कई समस्या है, चिंताएं हैं, क्या चिता बनाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
भींग जाना ही होता है उस पल को जी जाना
जी जहां ना लगे वह जीवन छल है हो जाना
सामाजिक मान्यताओं अनुरूप ढलते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
जीवन की आपाधापी में बस दौड़ निरंतर दौड़
अभिलाषाओं की हो समीक्षा देखा जाए तौर
किनारे-किनारे संभलते मझधार से डरते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं
रस श्रृंगार भी झेल रहा है नव मिलावट का वार
भाव-भंगिमा, अदा अठखेलियों का कहां गुबार
देह सौंदर्य पर सतत गौर करते जीवन यूँ गवाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं।
धीरेन्द्र सिंह
29.06.2026
20.30
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें