मंगलवार, 18 अगस्त 2026

शब्द

शब्द अपने सदन में एकल पुखराज हैं
भाव अपने गगन में मूक सा सरताज है
अभिव्यक्तियां ही इनको सजाती रहतीं
भाषा इसीलिए व्यक्तित्व का हमराज है

गढ़ रहा है कथ्य भाषा तथ्य की अभिलाषा
पढ़ रहा जो वाक्य अर्थ कई मिजाज हैं
शब्द तह स्पंदन खींचे, भाव आंखे मीचे
शब्द की परिभाषाओं के संदर्भ अंदाज हैं

रंग बदलते ढंग बदलते रूप है अपरिवर्तनीय
शब्द अक्षर संयोजन से बनते गजराज हैं
पढ़ चुका जो गढ़ चुका वह भी कहीं अपूर्ण
संदर्भ गति से शब्दों का संभव यह राज है

सबकी अपनी शैली है भाषा ऐसे फैली है
शब्द चयन भिन्न हैं पर वाक्य के साज हैं
कल यही थे शब्द पर भाषा के तेवर और थे
जुड़ते इतर शब्द मुड़ते सम्प्रेषण रियाज़ हैं।

धीरेन्द्र सिंह
18.08.2026
20.48