शनिवार, 4 जुलाई 2026

बारिश नीति

 बारिश के फुहारों सी है आपकी अनुभूति
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति



कल्पनाओं में सजती हैं प्रीति की कामनाएं
आकर्षण से रचती हैं रीति की भावनाएं
बात जब अभिव्यक्ति की हो संकोच प्रतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति







हृदय आत्म से जो ना संबंधित, वह मुखर हैं
कुछ भी कभी भी बोल दे, वह रहगुजर है
धड़कन, तड़पन ऐसे लोगों के लिए अतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति







बरस रही है झूम आपकी सभी सुंदरता
क्यों हो रही हिचक दिल में पर आतुरता
कैसे लोग कर लेते कईयों से प्रणय प्रीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति।







धीरेन्द्र सिंह
05.07.2026
11.16

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

उपवन मौन है

डंठलों को पूछता कौन है
उपवन यहां पर भी मौन है



पुष्प का अपार भार है संभाले
कंटकों की धार को भी सँवारे
सुगंध चहुँओर तरंग आध पौन है
उपवन यहां पर भी मौन है







बागबानी में डंठलों को दाना-पानी
पुष्प और कंटक की है जिंदगानी
कैंची कटा पुष्पडंठल सम्मान छौन है
उपवन यहां पर भी मौन है







है न कराहता ना उन्माद दहाड़ता
मौसमी प्रहार को मौन पछाड़ता
डंठल अनदेखे से सपनों का गौन है
उपवन यहां पर भी मौन है।







धीरेन्द्र सिंह
04.07.2026
07.57

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

एडमिन-मॉडरेटर

हिंदी के कई समूह लिए कई चक्रव्यूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह



समूह सदस्य संख्या अधिक पोस्ट कम
टिप्पणियां गिनी-चुनी लाइक भी बेदम
समूह संचालन अति कठिन चिंतित रह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह







नया चलन शुरू हुआ सदस्यों को रिझाना
पोस्ट ऐसी हो जिसे पढ़ कामना उभर जाना
यह श्रम है समर्पण है चमकाना समूह मुहँ
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह







कॉपी पेस्ट पर हैं जीवित कई हिंदी समूह
मौलिकता कहां से लाएं सदस्य सुप्त ऊंघ
कितनी करूँ प्रशंसा आसान कार्य नहीं समूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह।







धीरेन्द्र सिंह
03.07.2026
07.22
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मंगलवार, 30 जून 2026

पथप्रदर्शक

भटक रही नव पीढ़ी नए विचारों का ले अम्बार

उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार


सुधारना, संवारना नया प्रचलित यह कारोबार

प्रतिभा स्वयं निखरती पथप्रदर्शक कहें संवार

पिछली पीढ़ी सोचती नव पीढ़ी बुद्धू गंवार

उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार


"मोटिवेशनल स्पीकर" उभरती चतुर प्रक्रिया

वेद-शास्त्र, धर्मग्रंथ की नए शब्दों की क्रिया

नई पीढ़ी की उन्मुक्तता को कहें लगाएं कतार

उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार


हर बीज का अपना विकास निजी है पल्लवन

खाद-पानी-धूप मिले यथेष्ट खुला रहे उपवन

प्रतिभा होती विकसित नव चेतना की हुंकार

उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार।


धीरेन्द्र सिंह

02.07.2026

06.32

सोमवार, 29 जून 2026

बारिश में भींग जाएं

कई समस्या है, चिंताएं हैं, क्या चिता बनाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं

भींग जाना ही होता है उस पल को जी जाना
जी जहां ना लगे वह जीवन छल है हो जाना
सामाजिक मान्यताओं अनुरूप ढलते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं

जीवन की आपाधापी में बस दौड़ निरंतर दौड़
अभिलाषाओं की हो समीक्षा देखा जाए तौर
किनारे-किनारे संभलते मझधार से डरते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं

रस श्रृंगार भी झेल रहा है नव मिलावट का वार
भाव-भंगिमा, अदा अठखेलियों का कहां गुबार
देह सौंदर्य पर सतत गौर करते जीवन यूँ गवाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं।

धीरेन्द्र सिंह
29.06.2026
20.30


रविवार, 28 जून 2026

मन

किसको कहां मन ढूंढ रहा सब मस्त हैं
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है



विश्लेषण की क्षमता संतुलित हो संयमित
तथ्य उभरता स्पष्ट कर्म तदनुरूप नियमित
स्व से सृष्टि तक नियम पारदर्शी समस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है







एक समूह के बल पर नवनिर्माण प्रक्रिया
समूह गठन के लिए सर्वहितकारी क्रिया
निजता के जाल में निज हानि जबरदस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है







इसे न समझें काव्य प्रवचन की नई विधा
उस पीड़ा को समझिए जिसमें मानव बींधा
घर-परिवार अस्तव्यस्त व्यक्ति बाहर मस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य मस्त है।

धीरेन्द्र सिंह
29.06.2026
08.35





शनिवार, 27 जून 2026

दमक

 आप एक चमक हैं और आप एक दमक है

मेरी निजी कल्पाना की आप एक धमक है

शुक्रवार, 26 जून 2026

अर्चना

कैसे कहें उनसे अपनी निजी अभ्यर्थना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना



