादी
मानवता का सेतु सुहाना ऐसे कैसे बनाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए

सर्वभाव, सर्वधर्म, सर्वभाषा के हैं अनुरागी
यह भारत है हिलमिल, झिलमिल का रागी
कुछ हंगामे, कुछ हलचल को मुद्दा ना बनाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए।

धीरेन्द्र सिंह
23.09.2026
06.04


सोमवार, 21 सितंबर 2026

आपके नाते

मजबूर कर रही हैं आपकी बातें
दिल झुक रहा है आपके नाते



हर पोस्ट आपकी भावना दर्शाती

क्या सोचती जाएं आप है बतलाती

कुछ कल्पना आपकी कुछ बीती बातें

दिल झुक रहा है आपके नाते


मन महक उठता है बहक उगता है

भावनाओं की भूख में चहक चुगता है

आप उभर उठती हैं संभावना बांधे

दिल झुक रहा है आपके नाते

आप क्या हैं किसकी हैं फर्क नहीं
जीवंत हृदय स्वामिनी हैं तर्क नहीं
बस आकर्षण आपका दिल मेरा साधे
दिल झुक रहा है आपके नाते।

धीरेन्द्र सिंह
22.09.2026
03.59

रविवार, 20 सितंबर 2026

लौटा दिया

मुझे ना बुलाती मुझे ना सुनाती
है दुनिया में अपने दुनिया सजाती
है गुस्सा बहुत देखना नहीं चाहे
लगन है यह मेरी मुझी से छुपाती






बहुत था जतन थे बहुत से भी वादे
गगन में सहन था बादल थी सजाती
थे हतप्रभ निरख सज्जा सब विहंगम
धुन अपने में थी बढ़ती मुझको छुपाती

दरवाजे से मुझको लौटा दिया था
पहले देहरी मेरे आगमन पर थी सजाती
क्यों आए चले जाओ बोल थी खड़ी
क्षद्म नाराजगी में वेदना को।छुपाती

कई वर्ष बीते यादों से हैं ना रीते
जिंदगी भी है जिंदगी को सजाती
कुछ ना टूटा ना छूटा स्पंदन वही है
धड़कन अक्सर है अब तड़पन छुपाती।

धीरेन्द्र सिंह
21.09.2026
08.21

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

ऑनलाइन प्यार

भावनाएं उभरती हैं अभिव्यक्तियां अपरम्पार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार



गुण कोई होता है कर लेता सहज आकर्षित

हर भाव, सुगम भाव चाहने को रहता व्यथित

मिल जाता कोई अनुकूल, उठता भाव गुबार

श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार


मोबाइल के स्क्रीन पर हर बात लगे रसभीनी

शब्दों के फुहार में मिले सुगंध प्रीति नव चिन्ही

हृदय धड़कता विनय से कहता मीठा लगे दुलार

श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार


जब चाहें तब चाह उकेरे दिन हो या रात, सबेरे

अभिलाषाएं अनंत हैं क्यों बंदिश में खुद को घेरें

दूरी चाहे कितनी हो मजबूरी का ना रहे बुखार

श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार।


धीरेन्द्र सिंह

19.09.2026
06.59


गुरुवार, 17 सितंबर 2026

अपनी छांव

 हर व्यक्ति अपनी छांव का गांव है

जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है


मन की भूमि पर कई नई उगती फसलें

कामनाओं की मंडियों में भाव हैं उजले

बेचने-खरीदने का ही सबका स्वभाव है

जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है


मस्तिष्क के ट्रैक्टर से काम सब हो रहा

भावना की बदलियों से सब सिंचित हो रहा

समाज की विविधताओं का दबाव है

जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है


भीड़ की आदत है पर स्वभाव चाह अकेला

स्वयं की तलाश में जीवन का है कई खेला

बढ़ सका व्यक्ति शक्ति उसके ही पांव हैं

जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है।


धीरेन्द्र सिंह

18.09.2026

07.19



बुधवार, 16 सितंबर 2026

सेवानिवृत्ति

तट पर बैठे सोचें क्या, बढ़िए नाव की ओर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर



