मैं ही कारवां, मैं ही गति, मैं ही पथिक हूँ
संघर्ष है, समस्या हैं किंतु मस्त व्यथित हूँ
जग जाग रहा लगता पर प्रायः उनींदा है
दृग ताक रहा अक्सर पर स्वप्न सरीखा है
कुछ कर्म कुछ भाग्य से लगता समर्थित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ
जो भी जुड़ा चलता रहा कुछ रिश्ते चुरा
निरपेक्ष मैं रहा पर कह गया मुझको बुरा
मैं जैसा था वैसा हूँ वह कहते परिवर्तित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ
कांटे नहीं तो गुलाब की परिकल्पना कठिन
बांटे नहीं तो श्वासों की अभ्यर्थना मलिन
शुचिता से जी रहा हूँ समाधान समर्पित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ।
धीरेन्द्र सिंह
22.07.2026
08.37
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