हृदय के स्पंदनों को छूकर हवा से बह गए


आप भी समझे ना समझे क्या वह कह गए
सबकी अपनी-अपनी दुनिया अपनी है सर्जना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना

प्यार की जब बात कहें बोले ईश्वर से प्यार
संसार यह भ्रमजाल है मुक्ति इसका द्वार
मानवीय प्रणय खड़ा आत्म देह की गर्जना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना

सत्य है कि सर्व परमऊर्जा के अंश हैं
प्रणय कहां निषेध धर्म में यह दंश है
समर्पण परमात्मा का आत्मा की ना दर्शना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना।

धीरेन्द्र सिंह
26.06. 2026
21.51

गुरुवार, 25 जून 2026

नाते तोड़ गयी

वह मुझे छोड़ गई और नाते तोड़ गयी
यह टूटन है क्या, नहीं विश्वास होता है
जीवन है जागृत है, उसपर आश्रित है
कुछ न बोली चल दी कहीं ऐसा होता है






हृदय में हाहाकार कैसा मृदुल अत्याचार
दर्द है, दुख है पर संभावना को न्योता है
मन ने किया समर्पण दिखला दी दर्पण
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है

वह मेरी भोर थी और महकती साँझ थी
आंच जिंदगी पर चलाई तेज सरौता है
घाव है दर्द है हमदर्द मन पर नहीं रोता है
कुछ न बोली चल दी कहीं ऐसा होता है

उससा जग में कही मिलटी न कोई दूजी 
सूझी क्या उसको टूटन ही मात्र मौका है
जितना मुझे सँवारी उससे न बढ़ सक कभी
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है।

धीरेन्द्र सिंह
26.06.2026
08.06


बुधवार, 24 जून 2026

लाठी-लाठी का भेद

उन्मुक्त कामनाओं का कैसे करें उल्लेख
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद



अपने मन की सुनें या समाज को गुनें


उभरती हैं दबती जाती हैं आह्लादित धुनें
परिवेश ही सुन धुन निकालता मीनमेख
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद

जब मन उड़ता, चाहे जिस ओर है मुड़ता
मात्र उन्माद नहीं रहता बल्कि भाव गूढता
कदम आगे-पीछे होते देख अनगढ़ विभेद
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती है खेद

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, गया सिखाया
सामाजिकता के कई स्तर हैं, गया छुपाया
अर्थ आधारित है जीवन लाठी-लाठी का भेद
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद।

धीरेन्द्र सिंह
25.06.2026
04.23

सोमवार, 22 जून 2026

कोचिंग क्लास

कोचिंग क्लासेस एक प्रचलित शब्द
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध 

व्यवसाय हो गयी है भारतीय शिक्षा
याद करो लिख दो उत्तीर्ण परीक्षा
रटंत विद्या में सक्रिय कोचिंग संबंध
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध

लखनऊ में कोचिंग क्लास जल गया
होनहारों संग देश भविष्य तल गया
खोया जिन्होंने बच्चे क्या है यह प्रारब्ध
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध

सख्त निगरानी में रखे जाएं कोचिंग
आत्महत्या, झगड़े, आगजनी है निंद
श्रद्धांजलि देती यह व्यवस्था निःशब्द
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध।

धीरेन्द्र सिंह
23.06.2026
03.15

फोटो रचना

श्रम को कर्म के भ्रम में लेना
जैसे खटिया बिन सजा बिछौना
श्रमिक उठाता बोझ को दिनभर
साँझ ना पाता खरीद खिलौना





मिलते है ऐसे वाक्य कई बोलते
जैसे कोई खाद्य संभाला हो दोना
कर्म को सिकोड़कर दे नए अर्थ
श्रम को दे दिए करीब का कोना

संलग्न फोटो को देखिए बोल रहा
गर्मी में प्यासा नहीं जल भगोना
नहीं जलाशय ना ही जल चमक
कबूतर की प्यास तड़प थका डैना

गमले की तलहटी तक पहुंच हुई
संकट हो भारी निराशा क्यों बोना
चोंच अपनी से बूंद रहा खींच है
इसे कहते मौलिक अविष्कार होना।

धीरेन्द्र सिंह
22.06.2025
19.37




रविवार, 21 जून 2026

बदरिया

बदरिया भरकर बरसने को आ रही
मन भींगने के लिए तैयार हो रहा है 
एक प्यास धरा का व्यक्ति का भी, कहे
गर्जना, पूरब दूर से पुकार हो रहा है






कुछ भी न होता अचानक, भूमिका बने
खुद को न हो पता यह क्या हो रहा है
व्योम में बदलियों भरी हुई असंख्य हैं
क्या बात बूंद एक बदली का भिंगो रहा है

कहां से चली कहां छाई कहां पर बरसी
दूजी बदरी टकराई विद्युत बरस रहा है
आकर्षण कहें या चाहत या जन्मों का खेल
सब कुछ तो पास है पर मन तरस रहा है