कितना और निरखना मनवा जग की झांकी
अपने भीतर पैठ गए तो झलकी मिलती सांची
चलिए ढुकिए नीरवता में नहीं इतना बाधक शोर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर

राजनीति यदि गांव में उसमें क्यों ही उलझना
मिल बैठ ना मिलिए संग रह चर्चा में आलोचना
शांत अबाधित परिवेश ऐसा न मिले ठौर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर

पुरखे यही बसे हैं उनका है बरसता आशीष
कुलदेवी की निगरानी में मिल जाते जगदीश
अपनी भाषा अपनी संस्कृति व्यक्ति का सिरमौर
अपनेपन से मिलना है तो चलें गांव की ओर।

धीरेन्द्र सिंह
17.09.2026
09.42

रविवार, 13 सितंबर 2026

हिंदी दिवस 2026

साकार है ईश्वर है या कि निराकार
हिंदी का सजता है इसीलिए दरबार

संविधान ने हिंदी को ईश्वर बना दिया
विधि का पहना चोला सत्ता दिखा दिया
सरकारी कामकाज में हिंदी है हाहाकार
हिंदी का सजता है इसीलिए दरबार

सरकार तो कहे पर सरकारी संस्थाएं
हिंदी में पद बढ़ाएं पर न हिंदी बढ़ पाए
हिंदी की प्रगति बस हिंदी के पुरस्कार
हिंदी का सजता है इसीलिए दरबार

संघ की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित
सह-राजभाषा रूप में अंग्रेजी है स्थित
सह-राजभाषा का कामकाज में झंकार
हिंदी का सजता है इसीलिए दरबार

राजभाषा के जुझारू लोगो की जय हो
देवनागरी लिपि जीवित रहे विजय हो
गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग करे हुंकार
हिंदी का सजता है इसीलिए दरबार।

धीरेन्द्र सिंह
14.09.2026
04.46

शनिवार, 12 सितंबर 2026

आगमन है

आगमन है आपका, आचमन है आपका
सत्य है उभरता फर्क सिर्फ जाप का



सिद्धिविनायक आप, जन नायक है आप
प्रथम पूजनीय हैं जग के विनायक हैं आप
आपकी अगवानी में सर्व द्वारपट विश्वास का
आपकी कृपा रहे पूर्णता हो हर आस का

आगमन है आपका, आचमन है आपका
सत्य है उभरता फर्क सिर्फ जाप का

वक्रतुंड प्रचंड मुंड छांट देते सभी धुंध
गणेशोत्सव पर्व है गणपति बप्पा सिंधु
आस्था का हर्ष है गण-गण प्रकाश सा
गणपति वंदना हर सांस है रहा गा

आगमन है आपका, आचमन है आपका
सत्य है उभरता फर्क सिर्फ जाप का।

धीरेन्द्र सिंह
13.09.2026
06.45

शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

हे गणेश

 हे गणेश

आप अशेष

देश क्या

पूजे विदेश


प्रथम आराध्य नमन

सृष्टि में सुलभ गमन


बुद्धि के प्रणेता

सन्मुख सदा उपस्थिति

फल देते वैसा ही

जैसी जिसकी नियति


गणपति दूर करें वहम

सुमति दृष्टि में रहे सुगम


सृष्टि में विधान है

आप में ज्ञान है

वृष्टि कई भावों की

आप में ही ध्यान है


गजानन को अर्पित सुमन

मनन मुग्धित करे नमन।


धीरेन्द्र सिंह

12.07.2026

07.47

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

मन

कब झांका व्यक्ति दिल से मन के उपवन में
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन में



सूर्य मात्र ऊर्जा नहीं दर्शाता सभी दिशा है
उपद्रव, उत्पात, उफनती सक्रिय निशा है
दिल है सब समझता पर व्यक्ति करता दमन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है

मन अति विशाल गहरा मात्र झांक सकते हैं
उपवन सुगंधित रंग-बिरंगा माँज सकते हैं
इतना प्राकृतिक वैभव फिर कैसे उभरता दहन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है

