मनमर्जियाँ
मनोभाव की होती हैं नित कितनी सरगर्मियां
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ
टुकड़े-टुकड़े, गिरते-पड़ते कुछ भाव कह दिए
सामनेवाला कितना समझा उतने में रह लिए
होती जो बारिश की झूमती बूंदों सी खुदगर्जियाँ
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ
कुछ कह दिए कुछ रोक लिए रोज ऐसा होता
उगता नहीं हमेशा भाव बीज जैसा है बोता
तोता सा वही रट अटक-मटक-झटक अर्जियां
निभाव में हो पाती है कितनी सी मनमर्जियाँ
व्यक्तिगत जीवन हो या किसी समूह की धरती
मनोभाव कितने बरसे पर लगे धरती है परती
डुबो न संग किसी गहरे भाव सागर में दरमियां
निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ।
धीरेन्द्र सिंह
10.05.2026
06.53
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