घर के शॉवर से भींगना भी जैसे बरसात
फिर क्यों मन उन्मुक्त बदरी निरख रहा है
बंधनहीन उन्मुक्त छाँवमुक्त जीना चाहे
आदिकाल से ही जीवन मौसम परख रहा है।

धीरेन्द्र सिंह
22.06.2026
07.25

शनिवार, 20 जून 2026

कहां प्यार है

सत्य है, समझ है, तार्किक विचार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है




कामनाएं, कुंठाएं, वर्जनाएं ही मुखरित
अर्चनाएं कैसे लुभाएं भ्रम  है प्रचलित
छल, मजाक,मस्तियों का यह संसार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है








फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम में सक्रिय
भाषा, भाव उनका देख दुखी रहे हिय
कितना नाटकीय हो गया दिल दुलार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है







होगी कहीं गूढ़ भावना जनित ऋतुवार
कहीं कोई भाव समझता होगा ऋतुसार
हृदय से हृदय मिले यही सत्य अंकवार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है।







धीरेन्द्र सिंह
21,06.2026
22.23

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शुक्रवार, 19 जून 2026

जग रीत

जो बहता है वह सहता है यही जग रीत

कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत


बहता है जो मन साफ है मान प्रतिष्ठा साख है

संयमित प्रवाह से संचालित अप्रयोज्य साफ है
अपनी लय में चलता, बढ़ता है अघोषित उम्मीद
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत

उत्सव से वह अप्राभावित जीत में रहे निष्काम
कर्म ही उसकी पूजा सभी लक्ष्य हों जैसे धाम
अवसरवादी घर के कहते उनके प्रयास की प्रीत
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत

अनबोले अनचीन्हे रहते कर्म राह के दीवाने
अपनों को सुख सुविधा देते यह अथक परवाने
हर घर में एक ऐसे व्यक्तित्व हरदम हों प्रतीत
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत।

धीरेन्द्र सिंह
20.06.2026
04.02




बुधवार, 17 जून 2026

धमाल तुम बवाल

भोर तड़के जो टूटी नींद क्या करार धरूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ



मन है ढूंढता उस टूटे हुए क्षण की धमक
खिली थी जिंदगी महकती बहकती चमक
अब भी क्या छूटा जिसपर न अख्तियार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ

पौ फटी नहीं पसरा हुआ सन्नाटा है पुरजोर
न जानूं प्रीत आश्रित है सामाजिक गठजोड़
उभर आई हो चेतना में क्यों न अभिसार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ

न फोन न चैटिंग न वीडियो कॉल हो रहा है
जो कट गया छंट गया यह काल कह रहा है
कपाल में धमाल तुम बवाल आओ सत्कार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ।

धीरेन्द्र सिंह
18.06.2026
05.02


मंगलवार, 16 जून 2026

बांध दी चोटियाँ

भोर को मुट्ठी में पकड़ बांध दी चोटियां
शोर पवन का उठा उभर पड़ीं घाटियां
मेघ मुस्कराते रोके सूर्य रश्मियां सगरी
आप ही पुलक प्रातः करा दीं मुनादियाँ






मद्धम अंधियारा छाया मंथर चहचआहट
मंदिरों के पट खुले अधर मंत्र युक्तियां
आभामंडल आपकी करे सहज आकर्षित
अर्चनाएं नव सृजित कई प्रबल आसक्तियां

भोर की शरारत है सहज मुट्ठी विराजित
मेघ का सहयोग है मिली सूर्यरश्मियां
एक चाहत बिन आहट कर रही थपथपाहट
भोर कलरव उठ रहा है देख नव नीतियां।

धीरेन्द्र सिंह
16.06.2026
16.36


सोमवार, 15 जून 2026

भ्रष्ट

देश भ्रष्ट है या कि समाज भ्रष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है




यही कथ्य है सत्य के स्वरूप सधा
नेपथ्य में क्या हो रहा कहीं से नधा
सदा में अनुगूंज वही पर अस्पष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है

सत्य मार्ग की प्रचलित हैं परिभाषाएं
गौरव के जो प्रतीक वहीं शीश नवाएं
बौद्धिकता वस्तु बनी तर्क कष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है

एकल है व्याकुल गति जिसकी ढुलमुल
समाज है गुरुकुल प्रीत जिसकी थुलथुल
देश है संघर्षरत समूह पड़े तटस्थ हैं
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है।

धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
18.29


रविवार, 14 जून 2026

क्यों

ऑनलाइन समूह परिचित हो कामना नहीं
मैंने जो लिखा लोग सराहें यह याचना नहीं
क्यों भेजूं मित्र अनुरोध होता इसमें है क्षोभ
रचना है यदि आकर्षक प्रशंसक मांगना नहीं




 

मन कहे वही लिखें भाव का निभाव सींचें
अन्य लेखन स्वभाव से अक्सर सामना नहीं
बुन रहा है जिंदगी को अनवरत अथक मन
भावनाओं के बुनकर को अनर्थक जागना नहीं

छप गया तो क्या हुआ कितनों ने है छुआ
इधर छापो उधर बांटों नहीं लेखकीय साधना
नहीं कागज कलम अभ्यस्त टाइपिंग रखे मस्त
लिख दिया पोस्ट हुआ भाव महके मन आँगना

