रविवार, 11 अक्टूबर 2026

घायल

लकड़ी के चूल्हे पर बुदबुदाता चावल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल



लकड़ियां कम हैं पर अग्नि लपक जारी

बर्तन को छू ले भोजन पकने की तैयारी

चीख रहा और लकड़ी चिल्ला रहा अटल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल

हर समय का इसका सधा एक चलन है
हो-हल्ला, हंगामे का इसका भी सदन है
थोड़ी अव्यवस्था से चाहे बनें इसके कायल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल

ना तन से ना मन से कहीं पर भी घायल
चावल को गला कर विजय की है पहल
आवाज जोर से आकर्षित जो रहे टहल
भोजन को भांप रहा कब से घायल।

धीरेन्द्र सिंह
13.10.2026
07.54

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