देश भ्रष्ट है या कि समाज भ्रष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है
यही कथ्य है सत्य के स्वरूप सधा
नेपथ्य में क्या हो रहा कहीं से नधा
सदा में अनुगूंज वही पर अस्पष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है
सत्य मार्ग की प्रचलित हैं परिभाषाएं
गौरव के जो प्रतीक वहीं शीश नवाएं
बौद्धिकता वस्तु बनी तर्क कष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है
एकल है व्याकुल गति जिसकी ढुलमुल
समाज है गुरुकुल प्रीत जिसकी थुलथुल
देश है संघर्षरत समूह पड़े तटस्थ हैं
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है।
धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
18.29

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