जब अपरिचित लाइक या करते हैं प्रतिक्रिया
लेखन होता प्रोत्साहित जैसे दधि जामना
झुंड में हुडदंग बस आपसी क्षद्म प्रशंसा तंत्र
साधना एकल है होती जिससे भाव जागना।

धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
07.45



शनिवार, 13 जून 2026

महुआ

महुआ सी चू गयी छाप पसरी मादकता
प्रभाव आपका या मन उड़ान अधिकता
सम्मोहन की होती अनेक परिभाषाएं भी
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता





चिहुंका था मन पाकर महुआ का वह गंध
प्रस्फुटित चेतना में भाव कहे तर्क करे दंग
महुआ की धरा से गुरुत्वाकर्षण की समीपता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

आदिवासियों से अतिवादियों तक है बड़ी चमक
चेतना के तारों को करती झंकृत है कड़ी धमक
सत्य हो निगाह की या भाव की यह यांत्रिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

इसी पेड़ पर या किसी मेड़ पर चू जाता है महुवा
राह को प्रदीप्त कर विक्षिप्तता मिटाता है महुवा
आप महुवा हैं हर लेती दर्द हमदर्द की मौलिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता।

धीरेन्द्र सिंह
13.06.2026
22.03





रविवार, 7 जून 2026

सुनो

सुनो कुछ लिखो तुमको पढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं

जब तुम कहती हो बहती हो बन नदी
प्रवाह की तरंग में निभाव की खुदबुदी
भींगे तट पर पांव नंगे धुन बढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं




शनिवार, 6 जून 2026

धुन

आज में डूबकर उम्र जीते रहें

अपनी धुन में ही रहा कीजिए
मुग्ध होकर कई सुन रहें आपको
जैसे कहते हैं अक्सर कहा कीजिए




क्यों चुपचाप हैं बोलते पदचाप हैं
सुननेवाले कहें भाव बहा दीजिए
मिलते पागल भी हैं जिंदगी में बहुत
शब्द की चांदनी को गढ़ा कीजिए

जिससे टूटे हैं वह रह गए हैं कहीं
जख्म सूखे पल्लवन हरा कीजिए
हो रही है घुटन लंबी खामोशी से
नज़्म टूटे हुए हैं दवा दीजिए

आपकी खातिर लिख रहा है हृदय
स्वर में अपने इसे गुनगुना लीजिए
शब्द की बानगी को धुन तो दीजिए
फिर आपकी मर्जी जितनी सजा दीजिए।

धीरेन्द्र सिंह
07.06.2026
08.25


शुक्रवार, 5 जून 2026

तथ्य

तथ्य मैला हो रहा है
सत्य बना है अनुभागी
कथ्य की सीमाएं निर्धारित
जीवन लगता बैरागी







न्यायालय की ओर बढ़ें
अधिवक्ता हैं विधि रागी
भोर चाँद उदय प्रमाणित
सूर्य रात्रि गति साधी

प्रजातंत्र का मंत्र लगे टूटा
जनतंत्र बन रहा खुराफाती
भ्रष्टाचार आचार बन रहा
जमुना हों या जुमेराती

कौन रचा ऐसा समाज
जहां देखें वहां प्रतिवादी
अन्तरघर्षण बना आकर्षण
बिन दूल्हे के बाराती।

धीरेन्द्र सिंह
06.06.2026
07.05


बुधवार, 3 जून 2026

ब्लॉक भ्रम

याद आने के लिए अनुमति जरूरी नहीं

ब्लॉक करके भी क्या ब्लॉक कर पाएंगे
झोंका हवा का जहां चाहे पहुंच जाता है
इस पहुंच से भला कब तक दूर जाएंगे

अपनी करवटों में लिए कुनमुनाती बेचैनियां
अपनी हरकतों में कितना छुपा पाएंगे
छुपाने से भला कब तक छुपा पाया कोई
मुहाने तक पहुंचने को चुपचाप धाएंगे

मन गगन में दहन है अनमन तड़पन कहे
आग मद्धम ना बुझे सुनिए जल जाएंगे
महकती रिमझिम सावन का है आमंत्रण
जो जिए संग वह तरंग रह उमंग जिलाएंगे

ब्लॉक एक भ्रम है क्रम में है यह चलन
किशोर मानसिकता में भाव उलझाएंगे
टूटकर भी जुड़ जाते हैं बादल छंट जाते
अंधियारे जग में कितने जुगनु लुभाएंगे।

धीरेन्द्र सिंह
04.06.2026
12.17





शुक्रवार, 29 मई 2026

बर्तन

 बर्तन टकराते हैं
जब भी छुआ जाए

टकराना बर्तन स्वभाव है
या कमजोर संयोजन
आजकल इसपर ही उद्बोधन
रसोई जल रही है

बर्तनों का विभाजन
आवश्यकता भी अनिवार्यता भी
प्रायः कहते हैं
कांच के बर्तन, नक्काशीदार बर्तन
टकराते हैं, टूटते हैं
बिखर जाते हैं,
चुभता है यह बिखरना
इन बर्तन रूपी पात्र का,

