नाच रे तन नाच मन नाच रहा जैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे
जिंदगी उत्सवों की बेचैन प्रणाली है
मन सोच रहा क्या खनकती प्याली है
लिखा गया है जो उसे बाँच रहा कैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे
लेने को लंबित अभी फैसले बहुत हैं
मन क्यों अचंभित सिलसिले बहुत हैं
उम्र की स्लेट पर क्यों हिसाब ऐसे-तैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे
यह तन ही तो है अनुभूतियों का चितेरा
कामनाओं की धुन पर सरगमों का डेरा
मन ऊर्जा अनंत है खुद को जांच रहा कैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे।
धीरेन्द्र सिंह
31.10.2026
03.57
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें