अपने लिए जो रचता हूँ
जुड़ खूब उससे सजता हूँ
लचकती डाल सा मोड़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
नित संपर्कियों को पढ़ता हूँ
उत्कर्ष हो ध्येय लेकर रचता हूँ
भटकते भाव लेकर ओढ़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
प्रतिष्ठा को कनिष्ठा सा समझता हूँ
निष्ठा को समझ ऊर्जा दहकता हूँ
अगन के दहन में दिए जोड़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
न छोडूं तो कैसे जी सकता हूँ
अटक जाऊं धीमी आंच पकता हूँ
निरन्तर नित नया रच दौड़ जाता हूँ
फिर वह रचना छोड़ जाता हूँ।
धीरेन्द्र सिंह
17.02.2026
10.31