नई व्यवस्था के अंतर्गत
बनाये जा रहे हैं
मॉड्यूलर किचन, जिसमें
विभाजित है विभिन्न बर्तनों
रसोई उपयोगी वस्तुओं का खाना
रसोई व्यवस्थित हो तो
पकवान लगे रोज खाना,

रसोई में हो रहा है
वास्तु की दृष्टि से सुधार
भारतीय मसालों, घी से
आपूरित रसोई
गाय दुग्ध से कर रही
स्वयं को अन्नपूर्णा
और सुदूर गांव में भी
मॉड्यूलर किचन सी आहट है।

धीरेन्द्र सिंह
30.05.2026
07.34


गुरुवार, 28 मई 2026

क्यों कीजिये

हर भाव में निभाव जतन कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

कुछ सुन रहे कुछ पढ़ रहे जो मिला
क्या सत्य क्या असत्य लगे अधखिला
परिवर्तन है नर्तन ताल अपनी दीजिए
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

कहने को लोग कहते कई दुश्वारियां
धन धान्य हेतु सिंचित हो हर क्यारियां
इतिहास दे रहा संकेत त्यों कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

संघर्ष का विकास में है अपना काम
वर्तमान सजाने में प्रमुख भी है नाम
शिलालेखों की अशुद्धियां नव कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये।

धीरेन्द्र सिंह
29.05.2026
08.02


रविवार, 24 मई 2026

मचलता प्यार

जीवन एक नैया और यह उम्र है पतवार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

नैया में पतवार का है ना कोई भी एतबार
धोखा भी बहुत देता है हथेलियों का प्यार
दायित्व एक है उलझाता-सुलझाता खुमार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

मन की सुने कि समाज के विभिन्न विचार
सतर्कता में जीता व्यक्ति भी हो जाता लाचार
प्रवाह है एक जीवन बदलते संतुलन आधार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

दायित्व के दहन में मनन सघन सभी करें
निजत्व के भवन में घनन दमन सभी करें
एक प्यार ही है ऊर्जा जिसके रंगढंग हजार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार।

धीरेन्द्र सिंह
25.05.2026
05.45

शुक्रवार, 22 मई 2026

बरकत अरोड़ा

बरकत अरोड़ा
एक नन्हीं परी
न जाने कहाँ से
है वह नृत्य भरी

रात्रि के 0.44 पर
लेखन चल पल घड़ी
प्रतिभा रोमांचित की
वरना मुझे क्या पड़ी

बालिका ईश्वर प्रदत्त गुण
हाव-भाव समाए खड़ी
संगीत बजे पैर चले
थम जाए सब घड़ी

अब और क्या लिखूं
वह अद्भुत अनंत कड़ी
कैसे निभाती वयस्क भाव
वीडियो है एक कड़ी।

धीरेन्द्र सिंह
23.05.2026
0.51

गुरुवार, 21 मई 2026

बदन की मस्तियाँ

खिल उठती हैं सूर्य सी नर्म रश्मियां
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ



कल्पनाओं की मंथर गति किल्लोल
धड़कनों में उभरते हैं नए मीठे बोल
लिख देता हूँ भावनाओं की गश्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ

कितना स्वाभाविक लगे अलसाया बदन
चाँद-तारे नहीं बस मैं और अकेला गगन
बहुत कुछ छिपा लेता बदन पाकर चुस्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ

निढाल सोई सोचती होंगी उठती हूँ
आपकी कामनाएं भी बहकती होंगी
एक अंगड़ाई में चल पड़ें दिन कश्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ।

धीरेन्द्र सिंह
22.05.2026
05.45



बुधवार, 20 मई 2026

मेलोडी

दो राष्ट्र प्रतिनिधियों की है हंसी ठिठोली
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

कूटनीति में अवसर के जुड़ते हैं अध्याय
राष्ट्रशक्ति हो सक्षम मुड़ते युक्ति निभाय
अनचीन्हे इस अभिवव पल में दो जोगी
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

वैचारिक जुड़ाव हो तो हर पल मुस्कराता
बौद्धिक नई बयार हो तो अद्भुत घट जाता
वर्षों की समरसता से आया पल है संयोगी
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

इटली की मेलोनी और भारत के हैं मोदी
विश्व में खिलकर चर्चा है, चॉकलेट बोधी
उन्नत सोच भारतीय उत्पाद जुड़ी विश्व बोली
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी।

धीरेन्द्र सिंह
21.05.2026
05.46

मंगलवार, 19 मई 2026

आपबीती


आपबीती इस कदर है
खुद को नहीं खबर है
बीत गया दौर वह भी
मन मचाता भी ग़दर है






जो सोचा ना मिला वह
जो मिला किसकी नजर है
कर्म अब तक लड़ रहा
भाग्य ही असली डगर है






स्वयं खंडित पर है मंडित
स्तंभित पूरा शहर है
है बहादुर जाए कहां दूर
कष्टमय लगता सफर है






जी रहे हैं लोग ऐसे
जीवन का ऐसा असर है
चाह कुछ होती नहीं है
जीता वही जिसमें सबर है।







