मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है
सपनों के शीर्ष पर भाव सुगंधित पड़े हैं
यथार्थ में संभव नहीं सामाजिक धड़े है
पर प्रयास आस लिए बढ़ता अनियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है
स्व को रोका है जीवन की असुविधाओं में
चाह बलवती फिर भी होती विपदाओं में
मन कहता स्वागत है हर भाव निमंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है
जीवन समझ नहीं आया बस जीवन जीते हैं
विपरीत यदि कुछ होता हंस कहते रीते है
इतना क्षद्म जीवन में राह लगे निबंधित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है।
धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
21.33
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