भोर तड़के जो टूटी नींद क्या करार धरूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ
मन है ढूंढता उस टूटे हुए क्षण की धमक
खिली थी जिंदगी महकती बहकती चमक
अब भी क्या छूटा जिसपर न अख्तियार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ
पौ फटी नहीं पसरा हुआ सन्नाटा है पुरजोर
न जानूं प्रीत आश्रित है सामाजिक गठजोड़
उभर आई हो चेतना में क्यों न अभिसार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ
न फोन न चैटिंग न वीडियो कॉल हो रहा है
जो कट गया छंट गया यह काल कह रहा है
कपाल में धमाल तुम बवाल आओ सत्कार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ।
धीरेन्द्र सिंह
18.06.2026
05.02

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