मन के उपवन में व्यक्ति जब उन्मुक्त घूमता
नभ की ऊंचाइयों में तब सत्य को चूमता
मन धरा-गगन मन पुलकित चंचल चितवन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है।

धीरेन्द्र सिंह
05.09.2026
07.22

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

कृष्ण

सृजन की वेदना कब समसीतोष्ण है
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

उकेरी भावनाओं में मौलिकता नही मिलती
संकरी कामनाएं हो तो भौतिकता कहीं मिलती
जीवन है प्रवाह जहां सब लगते तृष्ण हैं
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

जन्म से किए अनुभव संघर्ष और वेदना
कुछ जिए कुछ जताए जिंदगी की चेतना
जैसे देखें हैं दिखते क्या बहुरूपिया मृण हैं
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

आराधना संग साधना की कामना है जरूरी
भक्ति उद्भव स्वयं का नहीं कभी मजबूरी
भवसागर में बहता हर जीव मात्र तृण है
मानव जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं।

धीरेन्द्र सिंह
04.09.2026
08.38


सोमवार, 31 अगस्त 2026

भावनाएं

आप शब्द हैं अभिव्यक्ति हैं आसक्ति हैं
स्वीकारिए या नकारिये आपकीं मर्जी
दिल भावनाओं का चितेरा है एक आम सा
बुनता है कल्पनाएं सिलता जैसे दर्जी






उम्र की उलझनें मष्तिष्क की कतरनें है बोलती
जीवन है भिन्न-भिन्न अनेक प्रकार की खुदगर्जी
जियो तो ऊष्मा सकारात्मकता है चहुँओर फैला
अन्यथा उलझनें, चुनौतियां अनुभूति की सर्दी

तर्क क्या है समाज रचित एक परिकल्पना 
मर्म क्या है निजता जड़ित एक युग्म अर्जी
व्यक्ति भावुकता को छोड़ दुनिया की सोचता
व्यक्ति है कहाँ सम्पूर्ण टुकड़ों में भाव दर्जी

सुगंध का एक चितेरा पर कहीं दूर बसेरा
जीवन का यही क्रम कहां टूटी कहीं लरजी
क्या खूब दबाया है संस्कार में जीवन भी
जब अवसर मिला चाहतें क्या खूब हैं गरजी।

धीरेन्द्र सिंह
31.08.2026
16.42



रविवार, 30 अगस्त 2026

मनुष्य की बात

उपलब्धियों पर मुस्कराहटों के उपहार
परिलब्धियों में टूटा बिखरा, लिया संवार
जो देख रहे वह नहीं अंतिम सत्य है
सूखे से लगते जख्म देते अक्सर चिंघाड़






सब ठीक है कह देना आदत बन गयी
ठीक भी है कहाँ कुछ देख रहा संसार
असफलताएं, विवशताएं हैं खूब सताएं
किस-किस से करे व्यक्ति अच्छा व्यवहार

भौतिक सुख साधनों से खुशियां नापते
हृदय संवेदना की बातें करते बस गंवार
भावशून्यता से प्राप्त कर रहे हैं अपने लक्ष्य
भावनाएं हाशिये पर पाकर अपनों से दुत्कार

बौद्धिकता कौन पूछता "चैट-जीपीटी" तो है
इंटरनेट बना मस्तिष्क संभावनाएं अपार
प्रौद्योगिकी तकनीक ही सच्चा लगता मीत
व्यक्ति खो रहा है व्यक्ति या कारण दुर्व्यवहार।

धीरेन्द्र सिंह
05.58

बुधवार, 26 अगस्त 2026

सत्य अड़ा है

बानगी तो देखिए सत्य अड़ा है

अचंभित है जग कहां पर धड़ा है


कुर्ता विशिष्टता का प्रतीक हो गया
गमछा संवर सिर से गले हो गया
नेतृत्व की कुर्सी में भविष्य पड़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है

