बारिश नीति
बारिश के फुहारों सी है आपकी अनुभूति
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
कल्पनाओं में सजती हैं प्रीति की कामनाएं
आकर्षण से रचती हैं रीति की भावनाएं
बात जब अभिव्यक्ति की हो संकोच प्रतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
हृदय आत्म से जो ना संबंधित, वह मुखर हैं
कुछ भी कभी भी बोल दे, वह रहगुजर है
धड़कन, तड़पन ऐसे लोगों के लिए अतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
बरस रही है झूम आपकी सभी सुंदरता
क्यों हो रही हिचक दिल में पर आतुरता
कैसे लोग कर लेते कईयों से प्रणय प्रीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति।
धीरेन्द्र सिंह
05.07.2026
11.16
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