धीरेन्द्र सिंह
20.05.2026
07.02




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रविवार, 17 मई 2026

चाँद बांटिए

चंद लोगों में अक्सर चाँद को बाँटिए
दिल की बेचैनियों को जगह चाहिए
आप यहां-वहां से उठा कहा कीजिए
जिंदादिली की भी कोई वजह चाहिए

मन है मुस्कराता सोचकर बातें नई
मुस्कराने के लिए भी तो लगन चाहिए
दिल यह चाहता है क्या चाहत न समझती
जिंदगी भी है कैसी क्या-क्या न चाहिए

मन है दौड़ता तौलता ऊंच-नीच की बातें
कसक यह है कि कोई तो दहन चाहिए
सब दौड़ते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी
सबको अपने रंग का गगन ही चाहिए

खूब कोशिशें होतीं पटाखे-फुलझडियाँ भी
मन है चाहता उत्सव हंसी-ठिठोली चाहिए
हैं जो सयाने चुपचाप किल्लोल में डूबे
सघन प्रयास औरों का है मनटोली चाहिए।

धीरेन्द्र सिंह
18.05.2026
09.11

शनिवार, 16 मई 2026

कुछ छूट रहा

एक मुस्कराती जिंदगी, कमाल है
एक गुनगुनाती जिंदगी, धमाल है
आपके शब्दों में है नटखट शरारत
एक सुगबुगाती रागिनी का ताल है

जी मचल जाता शोखियाँ जताएं शब्द
फब्तियाँ भी मिलती जैसे बेताल हैं
हर तरह के लोग समरसता चाहते
समूह में समूह रचता लिए भूचाल है

कुछ भी लिखना कुछ भी कहना
परिभाषाएं अपनी और अपना गाल है
शब्द द्वारा व्यक्ति को पढ़ने का मजा और
व्यक्ति सोचता वही चतुर दिव्य भाल है

मन बांट देता है टोकरी के फल जैसे
श्रेणियां बनती खुद अनुभव चाल है
कितना भी छुपाए छुप सकता नहीं
कुछ छूट रहा है कुछ का मलाल है।

धीरेन्द्र सिंह
17.052026
06.35

माटी 9

 माटी 9 के प्रमुख मद

1. पंजीकरण व्यवस्थित था।

2. बैठने की व्यवस्था अच्छी थी।

3.रिकोर्डिन्द फोटोग्राफी अच्छी थी।

4. मंच के आरंभ में जिस पुरुष ने आरम्भ किया वह ठीक नहीं था। न कोई भूमिका न किसी प्रकार की पार्श्वभूमि बस बोलना वह भी तेज थोड़ी कर्कश आवाज।

5. महिला ने कवि सम्मेलन का आरंभिक चर्चा ठीक किन किंतु जल्द चली गईं। प्रभाव जो जमा सकती थीं नहीं हो सका।

6. जगदंबिका पाल और कृपाशंकर सिंह नेता के इर्द-गॉर्ड भीड़ बातें कर रही थी और मंच पर मुशायरा चल रहा था।

7. एक भी कवि अपना प्रभाव नहीं छोड़ सका न श्रोताओं से जुड़ सका। मुशायरा के अध्यक्ष ने रामायण पर अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए रामायण को कहानी बतलाया जो आपत्तिजनक था।

8. सच्चिदानंद काशी पर कम और अपनी पत्नी मालविका की चर्चा अधिक किए। काशी पर दो मिनट भी नहीं बोल पाए। सच्चिदानंद अपनी पुस्तक का लेख पढ़ रहे थे जो श्रोतागण में यह उत्सुकता नहीं जगा पाया कि ललक उत्पन्न हो। संस्मरण सुना रहे थे जो विषय के अनुरूप नहीं था।

9. सच्चिदानंद राजन-साजन मिश्र का काशी पर गीत की दो पंक्तियाँ गाये जो अच्छा प्रभाव डाला।

10. महिला ने अपने संचालन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हुए मालिनी अवस्थी का स्वागत किया।

11. 6.30 शाम को पुरुष संचालक ने अपना ड्रेस बदल कर अच्छी वेशभूषा में हो गया। मालिनी अवस्थी का गाना चल रहा था। पुलिस के बड़े अधिकारी आ-जा रहे थे। मुख्यमंत्री के आगमन का समय हो रहा था।

12. संचालिका जो बुंदेलखंड की थीं उन्होंने संचालन का अनुपम कौशल का प्रदर्शन किया। मालिनी अवस्थी के गायन समापन के बाद मुख्य मंत्री के आगमन में लगनेवाले समय में मंच से कुछ देर तक बातें की फिर मंच से नीचे उतरकर श्रोताओं संग संवाद उनके गायन आदि की सहभागिता सम्मिलित की।

13. राजनेताओं की तथा पुलिसकर्मियों की मुख्य मंत्री की अगवानी की मुस्तैदी और व्यस्तता को देखने के बाद बाहर निकल विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर वाहन की प्रतीक्षा करने लगा। इसी दौरान मुख्यमंत्री का काफिला आता दिखा और आगे एक मोटरसाइकिल संग कुल पांच कारें गुजरी। वहां मुस्तैद एक पुलिसकर्मी ने कहा कि काफिला में कम गाड़ियां हैं।

