सोमवार, 20 जुलाई 2026

स्वीकार्य जिंदगी

समझकर भी नासमझ सी है कार्य बंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी




जुड़े हुए हैं जो कुछ मुड़े भी लगते वो
अपनेपन की भावना में रहता जीवन बो
सब कुछ सहज हो जैसे भीतर तो शर्मिंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

दांतों के बीच जीभ कटती है पर न बोलती
कड़वाहट भी हो कितनी जिह्वा मीठा बोलती
सहन के गगन में रहे परिवेश परिवार बुलन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

सबका जीवन अलग भिन्न तंत्र-मंत्र, आराधना
अपनों की खातिर जीना पिघलती सी कामना
झर चुके हैं खुद लुटे हैं पर अपनों बीच हदबन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
11.10

आप हैं बस सोचती

सींचता है हृदय हरदम बनकर पुनीत पावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

आप नयनों में नहीं झांकती बस ताकती है
मेघ पुतली में सघन हैं सत्य यह नहीं मानती हैं
नयन भर नमी हमेशा पलकों का रहता है छावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

चमकती हैं पुतलियां होता है जब नेह गर्जन
आप ही कारण हैं आप ही हैं भाव बूंद नर्तन
झमाझम भाव वर्षा में हो जाता जलमग्न तन आंगन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

हृदय सूर्य सा दग्ध मेरा आप भावना का सागर
वाष्पित होती मन में बसती रचती रहती बादर
हृदय बरसता लिए सहजता और भींगता दामन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
03.49