शब्द अपने सदन में एकल पुखराज हैं
भाव अपने गगन में मूक सा सरताज है
अभिव्यक्तियां ही इनको सजाती रहतींभाषा इसीलिए व्यक्तित्व का हमराज है
गढ़ रहा है कथ्य भाषा तथ्य की अभिलाषापढ़ रहा जो वाक्य अर्थ कई मिजाज हैंशब्द तह स्पंदन खींचे, भाव आंखे मीचेशब्द की परिभाषाओं के संदर्भ अंदाज हैं
रंग बदलते ढंग बदलते रूप है अपरिवर्तनीयशब्द अक्षर संयोजन से बनते गजराज हैंपढ़ चुका जो गढ़ चुका वह भी कहीं अपूर्णसंदर्भ गति से शब्दों का संभव यह राज है
सबकी अपनी शैली है भाषा ऐसे फैली हैशब्द चयन भिन्न हैं पर वाक्य के साज हैंकल यही थे शब्द पर भाषा के तेवर और थेजुड़ते इतर शब्द मुड़ते सम्प्रेषण रियाज़ हैं।
धीरेन्द्र सिंह18.08.202620.48
भाव अपने गगन में मूक सा सरताज है
अभिव्यक्तियां ही इनको सजाती रहतीं