14. मुख्यमंत्री के आने के पहले रात्रि 8 बजे सभागार से बाहर निकल गया।


बुधवार, 13 मई 2026

चाह सूरज

गूंजा आपका तराना है
भोर भाव मनमाना है
मोबाइल से नहीं  बातें
बस लिख गुनगुनाना है

कैसे आंख खुली तड़के
चाह का मन दीवाना है
पढ़ेंगी या ना पढ़ेंगी यह
सिवाय लिखने भरमाना है

भोर की सोच होती सच
शोर मन में अनजाना है
आज क्या कुछ अलग है
आह का जो फड़फड़ाना है

आज यह भोर चितचोर
मन का शोर जगमगाना है
एक ऊर्जा सी कौंध जाती
चाह सूरज सा उग जाना है।

धीरेन्द्र सिंह
14.05.2026
05.01


मंगलवार, 12 मई 2026

लेखन

देश, धर्म, संस्कृति पर रचना लिखिए
एक समूह जागरूक का अनुरोध था
पढ़कर अनुरोध चिंतन उसपर किया
रामायण, श्रीमदभगवतगीता की कथा

राष्ट्र की विभिन्न परम्पराएं हैं अनमोल
जो विगत इतिहास नहीं एक दर्पण था
सत्य के तथ्य को कथ्य में पिरोया गया
धूल में अटा दर्पण रह-रह चमक व्यथा

नींव सशक्त है निर्माण नया तो कीजिए
देश, धर्म, संस्कृति सांस में है सबके मथा
राम सा चरित्र कहां कृष्ण सी कहां कूटनीति
पीढ़ी के संचित मार्गदर्शन क्या मात्र कथा

लेखन कौशल है तो कलम योद्धा बन जाईए
समाज वही जीवित वर्तमान जिसने है मथा
नए अस्त्र-शस्त्र हैं नई हैं कई युद्धनीतियाँ
शौर्य-शक्ति जीवंत मात्र संयुक्त हों सखी-सखा

मेरा लेखन एक प्रहार है नहीं कोई चित्रहार
भावनाओं का जैविक युद्ध आज से है नधा
आपके सुझाव का आदर है प्रेरणा हैं दिए
भाषा का मूल योद्धा हूँ देश, संस्कृति में रचा।

धीरेन्द्र सिंह
13.05.2026
08.18


शनिवार, 9 मई 2026

माहेरवाशी

 "माहेरवाशी" कल्पना का गुणगान करूँगा

समाज भी सरकार है सम्मान करूँगा


श्रीकांत भारतीय, डॉ श्रेया भारतीय की सोच

अखिलेश चौबे, वेदिका संग 214 की फौज

नई सोच अभिनव कर्म प्रसारित जहान करूँगा

समाज भी सरकार है सम्मान करूँगा।



धीरेन्द्र सिंह

10.05.2026

10.05

मनमर्जियाँ

मनोभाव की होती हैं नित कितनी सरगर्मियां
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ

टुकड़े-टुकड़े, गिरते-पड़ते कुछ भाव कह दिए
सामनेवाला कितना समझा उतने में रह लिए
होती जो बारिश की झूमती बूंदों सी खुदगर्जियाँ
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ

कुछ कह दिए कुछ रोक लिए रोज ऐसा होता
उगता नहीं हमेशा भाव बीज जैसा है बोता
तोता सा वही रट अटक-मटक-झटक अर्जियां
निभाव में हो पाती है  कितनी सी मनमर्जियाँ

व्यक्तिगत जीवन हो या किसी समूह की धरती
मनोभाव कितने बरसे पर लगे धरती है परती
डुबो न संग किसी गहरे भाव सागर में दरमियां
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ।

धीरेन्द्र सिंह
10.05.2026
06.53


गुरुवार, 7 मई 2026

समूह पुकार

 पोस्ट आपकी महत्वपूर्ण लिए सरोकार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार

आपकी सोच अच्छी भाव में हैं नवीनता
आपका लेखन अभिनव लिए प्रवीणता
कुछ लोग तो करते आपकी रचना सत्कार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार

अन्य पोस्ट भी चाहें आपका भी प्रोत्साहन
एक लाइक या टिप्पणी देती नवीन मनन
जुड़िए न समूह से करते प्रसारित सुविचार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार

क्या समूह दायित्व संवाहक एडमिन, मॉडरेटर
सदस्य भी तो हैं समूह के दीप्तिमान दिवाकर
यह सलाह नही हिंदी समूह का विनीत पुकार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार।


धीरेन्द्र सिंह
07.04.2026
21.07

बुधवार, 6 मई 2026

विवाह

कुछ भावना कुछ सामाजिक चलन प्रवाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह

जो कहते खुशियों भरी है वैवाहिक जिंदगी
वह डरते यह कहने में झेले हैं जो शर्मिंदगी
आरम्भ गर्मजोशी से फिर अदृश्य सोई दाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह

