शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

नवरात्रि

आदिशक्ति वंदना देहभक्ति अभिव्यंजना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना



नवरात्र के सभी पात्र विश्व के हैं क्षात्र
शक्ति उद्भवन पल्लवन विजय सुपात्र
भक्ति आराधना से गूंज उठे हर अंगना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना

मन कुलषित ले भाव, उल्लसित प्रभाव
ऐसे होते कपटी और धूप पिघलती छांव
मर्दन मात्र विकल्प यदि लेशमात्र समझ ना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना

व्रत, उपवास, भक्ति मात्र मन की ना शुद्धि
नीतिकौशल, रणकौशल में भी होती वृद्धि
शक्ति जिसकी उच्च आसक्ति की प्रवंचना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना।

धीरेन्द्र सिंह
11.10.2026
03.51

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

धाराएं उन्मत्त हैं

जमीन जिद कर सादगी की है बात कह रही
धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रहीं नदी



व्योम के रंग में परिवर्तन का हो रहा प्रयास

भीड़ यह नई लग रही प्रयोजन हैं कुछ खास

दिन समीक्षक बन रही बोल कैसी रही सदी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी


चप्पुओं का बहुत जोर है जल में भी शोर है

उजाले के समक्ष लौ कहे उसका अंजोर है

असमंजस में किनारा क्यों चर्चित शताब्दी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी


जनभाषा बीच मुखर हो उठी वीडियो भाषा

सबकुछ ढल जाता अनुरूप जैसी हो आशा

क्या सत्य क्या असत्य मच रही है खुदबुदी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी।

धीरेन्द्र सिंह
10.41
08.10.2026

गोदौलिया

आप आकर गोदौलिया में मुझसे न मिलीं
यह एक बात या राह अदाओं की खिली



गोदौलिया में बेंच पर बैठा आपसे चैट किया
झूमर, बैग वाले के पास हूँ फोटो से बता दिया
वाराणासी में अनुभूतियां झलकती हैं दिली
यह एक बात या राह अदाओं की।खिली

कुछ देर तक चैट में अपना सब बता दिया
विचारों के लेनदेन से जला भाव का दिया
धूप तेज दोपहर में शाम बारिश झूम मिली
यह एक बात या राह अदाओं की खिली

शाम फोटो भेज आपने कहा आप वहीं थीं
व्यक्तिगत मिलना न चाहीं शायद मुझमें कमी
शाम वर्षा झड़ी बीच मेरी पलकें भी थीं गीली
यह एक बात या राह अदाओं की खिली।

धीरेन्द्र सिंह
08.10.2026
09.34

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

यादों में

आप यादों में इस कदर तो आइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए



हर आहट में बेचैनी सी छटपटाहट
कामनाओं में भी होती है घबराहट
स्वप्न बनकर मन को ऐसे भरमाइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए

आप एक याद एक फरियाद युक्त
थाप जीवन की बिन आप उत्सुक
हवा सुगंध मिली जैसे महक जाइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए

कहां भटक गए या मुझे भूल गए
तलवे से हृदय तक शुष्क शूल हुए
इतनी उपेक्षा प्रतीक्षा जैसे न लहराइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाईए।

धीरेन्द्र सिंह
07.10.2026
06.46



शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

मन

मन मोह के दर्पण का अनुरागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

अकुलाहट भरी अभिव्यक्तियों की भीड़
कुलबुलाहट धरी आसक्तियाँ का नीड़
कर्म के नियुक्तियों में बड़भागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

कब चल पड़े अनचीन्ही डगर बौराया
चाहत का चादर में लिए मोहमाया
हर कदम मन का लगे बागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

मन घूमता है जैसे घूमते हैं ग्रह, नक्षत्र
मन ढूंढिए मिल जाता है भटकते सर्वत्र
मन भी तो चाँद सा निर्मल दागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है।

धीरेन्द्र सिंह
03.10.2026
04.59

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

यश-अपयश


यश-अपयश प्रभु हाँथ सबने पढ़ा है
क्या जीबन में सब कुछ ईश गढ़ा ह

व्यक्ति की आसक्तियाँ लांघती भित्तियां
कौन जाने किस गति में कौनसी नीतियां
अनपढ़ भी यज्ञ लगे लिखा-पढ़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गढ़ा है

बर्तन सा बज रहे हैं आजकल के परिवार
नर्तन करते भाव कर न पाते ठीक श्रृंगार
सजना-संवरना कृत्रिम में मानव पड़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गढ़ा है

प्रारब्ध और कर्म संग धर्म की आपाधापी
हर राह में इध्वर दिव्यलोक की हो मापी
ईश्वरीय परिवेश सृजन में आलोचना अड़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गधा है।

धीरेन्द्र सिंह
02.10.2026
05.42

बुधवार, 30 सितंबर 2026

थपथपाहट

दर्द, कसमसाहट, छटपटाहट मिले आहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट



जग क्या है दूसरों के भावनाओं की चाहत
अकेला रहे व्यक्ति तो आसक्ति की गर्माहट
विलय होना क्या मानव मन की है नर्माहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट

किसी के होने मात्र से मन होता सुगंधित
क्या ऐसे रिश्ते सहज या होते हैं आयातित
किसी की चाह में होती क्यों है घबराहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट

सभी अपने जीवन को चाहें खूब सजाना
पर न आता सबको सही वक्त चाह जताना
मिला न मन भरा मिलन की है बड़बड़ाहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट।

धीरेन्द्र सिंह
01.10.2026
07.03