शासित कहीं न दिखते सब ही शासक
शोषण वह प्रक्रिया है सब ही उपासक
लघुतम, लघु सत्ताएं परिवार पड़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है

चैनल विभिन्न की व्यावसायिक चतुराई
पत्रकारिता में सत्य को मिले निठुराई
जो देख रहा पढ़ रहा वैसा ही गढ़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है

आधे-अधूरे हैं पर पूर्णता का है दिखावा
आगे जमूरे हैं हर निपुणता में छलावा
शिक्षा है उच्चतम व्यक्ति क्या पढ़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है।

धीरेन्द्र सिंह
27.08.2026
06.29


मंगलवार, 25 अगस्त 2026

दृष्टि

कामना की याचना है और सृष्टि है
सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है



आप अपनी उलझनों के हैं पहरेदार

दूसरा अपनी समस्याओं का तारणहार

भावनाओं की सतत विभिन्न वृष्टि है

सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है


मोहक, सम्मोहक संवेदक विभेदक

चेतना के चपल चाह विज्ञ सचेतक

अभिलाषाएं पलक पर चंद्र समिष्ट है 

सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है


पढ़ना सब वस्तुतः असम्भव ही है

क्या सोचना बुरा यदि पराभव भी है
कर्मों का यह एक स्पष्ट प्रविष्टि है
सब पढ़ लिए हैं क्या ऐसी दृष्टि है।

धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
23.35

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रिश्ते

कुछ छूट गया खुद से कुछ छूट रहा है
जोड़ने को जीवन कोशिश में टूट रहा है
एक व्यक्ति नहीं व्यक्ति रिश्तों का झुंड है
छूटता हृदय नयन से अपनत्व ढूंढ रहा है






कमियां तो सब में है नर्मियों की है जरूरत
शब्दों में नमी जोर हो निभाव घुट रहा है
अहं के शंख से युद्ध की ही निकले ललकार
तर्कों से कब चला जीवन लगे उठ रहा है

मनभाव में अलाव प्रतियोगिता तो जलन भी
श्रेष्ठता की अंधी दौड़ में यथार्थ ऊंघ रहा है
शिक्षा की डिग्रियां जितनी ऊंचा तो उठे व्यक्ति
स्वार्थ की परिधि में घिरा गड़ा खूँट रहा है

कौन गलत कौन सही समझना नहीं आसान
दो में से एक सुविज्ञ जो मौन ठूंठ रहा है
सहने की हो क्षमता तो जीवन सौम्य, सुंदर है
लड़ने की गति में रिश्ता जीवन लूट रहा है।

धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
06.51



रविवार, 23 अगस्त 2026

गीत

गीत ही है जिंदगी गीत ही आधार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है



हौसले के फैसले चुनौतियों के वलबले
मीत के गीत उपलब्धियों के सिलसिले
प्रीति की प्रतीति ही बिहँसता संसार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है

मन स्पंदित श्वास सुगंधित परिवेश तरंगित
अर्चना की सर्जना में विलगाव है प्रतिबंधित
तार मन के जुड़ गए तो स्वर नए उपहार हैं
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है

कामनाएं घास सी उगती हैं मरती हर दिन
क्या बताएं चाह सजती हैं बिखरती छिन-छिन
एक तृष्णा एक बेचैनी गुप्त निज मनधार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है।

धीरेन्द्र सिंह
24.08.2026
07.57

शनिवार, 22 अगस्त 2026

सईयां

सईयां सात जनम नही धाए संग एहि जनम भाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए



सकल समाज हेरि लिए शक्ल नहीं दिखा पाए
हिया जिया संग पिया-पिया बोले क्यों ऐसा तरसाए
एक दरस की अरज है मेरी जन्मों में क्यों बहलाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए

चाहत की नई आहट थी नयन भरी जगमगाहट थी
रचि सुगन्ध परिवेश शुचि अकुलाहट मोह बुलाए
आप गरज को मरज ही समझे कितनी देर लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए

पल-पल कल-कल बहता हरदम मिलती नहीं फुहार
छल-छल ढल-ढल रहता संगम लौ भी लपक ना पाए
आज ही जीवन की दुनिया कल पर क्यों आंख लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीँ जी पाए।