सामाजिक बंधनों का है दबाव प्रखर जोड़
दिखावा प्रदर्शन खूब भीतर रोज रिश्ते तोड़
एक-दूजे से उदासीनता निकलती मुई आह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह

जो खींच रहे बलभर वह हैं साथ चलन क्रम
हर मोड़ पर उभरता है शंका लिए नया भ्रम
विवाहेत्तर संबंधों में हैं अभी भी छुईमुई पनाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह।

धीरेन्द्र सिंह
06.04.2026
14.05


मंगलवार, 5 मई 2026

पोस्ट

दिखती कम मौलिकता नकल का है ताना-बाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना

हर सामान्य पोस्ट में दिखे यौवन की ही लयकारी
यौवन कहां है न दिखता लगे यथार्थ से है पर्देदारी
चापलूसी उथले मजाक से संभव है क्या जीत जाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना

कॉपी-पेस्ट का बढ़ते चलन में पोस्ट का पुनरावर्तन
मौलिक लेखक का नाम मिटा उसपर करते कई नर्तन
जैसा है वैसा नहीं दिखते कैसे लोगों का यह जमाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना

अधिकांश पोस्ट लगती वासना की कुंठा वर्जनाएं
बस सेक्स ही है जीवन जीव सेक्स में हैं भरमाए
प्यार सहज सेक्स उपज हर हृदय का है ताना-बाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना।

धीरेन्द्र सिंह
06.05.2026
06.01


शनिवार, 2 मई 2026

वेदनाएं

छूकर कह रही हैं यह आपकी चेतनाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेंगी न वेदनाएं

शब्दों में सिमटकर मनोभाव चल पड़े
अर्थों में बिखरकर सद्भाव निकल पड़े
क्या हुआ, कैसे हुआ यह समझ न पाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं

चौरंगी मन में चतुर्भज है कंपित चेतना
मन आपका न छू लूँ संशय हो तो देखना
संपर्क में होती हैं निर्मित अचानक कामनाएं
हंसिए,खिलखिलाईये घटेगी न वेदनाएं

कब हो सका चलती रहे अपनी मनमर्जियाँ
दूसरी आफत प्रणय की आती रहती अर्जियां
छोड़िए जग की बातें क्या है सोच तो बताएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं।

धीरेन्द्र सिंह
03.05.2026
06.25

शुक्रवार, 1 मई 2026

धक-धक

धक-धक, धीरे-धीरे, साथ-साथ, कुछ-कुछ
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस, सचमुच


आप कई आवरण के प्रकरण परे हैं विद्यमान
थाप जिंदगी के कई आवरण धरे हैं निदान
मति-मति, दौड़े-दौड़े, आस-आस, हँसमुख
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस सचमुच


यथार्थ के विचार में आपका ही नित संचार
परमार्थ है स्वीकार जाप का ही मीत प्रकार
रचि-रचि, हौले-हौले, खास-खास, अभिमुख
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच


क्रिया की प्रतिक्रिया में सक्रिय है भाव क्रिया
दिया है मन में जला विनयी है चाह प्रिया
सखि-सखि, तौले-मोले, रास-रास गुपचुप
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच।


धीरेन्द्र सिंह
02.04.2026
09.49

खामोश आंधियां

नयन की नयन से सुगंधित शरारत
मुस्कराहट में आपको मिली महारत
जुल्फ गर्दन की अठखेलियाँ भी हों
वाचाल उभरती जाए सुगंधित इबारत

शिष्ट, शालीन, व्यक्तित्व करता है मोहित
प्रभाव ऐसा हो लयबद्ध सी थरथराहट
गीत बन जाती है निहारती यह दुनिया
स्वर दें आप उसे उभरे मीठी छटपटाहट

हृदय के पंख पर बिठाकर आपको उडें
गगन कर नमन दर्शाता रंगों की महारत
आपके रंग देख मेघ भी एकटक हो तकें
नशीले रंगों की स्वामिनी फाग सी शरारत

कुशलता से छिपा लेती अपने सारे बवंडर
उड़ता जाता है परिवेश करती जाती आहत
समझने के प्रयास में होते जाते सब बदहवास
आप खामोश आंधियों में उड़ाती हैं चाहत।


धीरेन्द्र सिंह
02.05.2026
05.36


गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

मजदूर दिवस

मजदूर दिवस है ना होइए मगरूर
भारत है निर्माता विभिन्न्न से मजदूर

पसीना बहानेवाले ही लगते हैं श्रमिक
पढ़े-लिखे भी मजदूर कर मौलिकता शमित
भारत श्रमिकों का निर्यातक है मशहूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर

आई टी का बोलबाला सब पढ़ते प्रौद्योगिकी
पूर्ण कर यह शिक्षा सेवा प्रदाता की लायिकी
कम्प्यूटर की गैर भाषा न अपना सर्च इंजन नूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर

हम विश्व के श्रेष्ठ एक शिक्षित मजदूर
मजदूर दिवस आज भी रहा हमें घूर
बहुसंख्य विदेशों में हैं जाने को प्रणपूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर।


धीरेन्द्र सिंह
01.05.2026
08.02