अपनी उमर अपनी गठरी दौड़ रही अपनी पटरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी
मंडरा रहे घनेरे बादल तोड़ने को उष्माभरी सांखल
अपने श्रम से जोड़ रहा व्यक्ति जीवन सुरभि प्रांजल
बूंदों में एक नई उमंग अर्पित करती घर्षण की बिजुरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी
अभिलाषाओं के पवन झकोरे चाँदनी दहके भोरे
कब सपनों में चाह उठेगी होंगे जो चाहें सब पूरे
आकाश मुस्काता कहता व्योम भरो निजी अंजुरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी
उमर की अपनी गति है काया कहती क्यों दुर्गति है
पटरी उबड़-खाबड़ मिलती, लक्ष्य-दौड़ में सहमति है
दौड़ बादलों का नभ में गीत सावन संग बजे खंजड़ी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी।
धीरेन्द्र सिंह
31.07.2026
08.08
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