धीरेन्द्र सिंह
23.08.2026
10.23

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

प्यार

मन का संतोष है भाव विशेष है निज झंकार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार



प्यार के कई विशेषण युगों से हो रहा विश्लेषण
हर रूप में प्यार जरूरी प्यार आवश्यक पोषण
प्यार समर्पण प्यार प्रदाता प्यार नहीं अधिकार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार

शिशु की निर्मल मुस्काहट बच्चों की शरारती आहट
किशोरावस्था की अनंत पेंगे युवावस्था की चाहत
हर उम्र में भाव प्यार के झूमे भव्य दिव्य उपहार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार

कभी पांव पाजेब पहन छम-छम ध्वनि सुनाए
कभी पलक उठते हुए दृग विद्युत ही बरसाए
कभी शब्दभरी फुलवारी में लहर सुगंध फुहार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार।

धीरेन्द्र सिंह
21.08.2026
18.08

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

अपने

तिलमिलाती जिंदगी संवरने को अति व्यग्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र



खींचतान में ढूंढें सब अपना ही आसमान
विश्वास लिए ऐसा जैसे हो मुक्त प्रावधान
प्यार अजेय ऊर्जा संग हो जाते हैं अभद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र

अपनों के समूह में रचते अपने चक्रव्यूह
सपनों के समूह में अपने जाते अक्सर दूह
अपनापन डरा रहा मुस्कराहट छिपे भद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र

जीवन प्रतियोगिता भरी साथ में है दृढ़ अहं
मैं बड़ा हूँ, श्रेष्ठ हूँ मैं जीवन में कहीं ना दोयम
थोथा चना बाजे घना सा सब ओर चाहें कद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र।

धीरेन्द्र सिंह
20.08.2026
21.11




बुधवार, 19 अगस्त 2026

जागना है

हर व्यक्ति की आराधना है साधना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है



एक लौ लपकती झपकती पूर्वार्ध है
एक भोर उभरती संवरती उत्तरार्ध है
आत्मचिंतन जो कहे वही जापना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है

तत्व के घनत्व में मर्म का निनाद है
शोर बहुत बाहर विवादित संवाद है
स्व की संगीत पर स्व को नाचना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है

जागना यह चित्त का अस्तित्व का भी
संवरना हर कर्म निज व्यक्तित्व का भी
मृदंग संग विहंग बन गगन छानना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है।

धीरेन्द्र सिंह
20.08.2026
07.42


मंगलवार, 18 अगस्त 2026

शब्द

शब्द अपने सदन में एकल पुखराज हैं
भाव अपने गगन में मूक सा सरताज है
अभिव्यक्तियां ही इनको सजाती रहतीं
भाषा इसीलिए व्यक्तित्व का हमराज है

गढ़ रहा है कथ्य भाषा तथ्य की अभिलाषा
पढ़ रहा जो वाक्य अर्थ कई मिजाज हैं
शब्द तह स्पंदन खींचे, भाव आंखे मीचे
शब्द की परिभाषाओं के संदर्भ अंदाज हैं

रंग बदलते ढंग बदलते रूप है अपरिवर्तनीय
शब्द अक्षर संयोजन से बनते गजराज हैं
पढ़ चुका जो गढ़ चुका वह भी कहीं अपूर्ण
संदर्भ गति से शब्दों का संभव यह राज है

सबकी अपनी शैली है भाषा ऐसे फैली है
शब्द चयन भिन्न हैं पर वाक्य के साज हैं
कल यही थे शब्द पर भाषा के तेवर और थे
जुड़ते इतर शब्द मुड़ते सम्प्रेषण रियाज़ हैं।

धीरेन्द्र सिंह
18.08.2026
20.48






शनिवार, 15 अगस्त 2026

पोस्ट आपका

आप मुझसे हर समय गीत का वादा करें
प्रणय पाहुन सा नित रोज ही मिलता रहे
हृदय आकुल हृदय व्याकुल को ही चाहे
भावनाएं कामनाएं योजनाएं सरसता रहे






