रविवार, 7 जून 2026

सुनो

सुनो कुछ लिखो तुमको पढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं

जब तुम कहती हो बहती हो बन नदी
प्रवाह की तरंग में निभाव की खुदबुदी
भींगे तट पर पांव नंगे धुन बढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें