रविवार, 18 अक्टूबर 2026

दो किनारे

जैसे तैसे उड़ाते पैसे नदी धार है होता

दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता


चलन है मगन होकर गगन प्यार का रंगना
बाबू, सोना जैसे शब्द कहां सजनी व सजना
डुबकियां लगती कभी तिनके सा दिन होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता

कितनों से किया प्रेम कितने "एक्स" हैं यार
प्यार का बाजारीकरण समावेध कहां है प्यार
धड़कन की तड़पन में चाह श्रृंगार नहीं।होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता

विवाह बंधन और प्यार हो यह है बात पुरानी
प्यार बुखार है चढ़ता-उतरता तन से बेईमानी
मन विकल्प है तलाशता अवसरों को देता न्योता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता।

धीरेन्द्र सिंह
19.10.2026
05.13

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