खुद को तलाशिए बिखरे हुए हैं सब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
एक उम्र सबकी है अनुभव लिए हुए
कुछ चिंतित कुछ कहें क्या वह जिए
सबका कहीं अधूरा सा जीवन सबब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
विपरीत जिंदगी को भी पड़ता है जीना
कहीं कौड़िया मिले कहीं रंगीन नगीना
हर एक का अंदाज़ हर एक का अदब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
कहे आत्मा तो मानिए कि निखर गए
जानेगा कैसे कौन कि क्यों बिखर गए
जीवन को पढ़ते-पड़ते मिले अर्थ गजब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब।
धीरेन्द्र सिंह
06.03.2026
22.34