शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

इतना क्या सोचना

हम भी इस तरह अब बहकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं



भाव उठते हैं जैसे इत्रदानियाँ सजी हो

धुन सारंगी और तबले में मिल रची हो
खयाल घुंघरुओं सा अब छमकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं

खुद की दीवानगी के फलसफे हैं निराले
ज़िंदगी गुनगुना रही है चाहत के नए प्याले
पुरवैया सा तन बहे चुप दर्द उभरने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं

यह आवारगी है या जीने का अंदाज नया
कोई बेचारगी है या बंधा नगीना साज बयां
इतना क्या सोचना दिल से जगने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं।

धीरेन्द्र सिंह
30.10.2026
19.43

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

विचारिए

ध्येय क्या है लिखने का यह भी विचारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए



अकारण कोई भी अक्सर लिखता नहीं है

शब्दों के सुसज्ज़ा संग जो दिखता यही है

लेखन के आदर्श, सिद्धांत को निथारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए

यह सुझाव नहीं शिक्षा नहीं हिंदी की पीड़ा है
लिखना छपना फिर ना दिखना हिंदी क्रीड़ा है
हिंदी भाषा में निराशा है यह कैसे है उच्चारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए

जहां भी लिखते-लिखती हों वहां पर करें गौर 
सभी फलदार वृक्ष वही कोई डाल हो भरे बौर 
लेखन माँजिए शब्द साधिए आप तो स्वीकारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए।

धीरेन्द्र सिंह
28.10.2026
16.44

सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

देवी-देवता

जीवन और समाज के प्रति होती सबकी देयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता



संस्कार के संसार में सुघड़ बनने का निज प्रकार
मन चाहे जिसको देना, दे जाता है जीवन आधार
नहीं वह सोचता कर्म लाभ दे स्वार्थ की उपादेयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता

आधार किसी को तो कोई होता है परम निराधार
रचा देना सजा देना ही होता है आकर्षक श्रृंगार
कर्म की कर्मठता से समाज बनता देख योग्यता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता

इस भाव में उलझन कहां निर्मल मन से तो सोचिए
एक नहीं कई देवता मिले होंगे भूले हैं तो खोजिए
कह दूं आप देवी-देवता क्या इसमें भी कोई शक्यता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता।

धीरेन्द्र सिंह
27.10.2026
10.05

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

कैसे चित्रकार हो

लेखन में यदि लय नहीं कैसे शब्दकार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

यह रचनाकार पर व्यक्तिगत नहीं आक्षेप है
हिंदी लेखन सरस आसक्तिगत हो निक्षेप है
हिंदी पाठक और बढ़ें हिंदी लेखन रसदार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

प्यार के वर्णन में क्या केवल वासना झंकार
प्यार ऊर्जा आत्मा का जीवन का है श्रृंगार
प्यार सज्जित शब्दों में जीवन भाव बहार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

प्यार में भी तर्क है दर्शन है जीवन चिंतन है
व्यक्ति त्याग कर अकेली साधना क्या मंथन है
ईश्वर जैसा भव्य दिव्य देहधारी व्यक्ति दुलार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो।

धीरेन्द्र सिंह
26.10.2026
09.24


फिर ना आई

इल्दीहा दिल दिया बिल भी तो दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

खूब बातें दिल मिल बांटे ना कुछ छांटे
हृदय क्या विलय क्या होते क्या हैं नाते
उसका काम उसका नाम भाव हल्दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

तब खिला एकबार मिला टूटा सिलसिला
प्रणय रुग्ण भाव लगा गई थी तिलमिला
कर्म अठखेलियाँ नहीं वार्ता भाव बहा दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

इल्दीहा शब्द नहीं हृदय वेदना का चिंघाड़
भावना में तैरे बिना तत्क्षण प्यार लगे पहाड़
संवेदना अशिक्षित थी मिलन बिल तक जिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया ।

धीरेन्द्र सिंह
26.10.2026
08.55

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

जीवन

कामनाएं दौड़ रहीं पर मन तो नियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

सपनों के शीर्ष पर भाव सुगंधित पड़े हैं
यथार्थ में संभव नहीं सामाजिक धड़े है 
पर प्रयास आस लिए बढ़ता अनियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

स्व को रोका है जीवन की असुविधाओं में
चाह बलवती फिर भी होती विपदाओं में
मन कहता स्वागत है हर भाव निमंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

जीवन समझ नहीं आया बस जीवन जीते हैं
विपरीत यदि कुछ होता हंस कहते रीते है 
इतना क्षद्म जीवन में राह लगे निबंधित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
21.33

चरित्र

चरित्र के चर्चे इतने इसका न कोई चित्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र



कुछ भी न रहा गोपनीय इलेक्ट्रॉनिक गति
सुख भी हो सोचनीय तात्कालिक जो मति
बहलाना-फुसलाना भ्रमित करना छिड़क इत्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

रामायण, महाभारत के मिलते हैं ऐसे पात्र
युग बांचता इन्हें पर लगे नासमझ सा छात्र
युगों से अपनों से छल सत्यता का नहीं जिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

अपने हैं जो क्रमशः बदलते हैं ढलते जाते हैं
भीतर बना दूरी करीबी भ्रम सजा भरमाते हैं
अपनापन मित्रता भी लगे भेदक लिए फिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
20.49