शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

मनुष्य

रोपता नहीं हूँ बल्कि छींटता हूँ
ढकेलता नहीं बल्कि खींचता हूँ
पल्लवन संभावना जहां भी दिखे
मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ






मनुष्य हूँ प्रबुद्ध हूँ संयुक्त हूँ

आत्मा अजर अमर से युक्त हूँ

चुनौतियां मिले आंख न मींचता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ


प्यार ले शुमार हूँ एक खुमार हूँ

व्यक्ति-व्यक्ति गढ़ सकूं कुम्हार हूँ

मनुष्यता का ना कोई रिक्तता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ


व्यक्ति का अस्तित्व हूँ नियुक्ति हूँ

मनुष्य हूँ मानवता की आसक्ति हूँ

मैं, तुम, यह, वह विलग कर उन्मुक्तता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

26.09.2026

08.18
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें