अपने घर में सबसे बड़ा होना तो सम्मान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
संपन्नता की ध्वजा व्यवस्थित विधिवत सजा फुरसत की टोपी पहने कहें जिंदगी दे मजा जीवन कहे राग, द्वेष, विषाद का बहे तूफान है सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
लोग घर में ही हैं घर डगर सा लग रहा है नजर कई हैं दौड़ती सबर वहां थक रहा है
आ रहे हैं जा रहे हैं बदला घर का विज्ञान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
खट से कप रख चले जैसे कार्यालय परिवेश है
बोलते बढ़ चले जैसे कार्यपालकीय आदेश है
भौतिक सुविधाएं सभी न मिलती अपनों की तान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है।
धीरेन्द्र सिंह
12.07.2026
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