मनुष्य
रोपता नहीं हूँ बल्कि छींटता हूँ
ढकेलता नहीं बल्कि खींचता हूँ
पल्लवन संभावना जहां भी दिखे
मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ
मनुष्य हूँ प्रबुद्ध हूँ संयुक्त हूँ
आत्मा अजर अमर से युक्त हूँ
चुनौतियां मिले आंख न मींचता हूँ
मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ
प्यार ले शुमार हूँ एक खुमार हूँ
व्यक्ति-व्यक्ति गढ़ सकूं कुम्हार हूँ
मनुष्यता का ना कोई रिक्तता हूँ
मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ
व्यक्ति का अस्तित्व हूँ नियुक्ति हूँ
मनुष्य हूँ मानवता की आसक्ति हूँ
मैं, तुम, यह, वह विलग कर उन्मुक्तता हूँ
मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ।
धीरेन्द्र सिंह
26.09.2026
08.18
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