भावनाएं उभरती हैं अभिव्यक्तियां अपरम्पार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार
गुण कोई होता है कर लेता सहज आकर्षित
हर भाव, सुगम भाव चाहने को रहता व्यथित
मिल जाता कोई अनुकूल, उठता भाव गुबार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार
मोबाइल के स्क्रीन पर हर बात लगे रसभीनी
शब्दों के फुहार में मिले सुगंध प्रीति नव चिन्ही
हृदय धड़कता विनय से कहता मीठा लगे दुलार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार
जब चाहें तब चाह उकेरे दिन हो या रात, सबेरे
अभिलाषाएं अनंत हैं क्यों बंदिश में खुद को घेरें
दूरी चाहे कितनी हो मजबूरी का ना रहे बुखार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार।
धीरेन्द्र सिंह
19.09.2026
06.59
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