हृदय संतुलन के लिए हृदय का आकलन
संगत हृदय जहां मिला संचय चलता रहे
मांग सकता नहीं प्रणय रण का चितेरा कभी
ताक-झांक सफलता का मन में खिलता रहे

कल्पनाएं संभावनाओं की निज पटरानी है
अलग क्या कह रहा यह दिलों में ढलता है
जीवंतता जिसमें रहे उनमें ही ऐसे भाव बहें
अन्य सुप्त जीते रहते जीवंत जलते रहता है

आपका सरगम अनोखा झंकृत बिन मुखौटा
शब्द लिपटे धुन, शब्द तान लिए ढलता है
प्रणय पंखुरी पल्लवन क्रिया आप में भी है
पोस्ट आपका प्रायः इसीलिए दमकता है।

धीरेन्द्र सिंह
15.08.2026
17.11


शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता के तंत्र में यंत्रवत क्यों रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें



परतंत्र होना मनुष्य की है असमर्थता
स्वतंत्र रहे जीवन आवश्यक है सतर्कता
मनभाव जो भी हैं निर्द्वंद्व होकर कहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें

मन को मारकर भी जीना है कोई जीना
मन ऊंचा रख प्रहरी सीमा पर ताने सीना
तिरंगा में लिपटा वीर सुरक्षा सींचते रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें

निर्धारित दिशा में बहना प्रगति है उत्थान
हर देश का है आदर पर अपना देश महान
तिरंगा हमारा भाल निरंतर ऊँचा करते रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें।

धीरेन्द्र सिंह
15.08.2026
07.02


स्मृति में

स्मृति में उभरे आपके भाव टटोलता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं



यह कैसे आज आप अचानक उभर गईं
विस्तृत सुजान नभ में विद्युत सी निखर गई
आह्लाद के संवाद के भाव समेटता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं

संकल्प कभी आप थे ना था कहीं विकल्प
ना जाने कैसे होते गया परिवेश सघन तल्ख
कोशिश यही थी जीवन में एक विशेषता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं

नयनों के चमक में है स्वागत आपका आगमन
अधरों पर बसी मुस्कराहट करे आपका नमन
चेहरे पर आप ही बसी हैं इसे मैं योग्यता कहूँ
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं।

धीरेन्द्र सिंह
14.08.2026

16.19

बुधवार, 12 अगस्त 2026

व्यक्ति और समाज

भावनाएं जग रही हैं अपनी ताल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में



व्यक्ति है अकेला या घिरा है समाज से
बस द्वंद्व लगे जीवन सामाजिक अंदाज से
परवश जी रहा है घिरा सामाजिक हाल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में

कड़ियाँ की कई लड़ियाँ लगती हैं बढियां
यहां यह वहां वह संबंधों की है फुलझड़ियाँ
आतिशबाजी यदाकदा होती मन चौपाल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में

धरती पर बसा है और गगन की चाह है
रिमझिम हैं फुहारें पर अगन की आह है
आंखें समाज की जैसे तांत्रिक कपाल मैं 
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में।

धीरेन्द्र सिंह
13.08.2026
10.08

सोमवार, 10 अगस्त 2026

जिंदगी

व्यक्ति भी एक किताब का हिसाब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है

पन्ने प्रति पन्ने फड़फड़ाते पलट रहे हैं
हर पन्ने से इंसान इतराते लिपट रहे हैं
पल सजाने की कोशिश दुल्हन माहताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है

जीवन है एक डगर या लाभ-हानि का लेखा
उलझा वही जिसने ऑडिटर की तरह देखा
कर्म यात्री सा जो चला वही आफताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब।है

कुछ प्यार के पन्ने कुछ संघर्ष की है ऋचाएं
जीते जहां पर जय मिली पराजय क्यों जगाएं
प्रणय जिनका भाग्य है वह ही नवाब हैं
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है।

धीरेन्द्र सिंह
11.08.2026
06.13