व्यक्ति भी एक किताब का हिसाब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है
पन्ने प्रति पन्ने फड़फड़ाते पलट रहे हैं
हर पन्ने से इंसान इतराते लिपट रहे हैं
पल सजाने की कोशिश दुल्हन माहताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है
जीवन है एक डगर या लाभ-हानि का लेखा
उलझा वही जिसने ऑडिटर की तरह देखा
कर्म यात्री सा जो चला वही आफताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब।है
कुछ प्यार के पन्ने कुछ संघर्ष की है ऋचाएं
जीते जहां पर जय मिली पराजय क्यों जगाएं
प्रणय जिनका भाग्य है वह ही नवाब हैं
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है।
धीरेन्द्र सिंह
11.08.2026
06.13
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